फ्रीलांसिंग का वो जमाना : दिन कॉफी हाउस में कटता, शाम रवीन्द्र मंच पर

: : ( मीडिया की मंडी में हम-3 ) : : पिता ने जब कहा कि मुझे पत्र भी नहीं लिखते हो तो अचानक बोल पड़ा- अब फ्रीलांसिंग करता हूं, इसलिए फ्री में कुछ नहीं लिखता, पत्र भी नहीं :

उन दिनों पत्रिका को टक्कर देने के लिए नवभारत टाइम्स का जयपुर एडीशन शुरू हो चुका था। प्रसार में चुनौती तो नहीं दे पाया पर गुणवत्ता की चुनौती जरूर दे रहा था। दीनानाथ मिश्र उसके पहले संपादक थे। उन्होंने प्रतिभाशाली युवा पत्रकारों की अच्छी टीम चुनी थी। थोड़े दिन बाद जनसत्ता से श्याम आचार्य को बुलाकर संपादक बना दिया था। नवभारत के ताजा कलेवर और तेवर का जबाव देने के लिए पत्रिका ने फीचर पेज शुरू करने की तैयारी की और यह जिम्मेदारी फीचर संपादक दुर्गाशंकर त्रिवेदी को सौंप दी। इस पर त्रिवेदीजी ने अतिरिक्त स्टाफ की मांग की तो कैलाश मिश्रा ने कह दिया कि किसी को भी ले लो। त्रिवेदीजी ने मेरी ओर इशारा किया तो कैलाशजी ने मुझसे पूछा कि क्या मैं रविवारीय में जाना पसंद करूंगा।

मैंने तुरंत कहा कि मुझे कोई दिक्कत नहीं है। आमतौर पर कोई भी रिपोर्टिंग से डेस्क पर जाना पसंद नहीं करता। कैलाशजी को भी यही उम्मीद रही होगी कि मैं ना नुकर करूंगा। पर मैं अगले दिन ही रविवारीय में चला गया। मेरा लालच था 11 से 6 बजे की नौकरी और रिपोर्टिंग की भागदौड़ व रात्रि जागरणों से मुक्ति। मुझे नए शुरू होने वाले फीचर पेज की जिम्मदारी मिल गई। ये मेरे मिजाज और रुचि का काम था। पढ़ने का शौक भी पूरा होता था तो पेज के लेआउट को लेकर विभिन्न प्रयोग करने का भी। दिन में सीधी सादी रचनात्मक सी नौकरी और शाम को मनपसंद रवीन्द्र मंच की आवारागर्दी। वे सबसे खूबसरत दिन थे। अपने लिखे लेखों को अपने हाथों से अपनी पसंद के लेआउट तभी दिए थे। एक रात चोरों ने कमरे का ताला तोड़ दिया। हम खुले में छत पर सो रहे थे। चोर एक घड़ी, एक ट्रांजिस्टर और नगद रुपए ले गए। कपड़े और बर्तन छोड़ गए। नए और कुआंरे पत्रकार के कमरे में इससे ज्यादा मिलता भी क्या। ऑफिस में यह खबर आग की तरह फैली। मित्रों ने सहानुभूति दिखाई। शाम को खुद गुलाब कोठारी ने आ कर सांत्वना दी। साथ ही अपनी घड़ी उतार कर देने लगे पर मैंने विनम्रतापूर्वक इंकार कर दिया क्योंकि उस वक्त मेरी चिंता टाइम देखने से ज्यादा रात को बाजार में रोटी खाने की थी।

पत्रिका उन दिनों हिंदी अखबार के अलावा इंगलिश पत्रिका, बच्चों की पत्रिका बालहंस और साप्ताहिक पत्रिका इतवारी निकालती थी। बालहंस के संपादक अनंत कुशवाहा थे, जिन्होंने लोककथाओं पर कॉमिक्स सीरीज बनाने का अद्भुत काम किया था। उनका योगदान अमर चित्रकथा के पै अंकल से कम नहीं है। इतवारी के संपादक ओम थानवी थे। केसरगढ़ के गेट की दायी तरफ छतरी वाले गुमटीनुमा कमरे से निकलता था इतवारी पत्रिका। गोपाल शर्मा उनके सहयोगी थे। राजकिशोर, अज्ञेय, कृष्ण कल्पित, डॉ सत्यनारायण इतवारी के नियमित लेखक थे। बालहंस की बिक्री से प्रोत्साहित होकर उन दिनों पत्रिका ने इतवारी को धर्मयुग की तरह 64 पेज में निकालने की योजना भी बनाई। ओम थानवी ने डमी भी बनाई। पर काम आगे नहीं बढ़ा। अब पत्रिका बीकानेर संस्करण शुरू करने की तैयारी करने लगा था। ओम थानवी को बीकानेर संस्करण का संपादक बना दिया गया। उन्हें जयपुर से बीकानेर ले जाने के लिए जूनियरों की टीम चुनने का मौका भी दिया गया। ओम थानवी अपने साथ बालेन्दु दाधीच, राहुल सेन और अनंत मिश्रा सहित कई लोगों को बीकानेर ले गए।

उन दिनों ओम सैनी माया के संवाददाता थे। उन्हें पत्रिका में छपे मेरे कुछ लेख पसंद आए और मुझे मनोहर कहानियां में लिखने का ऑफर दिया। मैं उन्हें पांच- छह महीने तक टालता रहा पर साथ ही माया और मनोहर कहांनियां को ध्यान से पढ़कर उनकी शैली को पकड़ने की कोशिश भी करता रहा। इस बीच पत्रिका में चल रही नौकरी को ले कर भी मन में जद्दोजहद जारी थी। तब पत्रिका में रहने का अर्थ था, राजस्थान के दायरे में बंधकर रहना और मित्र प्रकाशन से जुड़ने का अर्थ था देश के प्रतिष्ठित मीडिया हाउस से जुड़ना। राष्ट्रीय फलक अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। आखिर मन बन ही गया। ओम सैनी ने सैंपल की स्टोरी देने को कहा तो मैंने भीलवाड़ा में हुई नरबलि और जैसलमेर में करणाभील की हत्या पर स्टोरीयां कीं। इलाहाबाद से संदेश आया कि दोनों स्टोरियां माया के लिए भी कर दूं। मैंने स्टोरियां अपने ही नाम से दीं। ओमजी ने टोका भी, पर मैं मन बना चुका था, माया और मनोहर कहानियां में स्टोरियां छपते ही पत्रिका को अलविदा कहने का।

मनोहर कहानियां में तो नहीं छपीं, पर दोनों स्टोरियां माया और सत्यकथा में छपीं। पत्रिका से विदाई हो गई। शायद 20 फरवरी 1988 को पत्रिका में नौकरी का आखिरी दिन था। बाद में महसूस हुआ कि यह मेरा गलत फैसला था क्योंकि इधर तो नौकरी छूट गई पर मित्र प्रकाशन का अपॉइन्टमेंट लेटर नहीं मिला, सो मजबूरी में परदेस में फ्री लांसिंग शुरू करनी पड़ी। जिंदगी के कटु यथार्थ से रूबरू होने के दिन थे। दैनिक मजदूर से गई बीती हालत थी। सौ-सौ, पचास-पचास रुपए के लिए लेख लिखना और फिर छपने और पारिश्रमिक का चैक आने का इंतजार करना। दिन भर शाम को पेटभर भोजन का जुगाड़ करने की चिंता करने में चहरे का आत्मविश्वास भी शायद काफूर हो चुका होगा।

ये पत्रकारिता के और जिंदगी के व्यवहारिक कटुसत्यों को समझने के दिन थे।पत्रिका की नौकरी के दौरान जो लोग पीछे से छाया देखकर रुक जाते थे, वे अब सामने से चेहरा देखकर भी नजर बचा कर निकल जाते थे। किराया न होने के कारण उस साल होली पर अपने घर भरतपुर भी नहीं जा सका। होली के बाद पिताजी मिलने आए, तब उन्हें पता चला कि मैंने नौकरी छोड़ दी है। वे दुखी भी हुए। उन्होंने ढ़ांढ़स बंधाते हुए शिकायत की कि मैं पत्र भी नहीं लिखता। इस पर मेरे मुंह से निकला कि अब फ्रीलांसिंग करता हूं, इसलिए फ्री में कुछ नहीं लिखता। वो सुन कर और मैं बोलकर अवाक थे।

फ्रीलांसर के रूप में माया के लिए लेख लिखने के साथ-साथ जयपुर दूरदर्शन और आकाशवाणी के कार्यक्रमों का सहारा था। इतवारी पत्रिका, नवभारत टाइम्स, जनसत्ता और दैनिक हिंदुस्तान में भी थोड़ा बहुत लिखा। पर यह जरूरतों की पूर्ति के लिए पर्याप्त नहीं था। खरीदकर पढ़ने और टिकट लेकर फिल्म देखने के शौक अलग से जेब के दुश्मन बने रहते थे। साबिर खान के साथ जुड़कर थियेटर में भी सक्रिय हुआ, पर वह सिर्फ टाइम काटने का सहारा ही सिद्ध हुआ। मित्रों ने छोटे अखबार या किसी सांध्यकालीन अखबार में नौकरी करने की भी सलाहें दीं पर स्वाभिमान को यह गवारा नहीं हुआ। इसी जद्दोजहद में दिन कॉफी हाउस में कटता था और शाम रवीन्द्र मंच पर। उन दिनों कॉफी हाउस में हमारी मंडली में डॉ सत्यनारायण, कृष्ण कल्पित,अनिल शुक्ला और अशोक शास्त्री सहित अनेक मित्र थे।हम सब कॉफी हाउस को ड्रॉइंगरूम और ऑफिस की तरह तरह इस्तमाल करते थे। अपनी डाक तक कॉफी हाउस के पते पर मंगवा लेते थे, तो हमसे मिलने वाले मित्र और रिश्तेदार भी हमें ढूंढ़ते हुए वहीं आते थे। कुछ मित्रों ने तो अपने विजिटिंग कार्ड पर वहीं के फोन नंबर छपवा रखे थे।हां…याद आया कॉफी हाउस के एक कोने की मेज पर उन दिनों राम शास्त्री का कब्जा रहता था।

ये सन 1989 का दौर था। हम दिन में पत्रकारिता करते और शाम को रंगकर्म। रात को पत्रिका या एसएमएस अस्पताल के सामने चाय की थड़ियों पर बहसें करते और समय काटने की कोशिश। मन को यह सोचकर सुकून मिलता कि हम अपना सामाजिक दायित्व पूरी जिम्मेदारी से निभा रहे हैं और वह भी दो दो मोर्चों पर। लेकिन यह भी बाद में बड़ी भूल ही साबित हुआ। हम आधे पत्रकार और आधे रंगकर्मी बन गए। दोनों ही क्षेत्रों में इससे उपेक्षा ही मिली। पीठ पीछे रंगकर्मी हमें पत्रकार कह कर खारिज करने की कोशिश करते और पत्रकार रंगकर्मी कह कर। पर सच समझते-समझते ही समझ में आता है। उस साल दूरदर्शन के लिए लिखी गई डॉक्युमेंट्री- “नेहरू इन राजस्थान” जरूर मेरी यादगार उपलब्धि थी।

उस समय जयपुर सांप्रदायिक तनाव से खदबदा रहा था और बीजेपी का मंदिर आंदोलन उसे हवा दे रहा था। लोकसभा चुनाव आने तक वह अपने चरम पर पहुंच गया और बीजेपी सांसद गिरधारीलाल भार्गव के विजय जुलूस पर फूट पड़ा। शहर में कर्फ्यू लग गया। सब लोग स्तब्ध थे कि क्या हो गया शहर को। हम लोग कॉफी हाउस में मनन कर रहे थे कि क्या किया जाए। सर्वसम्मति से एक ही रास्ता निकला कि जो लोग दंगों के विरोध में हैं, उन्हें अगले दिन बुलाकर सामूहिक रूप से विचार करना चाहिए। अखबार में खबर छपने पर अगले दिन दो सौ से ज्यादा लोग रवीन्द्र मंच के लॉन में जुटे। सब इस बात पर एकमत थे कि दंगों का विरोध किया जाए। तय हुआ कि कोई बैनर नहीं होगा, कोई संयोजक नहीं होगा, कोई राजनीति नहीं होगी…..सिर्फ दंगों का विरोध होगा।

सांप्रदायिकता के विरोध में अगले दिन रामनिवास बाग के मुख्यद्वार के पास शहर के बुद्धिजीवियों, कलाकारों और पत्रकारों का सामूहिक उपवास घोषित कर दिया गया। इस स्थान को सफदर हाशमी नुक्कड़ नाम दिया गया और आगे की रणनीति उपवास के दौरान ही तय करने पर सहमति बनी। अगले दिन उपवास के दौरान सीमित साधनों में कृष्ण कल्पित ने कविता पोस्टर बनाकर आंदोलन में रंग भरने शुरू कर दिए। रामकिशन अडिग और एकेश्वर हटवाल सहित अनेक चित्रकारों ने सहभागिता की। साबिर खान और राजेंद्र साईंवाल की भी आंदोलन में महत्वपूर्ण सहभागिता थी। तय हुआ कि जबतक हालात सामान्य नहीं हो जाते यह प्रतिरोध जारी रहेगा।

इस आंदोलन में शहर भर के जिम्मेदार लोगों ने सहयोग किया। कभी सांप्रदायिकता के विरोध में पतंग उड़ी,तो कभी गीत गाए गए….कभी कव्वाली हुई, तो कभी व्याख्यान और विचार गोष्ठियां। पर नुक्क्ड़ नाटक ‘हत्यारे’ इसकी विशेष उपलब्धि बना। इस नाटक ने आंदोलन को नई ऊंचाइंयां दीं। पूरे देश के मीडिया में इस आंदोलन की चर्चा हुई। इस नुक्कड़ नाटक में मेरे साथ डॉ प्रदीप भार्गव, अनूप सोनी, विजय विद्रोही, धनेश वार्ष्णेय मुख्य कलाकार थे। इस नुक्कड़ नाटक के बहाने आंदोलन शहर भर में घूमा और हर उस जगह पहुंचा जहां सांप्रदायिक तनाव बोया गया था। इस आंदोलन के बारे में छपी हुई खबरों को डिस्प्ले करने के लिए धरना स्थल छोटा पड़ गया था। एक दिन तो हमने सुबह से रात तक शहर में घूम घूमकर नौ शो किए। पता नहीं ये किसी रिकॉर्ड की श्रेणी में आता भी है या नहीं। इस आंदोलन का हैंगओवर ऐसा था कि हम सब भूख प्यास भी भूल गए थे। डॉ सत्यनारायण रोज सुबह दस बजे जिस निष्ठा से आंदोलन स्थल पर पोस्टर टांगते, वह काबिले तारीफ थी। और आज भी याद है कि उस साल मैंने न्यू ईयर कल्पित के घर शकील अख्तर और अजीत वडनेरकर के साथ नु्क्कड़ नाटक का गीत गाकर ही मनाया था। नुक्कड़ नाटक का सिलसिला करीब चार माह में 175 शो करके विश्व रंगमंच दिवस के दिन रुका। उस शाम रघुवीर यादव शो के विशेष अतिथि थे।

… जारी …

लेखक धीरज कुलश्रेष्ठ राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार हैं. धीरज से संपर्क dkjpr1@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


इसके पहले का पार्ट पढ़ें-

मैंने पत्रकारिता का असली पाठ ‘राजस्थान पत्रिका’ में सीखा



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