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अमर उजाला व हिंदुस्तान में स्थानीय संपादक रहे और नैसर्गिक पत्रकार दिनेश जुयाल जी के गए आज एक साल हो गए!

अरुण नैथानी-

पुण्य स्मरण। विश्वास नहीं होता! जीवन कितना क्षणभंगुर हैं और समय कितनी तेजी से भाग रहा है। अमर उजाला व हिंदुस्तान में स्थानीय संपादक रहे और नैसर्गिक पत्रकार आत्मीय भाई दिनेश जुयाल जी को गए एक साल होने को है। आज देहरादून स्थित उनके घर में वार्षिक श्राद्ध है। अभी भी इस बात पर विश्वास करना मुश्किल हो रहा है कि कल तक मुस्कराते भाई जुयाल जी हमारे बीच में नहीं रहे। चाहकर भी वार्षिक श्राद्ध में शामिल नहीं हो पा रहा हूं। मन उन्हें हमेशा भरे-पूरे अहसासों के साथ पुराने रूप में ही देखना चाहता था।

पिछले साल जब पीजीआई चंडीगढ़ में उपचार के सिलसिले में वे घर आए थे, उनके बड़े भाई ए.पी जुयाल जी के साथ। बड़े भाई साहब व छोटे भाई सुभाष जी इस संकट में उनके साथ अड़िग खड़े रहे। इन भाइयों पर दिनेश जी को बड़ा नाज था। उससे पहले एक महीने तक उनसे बातचीत होती रही, पीजीआई चंडीगढ़ में उनके टैस्ट चल रहे थे।

इस लंबी प्रक्रिया से उनमें उकताहट भी थी। एक मित्र के सहयोग से उन्हें पीजीआई में प्राइवेट रूम मिल पाया था। वहां मिले तो लगता नहीं था कि वे गंभीर बीमार हैं। हमेशा की तरह मुस्कराते हुए स्वागत करते थे। दो दिन के लिये बीच में रजनी भाभी के साथ घर रहने भी आए।

तब उन्हें मैंने एक पूरे पेज में प्रकाशित योग विषयक अपना लेख भेजा तो फोन पर बोले कि इतने लंबे लेख कैसे लिख लेते हो? उनका चंडीगढ़ और मेरे घर आना-जाना लगा रहा था। देहरादून में उपचार के अंतर्विरोधों से वे आहत थे। उनकी मेडिकल रिपोर्टों को एकत्र करने पर चर्चा होती रही। बीच में अमर उजाला परिवार के मुखिया राजुल माहेश्वरी जी का फोन भी आया और यथा संभव सहयोग का भरोसा भी दिया।

जुयाल जी विश्वास से कहते रहे कि मुझे कुछ नहीं होने वाला, असाध्य रोग के बावजूद मैं अभी चार पांच साल तक जीऊंगा। फिर कुछ दिन बाद देहरादून गए तो उसके बाद दुखद समाचार मिला। दुर्योग से वे पिछले साल बड़ी दीवाली को वे रोशनी के अनंत पुंज में समाहित हो गए।

पिछले तीन दशक से अधिक से पुराना परिचय था उनसे। उनसे रक्त संबंधों का रिश्ता नहीं था, वे न मेरे शहर के थे, न गांव के। मुझे उनके साथ काम करने का भी कभी अवसर न मिला। लेकिन ये रिश्ता इन सभी लौकिक रिश्तों से ऊपर था। पिछली सदी के अंतिम दशक में जब अमर उजाला मेरठ जाना हुआ तो उनसे परिचय हुआ। उनके घर हमेशा नये-पुराने पत्रकारों के लिए खुले रहते थे। बेहद सरल और बेहद आत्मीय। मुझे याद है कि जब अयोध्या घटनाक्रम के चलते मेरठ में कर्फ्यू लगा तो हम जैसे कई साथियों के लिये ब्रह्मपुरी में उनका घर रजनी भाभी द्वारा बनाए भोजन के लिए अंतिम आश्रय हुआ करता था। भाभी ने कभी किसी को बिना खाना खाए घर से नहीं जाने दिया।

जब अमर उजाला मेरठ से वर्ष 2000 में दैनिक ट्रिब्यून चंडीगढ़ साक्षात्कार के लिये आया तो उनके सिवाय किसी को नहीं जानता था। उनका आत्मीय स्नेह मिला। फिर चंडीगढ़ में मुझे नया मकान दिलाने में मदद की। फिर वे जल्द ही संभवत: 2002-03 में चंडीगढ़ से चले गए।

पत्रकारिता की चलती-फिरती पाठशाला के रूप में उन्होंने मेरठ, चंडीगढ़, देहरादून, कानपुर,बरेली में बड़े दायित्व निभाए। देश की राजनीति, पत्रकारिता, सामाजिक मुद्दों व उत्तराखंड विषयों पर उनकी गहरी पकड़ थी। तमाम टीवी, रेडियो व डिजिटल माध्यमों में एक सार्थक विमर्श करते नजर आते। एक सजग-सचेत और पत्रकारिता के नैसर्गिक गुणों वाले पत्रकार। एक समय प्रभात खबर और विश्वमानव में भी उन्होंने कार्य किया।

अमर उजाला के सर्वेसर्वा स्व.अतुल माहेश्वरी जी का उन पर खूब भरोसा था। यही वजह है कि उन्हें कानपुर व बरेली में अमर उजाला में स्थानीय संपादक का दायित्व दिया गया। देहरादून में दैनिक हिंदुस्तान के संपादक का दायित्व निभाने के साथ ही उन्होंने दून विश्वविद्यालय व श्रीनगर स्थित केद्रीय वि.वि. में कुछ समय पत्रकारिता विभाग में अध्यापन किया। अंतिम दिनों बातचीत में उन्होंने श्रीनगर में पत्रकारिता विभाग में अध्यापन के दौरान सामने आई ऊंच-नीच की टीस जाहिर की थी।

जीवट जिजीविषा के धनी दिनेश जुयाल जी इतनी जल्दी हमें छोड़कर चले जाएंगे, अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है। शायद भगवान को भी अपनी दुनिया में एक अच्छे व्यक्ति व बुद्धिजीवी की जरूरत रही होगी। ईश्वर रजनी भाभी को इस मुश्किल वक्त में शक्ति दे। पुण्य स्मरण।

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