दीपक मिश्रा-
दोस्ती, अपराध और अदावत…, सोशल मीडिया पर शिफ्ट हुआ यूपी का बाहुबल? अभय सिंह का धनंजय सिंह पर बड़ा खुलासा? अभय सिंह ने the red ink से बात करते हुए दावा किया कि…. ये और गुड्डू मुस्लिम यमहा मोटरसाइकिल से एक लूट करने गये वहां इसे झटके (मिर्गी ) आ गए और ये गिर गया और इसके गाड़ी की लाइट टूट गई।
फिर जब ये वहाँ से भागा तो एक महिला दरोगा (भाटिया) ने इसे चेकिंग दौरान पकड़कर इसको 4-5 थप्पड़ लगाए… धनंजय सिंह के बारे में अभय सिंह का कहना है, ‘वह खुद को ऐसे दिखाता है जैसे जेपी आंदोलन से निकला नेता हो और दूसरों को छोटा दिखाने की कोशिश करता है।
आप पुराने पत्रकारों से पूछ लो, उस समय के अखबारों में छपा करता था- अभय सिंह का गुर्गा, अभय सिंह का चेला, अभय सिंह के पीछे चलने वाला। अब अपने आप को बड़ा दिखाने के लिए यह फर्जी बताएं बताया करता है।’
जब धनंजय सिंह ने अभय सिंह को पटका था….
वहीं एक निजी चैनल के इंटरव्यू में धनंजय सिंह ने अभय सिंह की कहानी बताते हुए कहा कि उन्होंने छात्र जीवन में एक बार कुश्ती के खेल में अभय सिंह को पटक दिया और फिर उनको अगली सुबह 104 डिग्री का बुखार आ गया था। फिर उन्होंने अपनी जेब से 400 रुपये खर्च करके अभय सिंह का इलाज कराया था।
वहीं जब एक इंटरव्यू में अभय सिंह से इस दावे को लेकर सवाल किया गया तो पहले वह हंसे और फिर कहा कि जब से यह रील चल रही है, तब से धनंजय सिंह ट्रोल हो रहे हैं। क्योंकि उन्हें वही लोग ट्रोल कर रहे हैं, जो इसकी सच्चाई जानते हैं।
मुख्तार अंसारी का गुर्गा कौन?
दोनों ही बाहुबलियों के बीच इस बात को लेकर भी दावा किया जा रहा है कि मुख्तार अंसारी के गुर्गे थे। पूर्व सांसद धनंजय सिंह ने आरोप लगाया कि विधायक अभय सिंह मुख्तार अंसारी, गुड्डू मुस्लिम और बबलू श्रीवास्तव के गुर्गे थे।
वहीं अभय सिंह आरोप लगाते हैं कि धनंजय सिंह एक समय पर हॉस्टल में मुख्तार अंसारी की तारीफ करते रहते थे। अभय सिंह ने कहा कि धनंजय सिंह उस वक्त मुख्तार चालीसा पढ़ा करते थे।
अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-
यूपी की राजनीति पर चढ़ा कफ सिरप का नशा !! योगी आदित्यनाथ को उनकी विरोधी लॉबी कफ सिरप कांड के बहाने चौतरफा घेरने में लगी है। इसको भांपते हुए मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से आज सपा का नाम लेकर यह पलटवार कर ही दिया कि जांच में कुछ सपा नेताओं का नाम सामने आना तय है।
कफ सिरप पर मची इस घमासान की शुरुआत भी सपा मुखिया अखिलेश यादव ने ही की थी, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री के बुलडोजर एक्शन को निशाना बनाते हुए कफ सिरप कांड में सजातीय नेताओं के शामिल होने के कारण कार्यवाही न करने का आरोप लगाया था। सपा नेता अभय सिंह तो खुलकर अपने पूर्व साथी मगर अब जानी दुश्मन बन चुके धनंजय सिंह पर इस कांड में शामिल होने का आरोप लगा रहे हैं।
उधर, धनंजय सिंह ने कफ सिरप कांड में अपनी किसी भी तरह की संलिप्तता से इन्कार कर दिया है और इस मामले में वह भी अखिलेश और अभय सिंह पर पलटवार करने में जुटे हुए हैं। लगता है साल 2027 के चुनाव तक भी कफ सिरप का नशा चढ़ा रहेगा…
सोशल मीडिया पर कफ सिरप कांड की चर्चा के बहाने पूर्वांचल के तमाम जीवित / दिवंगत माफियाओं के महिमा मंडन का कंटेंट नजर आने लगा है। हर जाति या समुदाय के लोग अपने-अपने माफिया को ज्यादा दबंग, ज्यादा कुख्यात, ज्यादा खतरनाक अपराधी बताने में लगे हैं। मानों इन्हीं से उनकी जाति या समुदाय की नाक बची हुई है।
अब ऐसे में कोई यह पूछे कि भाई वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजिनियर, साहित्यकार, समाजसेवक, ईमानदार नेता आदि पर ऐसी घमासान मचाते तो क्या छोटे हो जाते?
अपराधी, माफिया, गुंडे और तस्कर से अपनी-अपनी जाति / समुदाय का गौरव जोड़कर खुद और अपनी आने वाली नस्लों को क्यों गलत रास्ता दिखा रहे हैं? ऐसे जाति गौरव राज्य का तो जो हाल करेंगे, वह तो चिंता आपको नहीं है लेकिन कम से कम यह तो सोचिए कि आपके वंश में लोग अपराध करके जाति गौरव बढ़ाने में लग गए तो उसका अंत क्या होगा ? क्या हर अपराधी राजनीति में सफल ही होता है? ज्यादातर तो पुलिस, कोर्ट और दुश्मनों के जाल में फंसकर असमय ही विनाश को प्राप्त हो जाते हैं। चंद ही लोग अपराध में बचते बचाते राजनीति की सीढ़ियां चढ़कर सम्मानित नेता बन पाते हैं।
खैर, पूर्वांचल और बिहार के लोगों को बस इसी विषय पर समझा पाना तकरीबन असंभव ही है। ताकत और धन, किसी भी रास्ते से हासिल हो, जब यही मकसद कोई अपने जीवन का बना लेता है तो फिर उसे उसकी नियति ही उसकी मंजिल पर ले जाकर सही या गलत फैसला होने का बोध करा पाती है।
इक महल हो काले धन का….
एसटीएफ के बर्खास्त सिपाही आलोक सिंह के करोड़ों रुपए के आलीशान महल ने सोशल मीडिया पर एक नया सिलसिला शुरू कर दिया है। जिसमें उत्तर प्रदेश के उन सरकारी अधिकारी, कर्मचारी, नेता आदि के घरों की तस्वीरें लोग शेयर कर रहे हैं, जो महलनुमा हैं।
उधर राज्य के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने कुछ इंटरव्यू में लखनऊ के इंदिरा नगर स्थित अपने MIG घर का ब्योरा देते हुए आलोक सिंह के करोड़ों के महल की अब तक अनदेखी करने के लिए पुलिस के आला अधिकारियों को जमकर लताड़ा है। उन्होंने तो ऐसे भ्रष्ट पुलिस कर्मी या सरकारी कर्मचारी / अफसरों के माता पिता तक को यह कहकर दोषी ठहराया है, कि ऐसी लूट मचाने वाली औलाद का लालन पालन करने वाले ही असल दोषी हैं।
हालांकि, विक्रम सिंह की इस कड़वी बात को सोशल मीडिया पर सभी सही नहीं ठहरा रहे यह कहकर कि माता पिता को इसमें घसीटना ठीक नहीं है।
बहरहाल, यह तो सभी मान रहे हैं कि लखनऊ से लेकर यूपी के लगभग सभी जिलों के शहर/ कस्बे / गांव में ऐसे न जाने कितने महल जगमग करते दिख रहे हैं। मगर भ्रष्टाचारी खोजने निकली सीबीआई/ ED को कभी कभार ही कोई नजर आता है। वह भी तब , जब वह काले धन की ऐसी गंगा बहा देता है, जो किसी विकराल सागर की तरह राज्य से निकल कर देश ही नहीं विदेशों तक हिलोरे मारने लगता है।
अब social media पर यह जो नया सिलसिला चला है, उसे देखकर ऐसा लगता है कि जनता जिन्हें काला धन से बना महल मान रही है, वे सब मेहनत और ईमानदारी से कमाई दौलत से बनाए गए हैं। वरना कभी तो कोई उनसे सवाल पूछता , जिन्होंने बेखौफ होकर ऐसे महल बना रखे हैं…
विनय मौर्या-
कोडीन कांड के बाद से ही माफियाओं के वर्चस्व की लड़ाई सार्वजनिक हो गयी है। सबके पक्ष विपक्ष में चर्चा हो रही है। मेरे कई पत्रकार साथी माफिया से माननीय बने नेताओं के साथ उठते-बैठते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, मौके-बेमौके किसी न किसी मामले में पैरवी भी कराते हैं। जरूरत पड़ने पर गांधी जी की तस्वीर वाला लिफाफा भी पा जाते हैं। मगर कई नुकसान के बावजूद पत्रकारिता की शुरुआत से लेकर आज तक मैंने ऐसे माफिया से माननीय बने लोगों से एकदम दूरी बनाकर रखी है। इधर-बीच कई बार कई पत्रकार और अन्य साथियों ने मुझसे कहा भईया चलिए, फलाने भईया (माफिया) से मिला दूं, भेंट करा दूं। मैं हर बार विनम्रता से मना करता आया हूं। वजह साफ है मुझे माफियाओं के मायाजाल से, उनसे मिलने वाले लोभ-लाभ से न कभी अपेक्षा रही और न ही जरूरत महसूस हुई।
दूसरी और बड़ी वजह यह है कि जिससे दो-चार बार बात-मुलाकात हो जाए, व्यवहार बन जाए, उसके खिलाफ न तो मैं बोल पाता हूं और न ही उसके खिलाफ अखबारी मोर्चा खोल सकता हूं। मेरा उसूल है कि जिससे व्यवहारिक संबंध बन जाए, अगर वह गलत भी हो तो उसके खिलाफ सब हो जाएं, उसके लिये कुछ न कर सकूं तो मैं न समर्थन करूंगा और न विरोध। इसी वजह से मैं जानबूझकर बन्तु नेता, माननीय, माफिया, अधिकारी या कर्मचारी से जल्दी मेल-जोल नहीं बढ़ाता, ताकि किसी मुद्दे पर मोर्चा खोलते वक्त आत्मसंतुष्टि रहे कि मेरा उससे कोई लेना-देना नहीं है।
जिनसे संबंध हैं, वे हकपूर्वक हैं ताउम्र रहेंगे, बिना लाभ-हानि की फिक्र के। मैं महाभारत के कर्ण के चरित्र को आत्मसात करता हूं कोई अच्छा हो या बुरा, अगर मेरा है तो उसे नसीहत दूंगा, मगर पाले में उसी के रहूंगा, यही मेरा नेचर है। मेरा जिससे भी रिश्ता होता है, वह औपचारिक नहीं बल्कि दिली होता है।
मेरे कई साथी मुझे बिरजू भाई से मिलाने की कोशिश करते रहे, मगर मैंने 2015 की अपनी यही खबर दिखाकर माफी मांग ली। मेरी बिरजू भाई के प्रति कोई व्यक्तिगत नकारात्मक सोच नहीं है, बस अपने उसूलों से समझौता करना मुझे मंजूर नहीं।
हां, एक माफिया से माननीय बने, वर्तमान सत्ता के नजदीक जन्म से चोलापुरिया, कर्म से मिर्जापुरिया व्यक्ति से चार साल पहले दूसरे पत्रकार के साथ मुलाकात हुई थी। सुरक्षात्मक दृष्टिकोण से थर्टी की पिस्टल सामने रखकर बात करने वाले उस शख्स ने प्रभावित किया पत्रकारिता, धर्म, अध्यात्म हर विषय पर सटीक और धाराप्रवाह चर्चा की।
धर्म पर उन्होंने एक लंबा व्याख्यान भी दिखाया था। एक उसूल की बात उन्होंने कही थी, जिसकी चर्चा नहीं कर सकता, क्योंकि वह उनके आपराधिक इतिहास से जुड़ी है।
बहरहाल, उनसे क्या किसी भी माफिया से माननीय बने या बनते नेता-अधिकारी से मिलने का मन नहीं होता। मेरे संबंधों में जो नेता, अधिकारी, पत्रकार मित्र, बड़े-छोटे भाई हैं, वे अपने-आप में इतने बेहतरीन सोच, विचार, कर्म और व्यवहार के हैं कि मुझे रिश्तों की सम्पूर्णता का एहसास होता है। बस उन्हीं से संबल सहयोग स्नेह पाऊं यही बहुत है। बाकी जो है, सो हइये है।



