
एक और ने सरकारी नौकरी करते हुए, सरकारी हथियार से गोली मारी थी – नाम पूछकर मारा था या दाढ़ी देखकर? उसे भूल गईं? ऑपरेशन सिन्दूर वाला याद है। यही है पॉलिटिक्स आप प्रचारक बने रहिए।
संजय कुमार सिंह
इंडियन एक्सप्रेस में आज पहले पन्ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का एक बयान है। उन्होंने कहा है, ऑपरेशन सिन्दूर तो सिर्फ ट्रेलर था, अब ब्रह्मोस पूरे पाकिस्तान में पहुंच सकता है। लीड के बराबर में यह चार कॉलम की खबर है जबकि किसी और अखबार ने इसे इतना महत्व नहीं दिया है। यह शीर्षक तो नहीं ही है। दि एशियन एज में यह तीन कॉलम में है, नवोदय टाइम्स में लीड है लेकिन शीर्षक है, पाकिस्तान की एक-एक ईंच जमीन ब्रह्मोस की जद में। अंग्रजी में यही शीर्षक दि एशियन एज में है। दोनों शीर्षक का अंतर स्पष्ट है। इंडियन एक्सप्रेस ने जो प्रमुखता दी है वह भी। सरकारी प्रचार की इस खबर को देशबन्धु ने पहले पन्ने पर नहीं रखा है और अमर उजाला में यह पांच कॉलम की लीड है। इस तरह, आप समझ सकते हैं कि मामला अंग्रेजी और हिन्दी से ज्यादा सरकार के समर्थन और विरोध का लग रहा है। इंडियन एक्सप्रेस में अगर ब्रह्मोस के सरकारी प्रचार को प्रमुखता मिली है तो दि एशियन एज बिहार के जंगल राज पर अमित शाह की राजनीति का प्रचार कर रहा है। इस राजनीति में भाजपा अपनी अच्छाई या अपने अच्छे काम बताने की बजाय 20 साल और उससे भी पुरानी कमजोरी या गलती को भुनाने में लगी है। इंडियन एक्सप्रेस ने आज जीएसटी में छूट का प्रचार किया है। आज उसकी लीड यही है। इंदिरा गांधी का चुनाव जिस अपराध के लिए खारिज हो गया था उससे ज्यादा गंभीर, बेशर्म अपराध इन दिनों चल रहा है और वह इस तरह प्रचारित भी नहीं था। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा की राजनीति अपनी अच्छाई और अपने काम से ज्यादा विपक्ष की बुराई पर टिकी हुई है। और विपक्ष के कम बुरे काम को भाजपा ज्यादा बड़े रूप में दोहरा रही है।
हालत वाशिंग मशीन जैसी हो गई है। भाजपा जिसपर आरोप लगती है वह भाजपा में शामिल हो जाए तो सब ठीक और यह अजीत पवार से लेकर हेमंत बिस्व सरमा के मामले में दिखता है। बात इतनी ही होती तो शायद स्थिति ऐसी नहीं होती। अभी हालत यह है कि कांग्रेस ने बिहार में एक पूर्व विरोधी को टिकट दे दिया है तो उसकी आलोचना हो रही है। दूसरी ओर, राहुल गांधी से अपेक्षा की जाती है कि वे चुनाव जीतने के लिए भाजपा की ही तरह काम करें। अगर कांग्रेस ऐसा कर दे तो आलोचना और नहीं करे तो भी आलोचना होती है कि ऐसे चुनाव जीता जाएगा? भाजपा का पूरा नेटवर्क यही काम करता दिख रहा है। राहुल गांधी के समर्थक या भाजपा के विरोधी भी ऐसे मामलों में कांग्रेस या महागठबंधन की आलोचना करते हैं। कुल मिलाकर, भाजपा कुछ भी करे तालिबान का विरोध-समर्थन दोनों सही है। तालिबान ने महिलाओं को प्रेस कांफ्रेंस में नहीं बुलाया, उसका बचाव किया गया और अगले दिन तालिबान ने महिलाओं को बुला लिया उनके सवालों के जवाब भी दिए लेकिन मीडिया के लिए यह खबर नहीं थी। यह भी नहीं कि हमारे प्रधानमंत्री 11 साल में टस से मस नहीं हुए तालिबान तो एक दिन में बदल गया। पूरे मामले की रिपोर्ट बहुत रूटीन मामले की तरह हुई। अमेरिका, चीन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध और विदेश नीति को समझने की कोशिश करने वाला पागल हो सकता है। हालांकि समस्या इससे नहीं है। समस्या यह है कि भाजपा का अपना नेटवर्क तो जो करता है, करता रहे। मीडिया उसकी पोल भी न खोले, लेकिन उससे अलग, स्वतंत्र अस्तित्व तो दिखाए। इमरजेंसी बुरी थी, इंडियन एक्सप्रेस ने विरोध किया लेकिन अघोषित इमरजेंसी अच्छी तो नहीं है और यह इंडियन एक्सप्रेस की खबरों से भी पता चलता है। फिर भी इंडियन एक्सप्रेस भाजपा का समर्थन कर रहा है। जब इंडियन एक्सप्रेस कर रहा है तो कहा जा सकता है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, मीडिया भी यही कर रहा है। द हिन्दू पर दबाव की चर्चा मैं पहले कर चुका हूं। आज द हिन्दू में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है और कई खबरें जो दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। संभव है, कारण यही हो कि सरकार को बुरी लग सकती हैं। पसंद तो नहीं ही आएगी।
मीडिया की उलटबांसी में हिन्दू-मुसलमान, पाकिस्तान का विरोध और ऑपरेशन सिन्दूर सब शामिल है। प्रधानमंत्री कर रहे थे अब राजनाथ सिंह भी कर रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस प्रचार कर रहा है जबकि हिन्दुस्तान टाइम्स में यह पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर भर है। द टेलीग्राफ में भी सिंगल कॉलम की खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर नहीं है। फिर भी सरकार, प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के हिन्दू मुसलमान, भारत पाकिस्तान और ऑपरेशन सिन्दूर करने का नतीजा है कि आज सोशल मीडिया पर यह पोस्ट दिखी। कहने की जरूरत नहीं है कि यह देश के हिन्दुओं (सनातनियों?) के दिमाग में पिछले 10-11 साल के दौरान भरे गए जहर का भी असर हो सकता है। अक्सर देखने में आता है कि सनातनियों की ‘आहत’ भावना संविधान और देश का नुकसान कर रही है। इसमें बहुत सारे लोगों की सोच एकतरफा हो गई है। इस पोस्ट को देखकर मुझे याद आया और मैंने कमेंट में लिखा भी है कि, एक ने सरकारी नौकरी करते हुए, सरकारी हथियार से गोली मारी थी – उसे भूल गईं? ऑपरेशन सिन्दूर वाला याद है। यही है पॉलिटिक्स आप प्रचारक बने रहिए। साफ है कि भारतीय जनता पार्टी और उसके लोगों के कारण देश की सामाजिक समरसता, गंगा जमुनी तहजीब सब संकट में है। लाभ सिर्फ भाजपा को है और वह है चुनाव जीतने का। इसके लिए उसपर वोट चोरी का आरोप तो है ही, यह सब भी दिख रहा है। भाजपा चुनाव जीतने के लिए जो करती है उसे पहले चाणक्य नीति कहा जाता था। भाजपा को आरएसएस के संगठन का लाभ मिलने और पन्ना प्रमुख तक का नेटवर्क होने की प्रशंसा होती रही है। पर अब जो पोल खुल रही है वह मुद्दा ही नहीं है। प्रचार हो रहा है सो अलग। अगर सनातन के अपमान और भावनाओं की बात की जाए तो धर्म निरपेक्ष और संविधान का सम्मान करने वाले लोगों की भावनाओं की पूछ ही नहीं है। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति हो गई है। इंसानियत का ही गला घोंटा जा रहा है।
देश के मुख्य न्यायाधीश ने भले ही आहत भावना वाले वकील साब को जूता फेंकने के लिए माफ कर दिया है, लेकिन जो स्थितियां हैं वो चिन्ताजनक हैं और अखबारों से ऐसा लग नहीं रहा है। समाज के भिन्न वर्गों के आहत लोगों को कानून हाथ में लेने की छूट नहीं दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने दबाव में हरित पटाखे चलाने की इजाजत तो दे दी लेकिन हर तरह के पटाखे बिक रहे हैं और पहले भी बिक रहे थे। इससे लगता नहीं है कि देश में कानून का राज है। आम लोगों के लिए संविधान के साथ कायदा-कानून समझना भी जरूरी होता जा रहा है। पर मीडिया इन सब से अलग अपनी में मस्त है। आज सुबह-सुबह सोशल मीडिया पर इस पोस्ट को पढ़कर मुझे याद आया कि पहलगाम में धर्म पूछकर मारा गया था तो कोई जरूरत नहीं थी कि इसकी खबर होती। खासकर तब जब पहले भी ऐसा हो चुका था। लेकिन जो सब हुआ उसमें ऑपरेशन सिन्दूर और उसे अभी तक भुनाना शामिल है। दूसरी ओर, विपक्ष जो कह रहा है वह खबर नहीं है। उदाहरण के लिए आज देशबन्धु में छपी खबर के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ऑपरेशन सिन्दूर को लेकर 52 बार दावा किया है कि उन्होंने ही युद्ध विराम करवाया। प्रधानमंत्री कुछ बोल नहीं रहे हैं। ट्रम्प ने प्रधानमंत्री से बात करने का दावा किया खंडन विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से करवाया गया जबकि प्रधानमंत्री एक्स पर लिख भर देते कि ट्रम्प से मेरी कोई बात नहीं हुई तो उन्हें यह कहने की जरूरत ही नहीं पड़ती कि ट्रम्प झूठ बोल रहा है। दूसरी ओर, ऐसे दावों का खंडन वित्त मंत्री करें या प्रवक्ता – विश्वसनीय नहीं लगता है। सब चल रहा है और सनातनियों को कोई शिकायत नहीं है उन्हें शिकायत मुख्य न्यायाधीश से ही है जो हर मामले में आम आदमी का राहत भले न दे पाएं बहुत सारे मामलों में देते ही हैं।
एक सरकारी सेवक ने भी नाम पूछकर गोली मारी थी। देश के नागरिकों के दिमाग में वह घटना नहीं है। दूसरी है। क्यों है या होगी मुझे बताने की जरूरत नहीं है। आप खुद सोचिए या समझिए। पहलगाम वाले तो आतंकी थे पाकिस्तान से आए थे। वैसे ही जैसे 2019 के चुनाव से पहले पुलवामा कर गए थे। तब घुस कर मारूंगा करके वोट मांगे गए, यहां जो हुआ कैसे हुआ अभी तक नहीं बताया गया है। यही पहलगाम के बाद हुआ। ट्रेन में नाम पूछकर मारने वाले के खिलाफ कार्रवाई भले हुई उसका उपयोग देश के नागरिकों के दिमाग में जहर भरने के लिए नहीं किया गया और इसी का असर है कि लोगों को एक घटना याद है, दूसरी नहीं जबकि दोनों एक जैसी हैं। सच पूछिए तो दूसरी और बुरी। उसमें हत्यारा सरकारी नौकर था, सरकारी ड्यूटी पर था। और सरकार का काम था कि वह दोनों से एक ही तरह से निपटती। आरपीएफ वाले ने सरकारी हथियार से नागरिकों की जान ली थी। वह भी नाम पूछकर या धर्म देखकर ही था। पहले वाले की ही तरह पहलगाम वाला भी अखबारों से ही पता चला और इस लिहाज से दोनों बराबर की घटना या अपराध थे। लेकिन सरकारी कर्मचारी के खिलाफ सरकार की कार्रवाई ऐसे हुई कि लोगों को पुलवामा और ऑपरेशन सिन्दूर ही याद है। सरकार पीआईबी से फैक्ट चेक करवा रही है। सोशल मीडिया पर भी गलत खबर देने के लिए एफआईआऱ हो रही है लेकिन ऐसी पोस्ट को नजरअंदाज किया जाता है। पोस्ट करने वाली भाजपा कार्यकर्ता है और पहले भी कार्यकर्ताओं या समर्थकों – प्रचारकों को मिला संरक्षण याद होगा। पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई भी कम से कम हम जैसे लोगों को तो याद ही है। और यह भी कि जेएनयू में कांड करने वाली शर्मा जी की बिटिया का अभी तक पता नहीं चला।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल–चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


