
संजय कुमार सिंह
आज के मेरे अखबारों में पहले पन्ने पर न तो विमान उड़ाने की धमकी कम होने या बंटेंगे तो कटेंगे जैसे डरावने और वोट बटोरू भाजपाई नारे के खिलाफ कुछ है न ही चीन सीमा पर चार साल बाद गश्ती शुरू होने की सूत्रों की खबर का कोई फॉलोअप है। ढूंढ़ने पर यह खबर अमर उजाला में दूसरे पहले पन्ने पर लीड मिली। कल सूत्रों के हवाले से एलएसी पर चार साल बाद गश्ती फिर शुरू होने का प्रचार करने के बाद आज विदेश मंत्री जयशंकर के हवाले से छपा है, चीन विवाद के निपटारे के बाद ही सीमा प्रबंधन व स्थिरता पर होगी बात। विदेश मंत्री इस सरकार के काबिल लोगों में हैं फिर भी पहले छपी और अब इस खबर में देखिये कितने अंतरविरोध हैं। मुझे तो लग रहा है कि जमीन पर कुछ हुआ होता, हेडलाइन मैनेजमेंट की जरूरत नहीं होती, तो कल की खबर (लीड) बेमतलब थी। गश्ती शुरू हो जाती तो एक ही बार खबर धूम-धड़ाके से छपती। ज्यादा असर करती। लेकिन मामला मिलने पर ‘लाल आंखें दिखाने’ और दिखाने की जरूरत खत्म करने का था जो निपट गया। अब लीपा-पोती मजबूरी है। खबरों का फॉलोअप भी होता है और यह इतना लचर है कि पहले पन्ने पर नहीं छपा जबकि मूल खबर सूत्रों की थी और फॉलोअप में जो है वह विदेश मंत्री के हवाले से है।
इस खबर के अनुसार, विदेश मंत्री ने कहा है कि सैनिकों की वापसी और गश्त से जुड़े कुछ मुद्दे अब भी सुलझाना बाकी है। अगला कमद तनाव कम करना है…. पर यह तब ही जब हमें यकीन हो कि दूसरी तरफ से ऐसा हो रहा है। खबर में लिखा है, सैनिकों की वापसी और गश्त से जुड़े मुद्दे सुलझाने अब भी बाकी है। इस संबंध में बातचीत जारी है। आप समझ सकते हैं कि सूत्रों के जरिये गश्ती फिर शुरू होने की खबर प्लांट करने के बाद इस खबर का क्या महत्व है। हालांकि,इसमें भी कहा गया है कि सैनिकों की वापसी 29 अक्तूबर तक पूरी हो जायेगी। खबर के अनुसार 21 अक्तूबर के समझौते का मकसद सीमा प्रबंधन की ओर बढ़ना और तनाव को कम करना है। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि ना कोई घुसा है, ना घुसा हुआ के बावजूद चार साल तक एलएसी पर गुत्थम गुत्था (एंगेज्ड और डिसएंगेजमेंट) सैनिकों को सहमति के बाद अलग होने और कुछ किलोमीटर जाने में इतना समय क्यों लगेगा या लगना चाहिये। यही नहीं जब खबर छप चुकी है तो अगर-मगर क्यों?

जब इतनी अच्छी खबर नहीं छापनी हो या छिपानी हो तो आज कई अखबारों की लीड प्रधानमंत्री के कार्यक्रम, ‘मन की बात’ में डिजिटल अरेस्ट की चर्चा है। मैं ‘मन की बात’ सुनता नहीं और अखबारों में उसकी चर्चा पर भी ध्यान नहीं देता हूं। मेरा मानना है कि वह जिसके लिए था उनलोगों ने सुन लिया। मैं रेडियो पर सुनी चीजें दोहराने के लिए अखबार नहीं पढ़ता हूं। इसलिए मुझे इस कार्यक्रम के बारे में कोई जानकारी नहीं है लेकिन यह प्रेस कांफ्रेंस का विकल्प नहीं हो सकता है। आज जब यह लीड बन गई है तो पढ़ना पड़ा और लग रहा है कि इसमें खबर नहीं, ‘मन की बात’ ही है। अगर यह बात प्रेस कांफ्रेंस में कही गई होती तो तमाम पूरक सवाल पूछे जाते और इसी खबर से कुछ नई व उपयोगी जानकारी निकलती। हर रिपोर्टर के लिए अलग इंट्रो होता, सो अलग। देश व जनता का कुछ भला होता। आज मणिपुर में फिर हिंसा भड़कने की भी खबर है लेकिन पुष्टि नहीं हुई।
यह ठीक है कि प्रधानमंत्री ने डिजिटल अरेस्ट की चिन्ता की तो यह खबर है। जब कवि, पत्रकार और जानकार तथा दूसरे अनुभवी व पैसे वाले लोगों को शिकार बनाया जा चुका है तो इस तरह की सलाह से अब कितने लोगों का भला होगा, उसपर संदेह है। वैसे खबर यह भी है जो बताई नहीं गई है कि जनहित तो मन की बात में भी नहीं है जबकि जरूरत किसी को सतर्क करने की नहीं है। खबर सुनकर लोग सतर्क हो ही जाते हैं। जरूरत अपराधियों को पकड़ने, उनकी लगाम कसने की है। जेल में बंद अपराधी जब हत्या करवा दे रहा है पहले एक वसूली कर चुका है तो सतर्क रहकर कोई पैसे बचा लेगा लेकिन जिसके पास पैसे नहीं हैं (और ज्यादातर लोग ऐसे ही हैं) तो उन्हें कविता भी क्यों सुनानी पड़े? प्रधानमंत्री और मेरे ज्यादातर अखबारों को शायद इससे मतलब नहीं है और एक बहुत ही सामान्य सलाह को लीड बना दिया। गया है प्रधानमंत्री का काम यह नहीं है। उनका काम था अपराधियों को चेतावनी देना और यह बहुत पहले तथा पहली वारदात रिपोर्ट होने के बाद होना चाहिये था। कल तो उन्हें बताना चाहिये था कि फर्जी ईडी वाले कौन थे? हाल के किन मामलों में कितने अपराधी पकड़े गये। वो कौन हैं। पर समस्या यह है कि वे भी बेरोजगार होंगे और मामला फिर वहीं पहुंच जायेगा। इसलिए लोग बंटेंगे तो कटेंगे में फंसे रहें, यही सरकार के हित में है।
आज यह खबर हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों, अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में लीड है। अंग्रेजी अखबारों में यह दि एशियन एज में लीड है। इंडियन एक्सप्रेस में लीड के नीचे दो कॉलम में, हिन्दुस्तान टाइम्स में तीन कॉलम में, टाइम्स ऑफ इंडिया में सेकेंड लीड – टॉप पर लीड के बराबर तीन कॉलम में है। द हिन्दू में विज्ञापन खूब है इसलिए पहले पन्ने पर नहीं है। कई और खबरें हैं और इस लायक मानी जाती तो हो ही सकती थी जैसे द टेलीग्राफ में भी विज्ञापन के बावजूद सिंगल कॉलम में है। अखबार में इसका शीर्षक है, डिजिटल अरेस्ट से कैसे लड़ें उसपर एडवाइजरी। इस एक खबर के साथ-साथ आज अखबारों में जब ज्यादातर खबरें प्रधानमंत्री का प्रचार और छवि बनाने वाली हैं तब द टेलीग्राफ की लीड अमित शाह की है। फोटो के साथ तीन कॉलम की इस लीड का फ्लैग शीर्षक है, भाजपा ने (शेख) हसीना के पतन के बाद के डर का खेल किया। शाह ने घुसपैठ के बाद के भूत को जिन्दा किया। आपको लग सकता है कि केंद्रीय गृहमंत्री ऐसा कह रहे हैं, बांग्लादेश की सीमा का मामला है, अखबार ने लीड बनाया तो गलत क्या है?
बिल्कुल नहीं है। मैं ऐसा कुछ कह भी नहीं रहा हूं। मुद्दा यह है कि अंतरराष्ट्रीय सीमा से घुसपैठ रोकना सीमा सुरक्षा बल का काम है। यह बल केंद्र सरकार का है और गृहमंत्री के नियंत्रण में है। संभव है कि इस कारण उनके पास कोई खास सूचना हो। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उस सूचना को सार्वजनिक किया जाये। उसपर तत्काल कार्रवाई की जरूरत है ताकि घुसपैठ रुके। कोई नहीं चाहता कि घुसपैठ जारी रहे। सरकार ने प्रवेश के लिए कानून बनाये हैं फिर भी घुसपैठ से परेशान है। यह डिमांड एंड सप्लाई (मांग और पूर्ति) का मामला है लेकिन है तो अपनी गलती और जिम्मेदारी मानने की बजाय केंद्र सरकार इसका दोषी पश्चिम बंगाल सरकार को मानती है जबकि सीमा में घुस जाने के बाद किसी को पहचान कर अलग करना सीमा पर रोक लेने के मुकाबले बहुत मुश्किल काम है। तब भी अमित शाह ने कहा है और अमर उजाला ने अंदर के पन्ने पर छापा है, “ममता सरकार की शह पर हो रही घुसपैठ भाजपा आएगी, तभी होगी शांति : शाह।” दि एशियन एज में भी यह पहले पन्ने पर है। अव्वल तो अभी अशांति घुसपैठ के कारण नहीं, दिल्ली में प्रदूषण और दीवाली करीब होने के कारण है, बहराइच के कारण है, विमान उड़ाने की धमकियों के कारण है, ईडी ही नहीं फर्जी ईडी और वसूली के आरोपों और जेल में बंद गैंगस्टर के अथाह अधिकारों के कारण है। सरकार उनकी बात ही नहीं कर रही है और प्रधानमंत्री झारखंड में घुसपैठ की समस्या बता चुके हैं। स्थिति यह है कि बांग्लादेश में हिन्दू सताये जा रहे हैं फिर भी ना घुसपैठ कर रहे हैं ना नागरिकता ले रहे हैं। मुसलमान यहां मारे जा रहे हैं फिर भी बांग्लादेश वाले यहीं घुसपैठ कर रहे हैं और गुजरात वाले अमेरिका कूच कर रहे हैं।
कहने की जरूरत नहीं है कि यह सब भाजपा और नरेन्द्र मोदी की चुनावी राजनीति है और चूंकि उनके पास प्रचार के लिए कुछ नहीं है तो लोगों को ऐसे मामलों में फंसाकर रखना आसान है। इंडियन एक्सप्रेस की एक अलग खबर के अनुसार, जनवरी से अप्रैल 2024 के चार महीनों में भारत के लोगों ने डिजिटल अरेस्ट और फ्रॉड में 120 करोड़ रुपये खोये हैं। प्रधानमंत्री ने अगर अब इसपर बोला है तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि ऐसी ठगी उन्हीं लोगों की होती है जिनके पास पैसे होते हैं। ये कौन लोग होंगे। आज के समय में पैसे कमा सकने वाले लोग साधारण नहीं हैं और उन्हें रुको, सोचो और तब ऐक्शन लो जैसी सलाह से कुछ खास होना नहीं है फिर भी डिजिटल सुरक्षा के मंत्र के रूप में पेश किये गये हैं तो खबर हो सकती है लेकिन सरकार और अखबारों के काम का क्या हाल है। आज के अन्य लीड से समझ सकते हैं जो बाकायदा झारखंड और महाराष्ट्र के चुनावों के लिए हेडलाइन मैनेंजमेंट का परिणाम लग रहा है। एक प्रधानमंत्री, जो देश की, आम जनता की तमाम समस्याओं पर चुप हैं, गृहमंत्री काल्पनिक समस्या की बात कर रहे हैं वहाँ इंडियन एक्सप्रेस की लीड बता रही है कि सैनिक विमानों के लिए भारत की पहली निजी इकाई के उद्घाटन के लिए स्पेन के प्रधानमंत्री आज पहुंच रहे हैं। मामला वडोदरा में सी295 ट्रांसपोर्ट विमान के प्लांट का है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर दिल्ली में प्रदूषण की समस्या को लीड बनाया है। इसके अनुसाल दीवाली से एक दिन पहले दिल्ली की हवा की क्वालिटी का गंभीर होना तय है। दिल्ली में अभी तक गर्मी चल रही है वह भी चिन्ता की बात है और खबर है। लीड इजराइल-ईरान युद्ध की है लेकिन बगल में ब्रांदा टर्मिनस पर मची भगदड़ का है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, “भारत का बहुत महत्व है, मोदी युद्ध के अंत को प्रभावित कर सकते हैं : जेलेनस्की”। द हिन्दू में लीड का शीर्षक है, “आंकड़ों से पता चलता है, दूसरी तिमाही का निवेश 42.5% बढ़ा, कैपेक्स सुधरा।” यहां इजराइली हमलों से गाजा में 45 मरे और शांति वार्ता शुरू भी है। अमर उजाला और नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, रुको, (अपना) सोचो और ऐक्शन लो। आज जब अच्छी-अच्छी खबरें लीड हैं तो खबर यह भी है कि रविवार को कम से कम 50 विमानों में बम होने की धमकी मिली। सरकार ने सोशल मीडिया से कहा है। तब तक इंतजार कीजिये।


