अवनीश कुमार-
इतने बड़े और संवेदनशील मुद्दे पर दैनिक भास्कर को इस तरह की ‘फर्जी’ और भ्रामक तथाकथित इन्वेस्टिगेशन को इतने हल्के में नहीं लेना चाहिए। इसका सामाजिक स्तर पर बहुत गंभीर और नकारात्मक परिणाम हो सकता है।
बिहार में वैसे भी छोटे शहरों में अच्छे कॉलेज या शिक्षण संस्थान नहीं हैं, जिसकी वजह से लड़कियां पहले से ही उच्च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाती हैं। जो कुछ सुविधाएं हैं, वे भी मुख्य रूप से राजधानी पटना तक सीमित हैं।लेकिन भास्कर की इस बिना सिर-पैर वाली और भ्रामक तथाकथित इन्वेस्टिगेशन से अब छोटे शहरों की लड़कियों का राजधानी तक आना भी मुश्किल हो सकता है। इस तरह की स्टोरी समाज में डर पैदा करेगी और गांव के लोग अपनी बेटी या बहन को शहर भेजने से कतराएंगे। इसका परिणाम क्या होगा, यह सभी जानते हैं।
अखबार का काम सिर्फ सनसनी फैलाना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह भी सोचना चाहिए कि किसी खबर का समाज पर क्या असर पड़ेगा।
संभव है कि पटना के कुछ गर्ल्स हॉस्टल अवैध गतिविधियों में संलिप्त हों, लेकिन इस तरह की स्टोरी ने पूरे पटना को सामान्यीकृत कर दिया है। इस फर्जी इन्वेस्टिगेशन को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि पटना की अधिकांश गर्ल्स हॉस्टल और उसमें रहने वाली अधिकांश कॉलेज छात्राएं और स्टूडेंट्स इसी तरह के धंधों में शामिल हैं, जो पूरी तरह गलत और खतरनाक धारणा है।
ऐसी स्टोरी केवल ठोस और पुख्ता सबूतों के साथ ही की जानी चाहिए। एक और सवाल यह भी है कि अगर यह इन्वेस्टिगेशन इतनी ही सही है, तो इसे अखबार में क्यों प्रकाशित नहीं किया गया। यहीं से अखबार की नीयत पर संदेह पैदा होता है।
दैनिक भास्कर डिजिटल का यह कोई नया तरीका नहीं है। फर्जी और भ्रामक स्टोरी करने का इसका पुराना रिकॉर्ड रहा है। खोजने पर ऐसी दर्जनों मिसालें मिल जाएंगी।
कुछ दिन पहले ही एमएसएम और एचआईवी को लेकर पटना से जुड़ी एक फर्जी स्टोरी प्रकाशित की गई थी, जिसे बाद में बिहार के एड्स विभाग ने खारिज कर दिया।
पटना और बिहार पुलिस को भी चाहिए कि वे दैनिक भास्कर की इस रिपोर्ट की जांच करें और सच को सामने लाएं।



