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आज के अखबार : डॉलर के मुकाबले रुपया 95 पार कर आईसीयू से युद्ध में पहुंचा लेकिन खबर ऐसे नहीं है

संजय कुमार सिंह

देशबन्धु में छपी इस खबर के अनुसार, डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 95 पार कर गया। यही नहीं, डॉलर के मुकाबले रुपए में लगातार कमजोरी देखी जा रही है। फिर भी, आज यह खबर उतनी प्रमुखता से नहीं है जितनी होनी चाहिए। द टेलीग्राफ में यह सिंगल कॉलम में है और नवोदय टाइम्स में सेंसेक्स लुढ़कने के साथ की खबर है। मेरे नौ अखबारों में अकेले देशबन्धु में यह खबर पहले पन्ने पर इस तरह है। खबर के अनुसार, दिन के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया 94.83 के स्तर पर बंद हुआ। यह शुक्रवार के 94.81 पर बंद के मुकाबले 0.3 प्रतिशत की गिरावट दर्शाता है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा बैंकों के लिए ओवरनाइट नेट ओपन पॉजिशन लिमिट को घटाकर 100 मिलियन डॉलर करने के बाद, रुपया मजबूती के साथ खुला था, लेकिन सत्र के दौरान इसने अपनी बढ़त खो दी और शुरुआती स्तर से 160 पैसे गिर गया। इस संबंध में एनडीटीवी की खबर इस प्रकार है, डॉलर के मुकाबले रुपये की दमदार वापसी। आरबीआई के मास्टरस्ट्रोक से 128 पैसे मजबूत हुआ, रिकॉर्ड लो से यूं पलटी बाजी। सोमवार, 30 मार्च को शुरुआती कारोबार में रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर से शानदार रिकवरी करते हुए 128 पैसे मजबूत हो गया। डॉलर के मुकाबले रुपया 93.57 के स्तर पर खुला, जो कि शुक्रवार के बंद भाव 94.85 के मुकाबले 1.3% की बड़ी बढ़त है। इस रिकवरी के पीछे भारतीय रिजर्व बैंक का वह मास्टरस्ट्रोक है, जिसने सट्टेबाजी करने वालों पर नकेल कस दी है। रुपये को गिरने से रोकने के लिए रिजर्व बैंक ने शुक्रवार देर रात बैंकों के लिए नए नियम जारी किए। 

इसके अनुसार, रिजर्व बैंक ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे विदेशी मुद्रा बाजार में अपनी ‘नेट ओपन पोजीशन’ (एनओपी) को 100 मिलियन डॉलर तक सीमित रखें। इसका मतलब है कि बैंक अब डॉलर की बहुत बड़ी होल्डिंग सट्टेबाजी के लिए नहीं रख पाएंगे। बैंकों के लिए यह नियम 10 अप्रैल तक लागू रहेगा। एजेंसियों के हवाले से देशबन्धु में छपी खबर में कहा गया है, मध्य पूर्व में तनाव के कारण डॉलर के मुकाबले रुपए में लगातार कमजोरी देखी जा रही है। अकेले मुकाबले में भारतीय मुद्रा में मार्च के दौरान अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले  4.4 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है। जाहिर है, एजेंसियां इसका कारण मध्यपूर्व में तनाव को बता रही हैं, बताना चाहती हैं या उनसे कहा गया है कि मध्य पूर्व के युद्ध को इसका कारण बताया जाए। हालांकि कारण चाहे जो हो रुपए का इतना कमजोर होना पहले पन्ने की खबर नहीं है तो इसीलिए कि सरकार की साख खराब न हो। आप जानते हैं कि 2014 में प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेन्द्र मोदी रुपए के कमजोर होने के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते थे और इसके ढेरों कारण गिनाते रहे हैं। इसीलिए कर कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर वित्त मंत्री के दो वीडियो एक साथ लगाए। एक 2013 का था जब निर्मला सीतारमन वित्त मंत्री नहीं थीं। पोस्ट के अनुसार तब डॉलर 62 रुपए का था तो मौजूदा वित्त मंत्री को गंभीर चिन्ता होती थी। अब जब डॉलर के मुकाबला रुपया 95 पार कर गया है तो उन्होंने कहा है, हमारे रुपये ठीक चल रही है।

आपको याद होगा, डॉलर के मुकाबले रुपया जब 62-64 या अधिकतम 68 पर होगा तब नरेन्द्र मोदी ने कहा था या कहते थे, “रुपया आईसीयू में है”। कांग्रेस की तब की सरकार को बदनाम करने, भ्रष्ट साबित करने के लिए तब उन्होंने और भी बहुत कुछ कहा था जो अब भुला दिया गया था। उन दिनों नरेन्द्र मोदी के आरोपों और तंज को प्राथमिकता देने वाले अब रुपए के डॉलर के मुकाबले 95 पार करने पर भी पहले पन्ने की खबर नहीं बना रहे हैं। यही नहीं, 2जी घोटाला, कोयला घोटाला, रॉबर्ट वाड्रा की अवैध कमाई जैसे कितने ही आरोप थे जो अभी तक साबित नहीं हुए और शायद ही हों। इन मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए और शायद एक अन्य विरोधी को शुरू में ही निपटा देने के उद्देश्य से आम आदमी पार्टी के नेताओं पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया, उसकी जांच और निर्वाचित मुख्यमंत्री व सरकार के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति दी गई, जांच करवाई गई, मामले को पीएमएलए के तहत कर दिया गया (ताकि जमानत न मिले)। कई अदालतों और न्यायमूर्तियों की कई पीठों ने इस बात (या केंद्र सरकार की चाहत) का ख्याल रखा। चुनाव के समय सुप्रीम कोर्ट ने अरविन्द केजरीवाल को विशेष तौर पर जमानत दी तो उनके साथ विशेष व्यवहार का आरोप लगाया गया जबकि हेमंत सोरेन को जमानत नहीं मिली थी। ऐसे मामले के बारे में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने सीबीआई जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए। अदालत ने अरविंद केजरीवाल और अन्य आरोपियों को शराब नीति घोटाले से जुड़े सीबीआई मामले में बरी कर दिया। दिल्ली हाई कोर्ट ने बाद में इस आदेश पर रोक लगा दी और सीबीआई की याचिका पर नोटिस जारी किया। इस तरह, यह साफ हो गया है कि सरकार चाहती है कि मुकदमा चलता रहे। मेरे हिसाब से यह अदालत पर प्रत्यक्ष दबाव हो न हो, परोक्ष दबाव तो है ही। हालांकि, आज रुपए की कीमत वाला मामला ज्यादा महत्वपूर्ण है। आइए देखें कि नरेन्द्र मोदी इस पर क्या कुछ कहते करते रहे हैं।

मोटे तौर पर तब रुपए की कीमत कम होने के जो कारण बार-बार दोहराए गए उनमें पॉलिसी पैरालिसिस यानी नीतिगत लकवा, भ्रष्टाचार, कमज़ोर नेतृत्व (मनमोहन सिंह सरकार पर निशाना), महंगाई विदेशी निवेश में गिरावट और आर्थिक सुधारों की कमी शामिल हैं। इसकी शुरुआत 2012 में हो गई थी जब डॉलर की कीमत ₹52–57 के बीच रही होगी। मोदी इसका कारण केंद्र सरकार की “गलत आर्थिक नीतियाँ”, बढ़ता राजकोषीय घाटा और विदेशी निवेश आकर्षित करने में असफलता आदि को बताते थे। जून–जुलाई 2013 में जब डॉलर दर ₹58–61 के बीच रही होगी तो इसका कारण महंगाई, बढ़ता आयात बिल, कमजोर निर्यात और आर्थिक नीतियों में स्पष्टता का अभाव कहा जाता था। सितंबर 2013 में जब डॉलर की दर ₹62–65 के बीच रही होगी तब रुपए की गिरती कीमत का कारण सरकार की “विश्वसनीयता का संकट”, विदेशी निवेशकों का पलायन भ्रष्टाचार और घोटाले (2जी, कोयला आदि) के साथ आर्थिक सुधारों की कमी को कहा जाता था। अगस्त 2013 में जब रुपया ‘रिकॉर्ड’ गिरावट पर था तो प्रति डॉलर दर ₹64–68 थी। कई बयानों/रैलियों में नरेन्द्र मोदी ने जो कारण बताये उनमें “कमज़ोर नेतृत्व”, आर्थिक कुप्रबंधन, निवेशकों का भरोसा खत्म होना और “पॉलिसी पैरालिसिस” आदि शामिल हैं। ये कारण अब इतने हास्यास्पद हैं कि सरकार ने इसके और दूसरे वीडियो सोशल मीडिया से हटवा दिए हैं। इस संबंध में कानून बनाया गया है। इसे बड़े पैमाने पर लागू किया जा रहा है। कहा जा सकता है कि कानून का खुलकर दुरुपयोग हो रहा है और आईटी नियमों में संशोधन का मसौदा इसे सरकार के लिए और आसान तथा व्यापक बनाने वाला है। हिन्दुस्तान टाइम्स में आज छपी खबर के अनुसार, सरकार के नोटिस अब गैर प्रकाशकों के कंटेंट (सामग्री) पर भी लागू होंगे।

इसके अलावा, आज टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिन्दू और हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड लगभग एक ही खबर है और तीनों का शीर्षक भी एक जैसा है। आप जानते हैं कि खबरों के अनुसार, अमेरिका ईरान में सत्ता पलट करना चाहता था। हमले में उसके कई वरिष्ठ नेताओं के शहीद होने की खबर है। इसके बावजूद ईरान अड़ा हुआ है और होर्मुज स्ट्रेट बंद होने की भी खबरें हैं। इससे अमेरिका पर चौतरफा दबाव है। होर्मुज स्ट्रेट में नौवहन की सुरक्षा को लेकर डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत पर जोर दिया गया है। हालांकि, इस तरह की अपीलों पर वैश्विक प्रतिक्रिया सीमित रही। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह अपील खारिज हो गई। इसके बाद उसने ईरान को धमकी दी और 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया। फिर खुद ही कहा कि वार्ता चल रही है इसलिए हमला नहीं किया जाएगा जबकि ईरान ने कहा कि कोई वार्ता नहीं चल रही है। इसके बावजूद आज फिर उसने ईरान को धमकी दी है और यही धमकी इन तीनों अखबारों में लीड है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड भी लगभग यही है लेकिन शीर्षक में ट्रम्प के इस दावे को ज्यादा महत्व दिया गया है कि वार्ता में अच्छी प्रगति हुई है। हालांकि, अच्छी प्रगति के बाद या बावजूद धमकी देने का कोई मतलब नहीं है या युद्ध में इसके अपने मायने हैं। दोनों दृष्टि से खबर महत्वपूर्ण है और लीड बनाई जा सकती है। हालांकि मेरे जैसे पाठक यह देखते हैं कि किसी खबर को पहले पन्ने पर रखने या लीड बनाने के लिए कौन सी खबर छोड़ी गई है। मुझे लगता है कि नरेन्द्र मोदी ने डॉलर की कीमत 65-68 रुपए के बराबर होने पर कहा था कि रुपया आईसीयू में है। कांग्रेस की एक वीडियो पोस्ट के अनुसार 2013 में जब डॉलर 62 रुपए का था तब निर्मला सीतारमण को चिन्ता होती थी और 2026 में जब 95 पार कर गया है तो सब चंगा सी कहना एक अलग राजनीति है। इसे निश्चित रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए था। खासकर एनडीटीवी की खबर के बाद लेकिन जो हो रहा है वह सबके सामने है। ऐसे में द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है – जोरदार प्रगति, गंभीर खतरा। फ्लैग शीर्षक है, ट्रम्प ने ईरान पर ठंडा-गर्म दोनों फेंका। दि एशियन एज और नवोदय टाइम्स की लीड इससे अलग लेकिन एक है। इसके अनुसार केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सलियों के खिलाफ युद्ध में ‘जीत’ की घोषणा कर दी है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, अब देश नक्सल मुक्त : शाह। अमर उजाला के दो पहले पन्ने हैं। एक पर ट्रम्प और दूसरे पर अमितशाह लीड है। इस लिहाज से अमित शाह की खबर सेकेंड लीड है।  

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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