सौमित्र रॉय-
दिल्ली के एक मित्र मनोज अरोड़ा हैं। कल उनकी बेटी ने दिल्ली मेट्रो में सवार होने के बाद पिता को मैसेज भेजा। कुछ लड़के लेडीज डिब्बे में घुसे हुए थे। डिब्बे में बाकी औरतों को घूर रहे थे, लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।
सब अपने काम में जुटे थे। जाने भी दो यारों स्टाइल से। लेकिन, इस लड़की ने अकेले आवाज उठाई तो अगले स्टॉप पर लड़के उसे घूरते हुए निकल गए।
अब मनोज अरोड़ा जी कह रहे हैं कि वे जल्द से जल्द अपनी इस छोटी बेटी को विदेश में सैटल कराना चाहते हैं। उनकी बड़ी बेटी फिनलैंड में सैटल है। बेशक सैटल हो जाए, लेकिन उस डिब्बे की बाकी लड़कियों का क्या होगा? क्या हर बाप को यही करना चाहिए? क्या यह मुमकिन है?
या फिर एक दूसरा रास्ता मिलकर सिस्टम को सुधारने का है? जब इस लड़की ने आवाज उठाई तो किसी ने उसका साथ नहीं दिया। कुछ वीडियो बनाते रहे।
इसीलिए, मनोज अरोड़ा जी को भागने का रास्ता आसान लगा, दूसरा वाला नहीं।
आप बेंगलुरु या कोलकाता चले जाएं। हालात उल्टे मिलेंगे। ऐसी किसी स्थिति में सामूहिक विरोध सिस्टम को दुरुस्त, सुरक्षित करता है। सवाल सिर्फ इतना है कि आप अपने शहर को कैसा बनाना चाहते हैं।
सिस्टम को बेदाग, महफूज बनाने के लिए आपको जवाबदेही मांगनी होगी। उसके लिए खुद जवाबदेह बनना होगा। एक नागरिक के रूप में देश के प्रति आपकी जवाबदेही क्या है?
गलत को समझना और उसका प्रतिकार करना। अगर 5 लोग भी इसे समझने लगें तो बखेड़ा बड़ा होगा। लेकिन, क्या 5 लोग साथ आयेंगे? अमूमन नहीं आते, क्योंकि आपने अपनी कम्युनिटी को मोबाइल तक सीमित कर आभासी बना दिया है।
उस 19 साल की शर्मिष्ठा के समान, जो संघी ट्रॉल्स के बहकावे में आकर कानूनी झमेले में फंस गई। आज बिल्कुल अकेली है। आप पाएंगे कि छुट्टी के दिन अब सांस्कृतिक और सामुदायिक आयोजन कम हो चले हैं। धार्मिक ज्यादा होते हैं, जिनमें आधी आबादी को पितृसत्ता के अधीन बताया जाता है।
मेरे ज़माने में सामुदायिक गैर धार्मिक आयोजनों से हरेक का व्यक्तिगत सामुदायिक दायरा बढ़ता था। बाजार में मित्रों का आए दिन टकराना, अचानक भीड़ में से आती आवाज़ें, उठते–हिलते हाथ। छोटे–छोटे सामाजिक काम, एक–दूसरे का हाथ बंटाना। दोस्ती रिश्तेदारी में बदलती और लोग हमें पहले से ज्यादा जानते। दायरा बढ़ता जाता।
आज शहर फैल चुके हैं, पर हम, हमारा सामुदायिक दायरा सिकुड़ता गया। गांधी के सेवाग्राम में थूकने का किस्सा तो सुना होगा। बापू ने पहला थूक खुद उठाया। सामुदायिक शौचालय खुद साफ किया। अकेले। कारवां तो बाद में बना।
अब नहीं बनता। हम ही झिझकते, टालते हैं। यह सोच कि कौन साथ देगा? डर कि हम अकेली न पड़ जाएं। कहीं कदम उठ भी जाएं तो सबक सीखना नहीं चाहते। मान लेते हैं कि बेटी बहादुर थी, हम नहीं।
दरअसल, हमने सिस्टम को कभी अपना माना ही नहीं। सरकारी सिस्टम है। सरकार ही सुधारे। जब सामुदायिकता की भावना खत्म हो जाती है तो सिस्टम ठेके पर चलने लगता है। पूंजीपतियों के द्वारा। उन्हीं के लिए, उन्हीं को समर्पित। उनके पाले हुए गुंडे आपके डर का फायदा उठाकर मनचली हरकत करते हैं।
यह एक चेन रिएक्शन है, जो बिजली की तेजी से समाज के आखिरी छोर तक पहुंचता है। खौफ पैदा करता है। मनोज अरोड़ा संपन्न हैं, पर डरे हुए हैं। बेटी की सुरक्षा के लिए चिंतित।
बेफिक्र हैं वे महिलाएं, जो रील्स में जीती हैं, जो कार से जाती हैं, जिनके पास भाई–बाप–या पुरुष बॉडी गार्ड हैं। या फिर वे, जो ब्लॉक प्रोफाइल, मुंह ढांककर पहचान छिपाती हुई किसी कोने में दुबकी हैं। लेकिन वे तो और भी सुरक्षित नहीं हैं, क्योंकि उन्हें भीड़ में बहुत कम ही पहचान पाएंगे।
इस अलगावपन, अकेलेपन ने सिस्टम की बेहतर जवाबदेहिता के लिए उठती चंद आवाज़ों का हमेशा गला घोंटा है। समाज को असुरक्षित किया है। नतीजा यह कि अब देश ही अकेला पड़ चुका है।




Timmappa Kamat
June 2, 2025 at 7:16 am
Kis cheez ko kahan lekar ja raha hai? Chatukarita band kar. Dharmik anushthan aur samudayik anushthan dono hai. Tujhe nahin dikh rahe hain..
Ek baat samajh le. Sharmishtha ne koi galti nahin ki hai. Woh bilkul sahi hai. Agar Sharmishta galat hai to, sanatan dharm ko galat ya ganda kehnewali Mamta bannerjee koun hai?