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माफ करना! दैनिक भास्कर पत्रकारिता नहीं, देश को गुमराह कर रहा है!

कन्हैया शुक्ला-

रीबों को लूट लो और अपनी संपती टैक्स फ्री देशों में ट्रांसफर कर दो, यही रीत चली आ रही है देश में. जिसका जो धर्म है वही करना उसे शोभा देता है, एक खिलाड़ी का काम है खेलना, एक गायक का धर्म है गाना, एक वैद्य का काम है उपचार करना, एक सैनिक का काम है हमारी रक्षा करना। यदि ये अपना धर्म (काम) छोड़कर चापलूसी करने लगे तो उनका सम्मान ही नष्ट हो जाएगा।

कुछ ऐसा ही काम दैनिक भास्कर का है, जो अमीरों को देश का मसीहा और गरीबों को कलंक दिखा रहा है। पर सच्चाई उल्टी है। 7 जुलाई को प्रकाशित खबर “2% लोगों पर ही टैक्स का 100 प्रतिशत बोझ क्यों?” खबर में यह बताने की कोशिश की गई कि अमीर ही देश के मसीहा हैं। पर टैक्स का वास्तविक बोझ तो गरीबों के कंधे पर ही है।

https://twitter.com/vinaysheel_inc/status/1809571276698034649?s=46

Survival of the Richest: The India Story’ टाइटल वाली Oxfam की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘टोटल GST के दो-तिहाई से थोड़ा कम यानी 64.3 प्रतिशत हिस्सा सबसे सबसे गरीब 50 फीसदी आबादी से, एक-तिहाई GST को 40 फीसदी मिडिल क्लास से कलेक्ट किया जा रहा है। वहीं देश के सबसे धनी 10 प्रतिशत लोगों की GST में भागीदारी सिर्फ 3-4 प्रतिशत है।’ (वित्त वर्ष 2022 में) जबकि दौलत की बात करें तो देश की 1 प्रतिशत सबसे अमीर आबादी के पास भारत की कुल दौलत का 40.6 प्रतिशत हिस्सा है। वहीं सबसे गरीब 50 फीसदी आबादी के पास कुल वेल्थ का सिर्फ 3 फीसदी हिस्सा ही है।

अमीरों पर टैक्स कम हुआ है
अमीरों पर टैक्स का बोझ बढ़ा नहीं कम हुआ है। 2010 में केंद्र के कुल राजस्व में हर 100 रुपये में से 40 रुपये कंपनियों से आते थे और 60 रुपये आम जनता से। अब सरकार 75 रुपये जनता से और 25 रुपये कंपनियों से वसूलती है। (सोर्स-इंडिया रेटिंग्स) मतलब गरीबों पर 2010 के बाद 15% टैक्स का बोझ बढ़ा है। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि अमीर मनी लांड्रिंग, हवाला आदि स्रोतों से अपनी कमाई का वेल्थ दूसरे देशों में ट्रांसफर कर रहा है।

अमीरी की असल सच्चाई
दरअसल भगवान ने हर व्यक्ति को एक दिन में 24 घंटे का ही समय दिया है, लेकिन अमीर, आम लोगों का समय खरीदकर इस 24 घंटे को एक दिन में 24 लाख घंटे कर लेता है और अमीर बन जाता है। और यह समय खरीदने के लिए वह उसी गरीब के बैंक में रखे पैसा यूज करता है। ब बात आती है टैक्स देने की तो अमीर बोलता है कि मैं तो बहुत घाटे में हूं, मुझे बैंक का लोन पटाना है। और टैक्स भी नहीं देता। यहां एक रोचक बात यह भी है कि एक उद्योगपति अक्सर विदेशी बैंकों से कर्ज लेता है यह कर्ज सिर्फ कागजों में होता है। क्योंकि कर्ज वह पहले ही पटा चुका होता है और लोन पटाने के नाम पर अपना पैसा बाहर भेजता रहता है। र इनके लिए मेहरबान मोदी सरकार वेल्थ टैक्स (संपदा कर) में कटौती कर चुकी है।

गरीबों का हर तरफ से शोषण
गरीब के ही बैंक का पैसा लेकर उसे नौकर रखने वाले अमीर मजदूरों को न्यूनतम वेतनमान भी नहीं देते। समाचार पत्रों में मजीठिया वेज बोर्ड (न्यूनतम वेतनमान) पाने के लिए कर्मचारी आज भी संघर्ष कर रहे हैं, पर सरकार, कोर्ट सभी पैसों के आगे नतमस्तक हैं। अमीर उसी गरीब से अनाज इतनी कम लागत में खरीदते हैं जितनी उसकी लागत मूल्य भी नहीं होता और उसी को महंगे दामों में बेचते हैं। किसान अब बोनी करता है तो उसी फसल के दाम आसमान छू जाते हैं क्योंकि वह खरीदी करता है। और जब उसे बेचने बाजार में जाता है तो उसके दाम लागत मूल्य से भी कम हो जाते हैं। अमीरों के लिए न्यूनतम लागत मूल्य नहीं जबकि गरीबों के लिए न्यूनतम मजदूरी और न्यूनतम समर्थन मूल्य है। अभी टेलीकॉम की प्राइवेट कंपनियों ने रिचार्ज दरों में वृद्धि की, लेकिन यह नहीं बताई कि किस खुशी में रिचार्ज दरों को बढ़ाया गया। कितना घाटा हो रहा है, क्यों हो रहा है?कुल मिलाकर गरीबों को लूट लो और अपनी संपती टैक्स फ्री देशों में ट्रांसफर कर दो, यही रीत चली आ रही है देश में।

दैनिक भास्कर भी दूध का धुला नहीं
यह वही समाचार पत्र है जिस पर एक हजार से ज्यादा सेल कंपनियां बनाकर ब्लैक मनी व्हाइट करने का आरोप है, ईडी और आयकर विभाग के छापे पड़ चुके हैं। यह वही इमानदार समाचार पत्र है जो अपने कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड नहीं दे रहा है। भोपाल में जिसके स्कूल और मॉल के जमीन आवंटन को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

एक टिप्पणी यह भी पढ़ें-

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1 Comment

1 Comment

  1. Anil Kumar

    July 8, 2024 at 9:52 am

    इन्कम टैक्स दोवारा रेड करें

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