अमित चतुर्वेदी-
उपराष्ट्रपति सर के कार्यालय द्वारा जारी किए गए उनके आगामी दिनों के कार्यक्रम की सूचना जारी हो चुकी थी। शाम को चार बजे उनके कल राजस्थान जाने और परसों एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने का प्रोग्राम दिया गया था। यानी शाम को चार बजे तक ख़ुद धनकड़ साहब को उनकी ख़राब सेहत के बारे में पता नहीं था। उन्हें उनकी ख़राब सेहत के बारे में किसने बताया होगा और किसने इस्तीफ़ा देने कहा होगा, ये तो कोई बालवीर भी बता देगा…लेकिन यदि 74 वर्ष के व्यक्ति उम्र और सेहत का हवाला देकर इस्तीफ़ा देते हैं तो फ़िर 75 वाले फिटनेस के लिए कितनी कितनी अश्वगंधा और शिलाजीत खाएँगे, एक दिन उनका भी डाउन होगा…विकेट…

जगदीप धनखड़ ने आज 4:20 तक राज्यसभा का संचालन किया । लोकसभा भले नहीं चला लेकिन राज्यसभा में कुछ कामकाज हुआ।मानसून सत्र के पहले दिन अचानक फिर रात में इस्तीफा दे देना सामान्य घटना नहीं हो सकती। शाम को 6:00 बजे उन्होंने विपक्षी नेताओं के साथ भी बैठक की। पीआईबी की प्रेस विज्ञप्ति आया था जिसमें कहा गया था कि उपराष्ट्रपति 23 जुलाई को 2 दिन के दौरे पर राजस्थान जाने वाले हैं। तो इसके पीछे कारण क्या हैं ?क्या यह किसी तरह के राजनीतिक संकट का परिचायक है? -अवधेश कुमार
मनोज अभिज्ञान-
पिछले कुछ महीनों में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा जस्टिस यशवंत वर्मा ‘कैश कांड’ जैसे संवेदनशील मामलों पर बार-बार सवाल उठाना सामान्य प्रतीत नहीं होता। उन्होंने जिस तरह खुले मंचों से पूछा, “बड़े शार्क कौन हैं?”, “अब तक एफआईआर क्यों नहीं हुई?”, वह न केवल न्यायपालिका की आंतरिक प्रक्रियाओं पर गंभीर शंका की ओर इशारा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कहीं न कहीं सत्ता और व्यवस्था के भीतर कुछ ऐसा है जिसे छुपाया जा रहा है। जब कोई संवैधानिक पदाधिकारी इस प्रकार की टिप्पणी करता है, तो यह संयोग नहीं हो सकता। यह संकेत है कि पर्दे के पीछे कुछ ऐसा चल रहा है जो सामने नहीं लाया जा रहा।
इसी क्रम में अचानक उनका स्वास्थ्य का हवाला देकर दिया गया इस्तीफा भी सवालों से घिरा है। क्या यह सचमुच केवल चिकित्सा सलाह थी या फिर किसी दबाव का नतीजा? क्या उन्होंने जिन बड़े शार्कों की बात की, वे अब उभर कर बाहर आने से रोक दिए गए हैं? उन्होंने सीधे किसी का नाम नहीं लिया, शायद इसलिए कि नाम लेना संभव नहीं था। लेकिन जिस तरह से उन्होंने व्यवस्था के भीतर मछलियों के आकार की बात की और उसी के बाद उनकी भूमिका समाप्त हुई, वह सबकुछ सामान्य नहीं लगता। यह कहानी अधूरी है, और किसी न किसी दिन पूरी होगी, लेकिन यह तय है कि मामला केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं था।

धनकड़ साहब ने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. अगले उपराष्ट्रपति तो वे दो लोग तय करेंगे, पर मैं कुछ संभावित नाम सजेस्ट कर देता हूँ: जेपी नड्डा, राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथ, नीतीश कुमार, पवन कल्याण, राज ठाकरे, निर्मला सीतारमण, शशि थरूर, लल्लन सिंह आदि. बाक़ी हरिवंश जी तो हैं ही! – प्रकाश के रे

पंकज प्रसून-
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। उन्होंने अपने इस्तीफ़े में स्वास्थ्य कारणों को वज़ह बताया है।
लेकिन राज्यसभा में जिस तरह कुछ विपक्षी सांसदों ने उनका अपमान किया, उसके बाद आहत होकर इस्तीफ़ा देने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता।
बड़ा अजीब दौर है, प्रधानमंत्री या सत्ता पक्ष को घेरने की बजाय संवैधानिक संस्थाओं और पदों पर सीधा अटैक किया जा रहा है। चुनाव आयोग, संसद के स्पीकर, राज्यसभा के सभापति, सेना, CJI आदि कोई भी संस्था को नहीं छोड़ा गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तक को “राष्ट्रपत्नी” कह अपमानित किया गया।
इमरजेंसी के दौरान विपक्ष के तमाम नेता जेल गए, सत्ता के दुरुपयोग की पराकाष्ठा थी, अखबारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, इसके बावजूद विपक्ष ने कभी संवैधानिक संस्थाओं को निशाने पर नहीं लिया।
उस वक्त राष्ट्रपति कैसे बने, सबको पता है। इंदिरा गांधी के कार का दरवाज़ा खोलने राष्ट्रपति बढ़े थे, तब इंदिरा गांधी ने डांट दिया था, “अब आप राष्ट्रपति पद पर हैं” ।
देश ने राम मंदिर आंदोलन, 1962 का पराजय, घेराव, संतों पर गोलीबारी सब देखा, लेकिन किसी ने स्पीकर पर सवाल नहीं उठाया। लेकिन आज वो दौर भी है, जब देश का नेता प्रतिपक्ष उप राष्ट्रपति के चाल की नक़ल करता दिखा।
राष्ट्र जगदीप धनखड़ को न्यायपालिका की कमियों और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ़ खुलकर बोलने वाले उप राष्ट्रपति के रूप में याद करेगा।
जगदीप धनकड़ कई बार लगते हैं स्वाभिमानी हैं, कई मर्तबा साहसिक बातें भी कहीं। लेकिन उनके कार्यकाल को एक चाटुकार, बदतमीज़ और रीढ़विहीन व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा। सभापति के रूप में उन्होंने सदन की गरिमा को निम्न स्तर पर पहुंचाया। ऐसे हल्के व्यक्तित्व संवैधानिक पद पर शर्म हैं। आज जब सभापति रहते हुए सदन में उनके व्यवहार को याद कर रहा हूँ तो बुरा लग रहा है। विपक्षी नेताओं के प्रति उनका व्यवहार उस खुले ग़ुलाम के व्यवहार की तरह रहा जो मालिक द्वारा संचालित था। जिसका स्वयं का कोई स्वाभिमान नहीं। इतना हल्का, बदतमीज़ सभापति शायद ही भारतीय इतिहास में रहा हो। -श्याम मीरा सिंह
राकेश कायस्थ-
उपराष्ट्रपति बनने के बाद से जगदीप धनखड़ की अपनी सेहत ज्यादा खराब हुई या फिर संसदीय लोकतंत्र की? धनखड़ का इस्तीफा मोदी काल का पिछले 11 साल का सबसे नाटकीय घटनाक्रम है।
राज्यसभा के इतिहास में कोई ऐसा सभापति नहीं हुआ जिसने धनखड़ सरीखा लठैतों जैसा आचरण किया हो। असल में उन्हें यह कुर्सी ही बंगाल के राज्यपाल के रूप में ममता बनर्जी को परेशान करने के ट्रैक रिकॉर्ड की वजह से मिली थी।
वैसे ये भी सच है कि हाल ही में तबियत बिगड़ने के बाद वो अस्पताल में भर्ती भी हुए थे। लेकिन स्वभाव और सरकार के लिए उनकी उपयोगिता को देखकर नहीं लगता कि सिर्फ सेहत बिगड़ने की वजह से वो कुर्सी छोड़ सकते हैं। आनेवाले दिनों में सियासत की सेहत पर नजर रखनी होगी।



