Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

दिल्ली

सरकार प्रदूषण नहीं कम कर रही, AQI मैनेज कर रही है, सरकार के डरावने चरित्र को यह खबर स्पष्टता से हमारे सामने रखती है!

दयाशंकर मिश्रा-

सरकार AQI मैनेज कर रही है! प्रदूषण कम करने का प्रयास नहीं कर रही है। सरकार के डरावने चरित्र को यह खबर स्पष्टता से हमारे सामने रखती है। जनता पटाखे फोड़कर हिंदू होने का उत्सव मना रही है, सरकार AQI को मैनेज करके ज़हर को ज़िंदगी बता रही है।


The Indian system doesn’t allow values above 500 while the US system allows values above 500. But this doesn’t explain why Siri Fort was showing 272 in CPCB when IQAir was showing 2449. Imagine the level to which official AQI data is being subdued.

-Sushant Singh


सरकार उस काम में लग गयी जिसमें उसकी महारथ है..अब वह आंकड़े साफ़ कर रही है! यहाँ लोगों की सांस रुक रही है लेकिन इनकी फाइलों में सब ‘Normal’ है।

अरे बेशर्मों कितना नीचे गिरोगे..क्या अब ज़हर को भी विकास बताओगे? थू है!

-नीरजा


शीतल पी सिंह-

दिल्ली: दुनियां का सबसे वायु प्रदूषित शहर! रिजल्ट फिर वही आया जो आना था बस फर्क यह है कि अब दिल्ली में ठीकरा फोड़ने के लिए केजरीवाल सरकार का सर नहीं है इसलिए प्रचार प्रसार की बंदूकें पंजाब की पराली पर लग रही हैं या आंकड़ों की हेराफेरी पर निर्भर हैं।

भारतीय प्रणाली में एक्यूआई के मान 0 से 500 के बीच सीमित होते हैं। इसका मतलब है कि जब वायु गुणवत्ता बहुत खराब होती है, तो भी यह 500 से ऊपर नहीं जाती। दूसरी ओर, अमेरिकी प्रणाली, जैसे कि आईक्यू एयर द्वारा उपयोग की जाती है, 500 से ऊपर के मानों की अनुमति देती है।

सिरी फोर्ट में सीपीसीबी के अनुसार एक्यूआई 272 था, जबकि आईक्यू एयर ने इसी स्थान के लिए 2449 का मान दिखाया।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज पता नहीं कैसे साहस दिखाया, उसकी रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) के मानों में अंतर देखा गया है। सीपीसीबी के अनुसार, एक्यूआई 400 से नीचे था, जबकि आईक्यू एयर जैसे अंतरराष्ट्रीय ऐप्स ने 2000 से ऊपर के मान दिखाए।



प्रभाकर कुमार मिश्रा-

जब अदालतें दबाव में फैसला करेंगी तो नतीजे ऐसे ही होंगे!
पिछले चार सालों में इस साल दिवाली पर दिल्ली की हवा सबसे अधिक ख़राब है। सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन पटाखे जलाने की इजाजत दी थी। लोगों ने उस फैसले का स्वागत कुछ इस तरह से किया है कि अपनी सांसों में खुद ही ज़हर घोल दिए।

NITI आयोग के पूर्व CEO अमिताभ कांत ने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट ने सांस लेने के अधिकार की जगह पटाखे जलाने के अधिकार को प्राथमिकता दी, इसलिए ऐसा हुआ है।

अमिताभ कांत ने अब ऐसा लिख दिया, शायद पद पर होते तो ऐसा लिखने से परहेज करते। क्योंकि आजकल ऐसा लिखने, बोलने वालों को सनातन विरोधी घोषित होने का ख़तरा है। CJI जस्टिस गवई की बेंच का फैसला भी इसी दबाव में दिया गया फैसला था। भगवान विष्णु को लेकर उनकी टिप्पणी से सनातन विरोधी होने का आरोप झेल रहे जस्टिस गवई को सांस लेने के अधिकार की जगह पटाखे जलाने के अधिकार को प्राथमिकता देनी पड़ी, जिसकी कीमत आज सबको चुकानी पड़ रही है।

जब अदालतें दबाव में फैसला करेंगी तो नतीजे ऐसे ही होंगे!


Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन