सरकार क्या कर रही है, जनता को कौन सी सुविधा मिली और ना खाउंगा ना खाने दूंगा का क्या हुआ – जैसे सवाल कहीं हैं ही नहीं। प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते और वक्फ विधेयक के समर्थन में विधायक प्रेस कांफ्रेंस करने की हिमाकत करते हैं, सवालों के घबराकर भागने के लिए मजबूर होते हैं पर खबर या चर्चा नहीं के बराबर…

संजय कुमार सिंह
वैसे तो आज सभी अखबारों की लीड दुनिया भर के पूंजी बाजार में निवेशकों के लाखों करोड़ डूबने की खबर है। यह ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ की मेहरबानी से है और इसपर भारत सरकार की चुप्पी (या लाचारी) पर पहले भी कई बार लिख चुका हूं। कल मैंने बताया था कि केंद्र सरकार और खास कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कैसे अपनी नई शिक्षा नीति या त्रिभाषा फॉर्मूला को लागू कराने के लिए दक्षिण के राज्यों से भिड़े हुए हैं और किस स्तर पर मुद्दे उठा रहे हैं। आज इस सरकार की प्रशासनिक कमजोरी और मनमानी से संबंधित कई खबरें हैं जो बताती हैं कि आम जनता हर तरह से परेशान है। जहां डबल इंजन की सरकार नहीं है उसे कैसे परेशान किया जा रहा है। इससे संबंधित खबर आपने कल पढ़ी थी। आज द टेलीग्राफ और दि एशियन एज की खबरों से पश्चिम बंगाल का उदाहरण मिलता है। भले यह मामला थोड़ा अलग है पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से हजारों शिक्षकों की नियुक्ति रद्द होने के बाद राज्य सरकार की मुश्किलें समझी जा सकती हैं और जैसा मैंने पहले लिखा है, (तीन) चुनाव आयुक्त नियुक्त करने वाली समिति पर फैसला नहीं हो पा रहा है और हजारों शिक्षकों की नियुक्ति रद्द करने का फैसला हो गया।
ऐसे में आज की कुछ महत्वपूर्ण और दिलचस्प खबरें डबल इंजन सरकार की कमजोरी और अयोग्यता बताती हैं। डबल इंजन वाली सरकार के प्रचार और काम की इन खबरों के बीच एक खबर खबर यह भी है कि राहुल गांधी कल बिहार में थे। यह खबर नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर है। दि एशियन एज की खबर का शीर्षक है, “शिक्षकों की रक्षा के लिए जेल जाने को तैयार हूं : दीदी”। द टेलीग्राफ की खबर का शीर्षक है, “ममता ने ‘बेदाग’ के लिए रोजगार की उम्मीद जताई”। अमर उजाला में प्रकाशित एक खबर का शीर्षक है, उत्तर रेलवे के दो अधिकारियों समेत तीन लोगों को सात लाख की घूस लेते पकड़ा। इसके अलावा, छापे में करोड़ों की संपत्ति मिलने की भी खबर है। इसमें 63.85 लाख की नकदी और 3.46 करोड़ के सोने के जेवर शामिल हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि यह ना खाउंगा, ना खाने दूंगा – के बावजूद बीच दिल्ली शहर में हुआ है और विभाग भी कोई ऐसा अनजाना नहीं है। रेल अधिकारियों को रिश्वत लेते पकड़ा गया है और बरामदगी उनके यहां से हुई है। मामला साबित होने से पहले अधिकारियों पर लगे आरोपों के साथ यह तथ्य है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने पार्टी के कोषाध्यक्ष पीयूष गोयल को रेल मंत्री बना दिया था और कोषाध्यक्ष की नियुक्ति महीनों नहीं हुई। जाहिर है, कोई माने या ना माने रेल मंत्री भाजपा के कोषाध्यक्ष भी थे ही। उस समय रेलवे के अधिकारी रिश्वत लेते नहीं पकड़े गये और आज पकड़े जा रहे हैं तो इसके गंभीर मायने हैं। खासकर प्रधानमंत्री की घोषणा – ना खाउंगा, ना खाने दूंगा के संदर्भ में।
वह भी तब जब दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी का मुख्यालय और केशव कुंज के टावर इस सरकार के कार्यकाल में बने हैं और इस मामले में सरकार का रिकार्ड पहले की भ्रष्ट घोषित सरकार के 70 साल के कार्यकाल से काफी तगड़ा है। कहने की जरूरत नहीं है कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए अव्वल तो कोई आम आदमी ऐसा दावा नहीं करता और करता तो यह स्थिति नहीं होती और होती तो उसे (और उसके भक्तों को) याद दिलाने की जरूरत नहीं पड़ती। झूठ बोलकर सत्ता पर कब्जा पाने और फिर पूरे इको सिस्टम की मदद से देश लूटने का यह शर्मनाक उदाहरण सिर्फ बेशर्मों के कारण है और चल रहा है। बेशर्म – एक पार्टी या गिरोह में नहीं हर ओर हैं। कुल मिलाकर, चोरों की चांदी है और लूट ही लूट है। पर खबर? आपको किसी और अखबार में पहले पन्ने पर दिखी? जहां तक सरकार के काम की बात है, आम लोगों को जब नौकरी और जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही है तब सरकार यह सुनिश्चित करने में लगी है कि गैर सरकारी संगठन विदेशी सहायता गलत ढंग से प्राप्त नहीं कर पायें और जब, जैसे भी करें, उसे सही ढंग से खर्च करें। इस आशय की खबर आज टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर है। खबर का शीर्षक है, विदेशी धन प्राप्त करने के लिए गैर सरकारी संगठनों पर तीन साल की सीमा।
इसका मतलब हुआ कि मेरे पास अब अनुवाद का काम कम हो गया है और मैं किसी विदेशी चंदे से गरीबों के इलाज या बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में काम करना चाहूं तो नहीं कर सकता हूं और इस दिशा में प्रयास भी नहीं करूं। मुझे पहले तीन साल बिना काम किये (पैसे ही नहीं होगें तो काम कैसे होगा) काम करता दिखना होगा या कोई और जुगाड़ करना होगा। तब मैं अपने लिये काम और दूसरों की सेवा कर सकूंगा। वह सेवा जो सरकार नहीं कर रही है इसलिए जरूरी है। ऐसे नियम देश हित में हों तो हुआ करें, आम लोगों के हित में तो नहीं ही हो सकते हैं। खबर सिंगल कॉलम की है। मीडिया इसपर चर्चा नहीं करेगा। एक तरफ सरकारी अधिकारियों को रिश्वत लेने से नहीं रोका जा सक रहा है। सरकारी सरकारी पैसों की बंदरबांट आम है तो कानून व्यवस्था की जो स्थिति है वह सबको मालूम है और उसमें भी टीवी वाले जिनपर हंगामा मचाते हैं और जिनपर होंठ सिल लेते हैं वह भी अब सार्वजनिक है। ऐसे में आज टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रमुखता से छपी खबर के अनुसार पुलिस वालों ने सबूत प्लांट किये और निर्दोष को फांसी के फंसे तक पहुंचा दिया। मौत के साये में 10 साल जेल काटने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उसे बरी कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ पुलिस बल्कि ट्रायल कोर्ट की भी खिंचाई की है। मामला उत्तराखंड का है और 2016 की एक घटना से संबंधित है। टाइम्स ऑफ इंडिया की ही दूसरी खबर के अनुसार, मोगा सेक्स स्कैंडल में मोहाली की स्पेशल सीबीआई अदालत ने पंजाब पुलिस के पांच वरिष्ठ और पूर्व अधिकारियों को पांच साल के सश्रम कारावास की सजा दी है। यह दिसंबर 2007 का मामला है। उत्तर प्रदेश की वर्तमान स्थिति के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य में कानून का शासन पूरी तरह खत्म हो गया लगता है। द हिन्दू में यह खबर मुख्य न्यायाधीश की तस्वीर के साथ चार कॉलम में है। इसके अनुसार मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि राज्य में सिविल विवाद आपराधिक मामले बन जाते हैं, कानून का शासन पूरी तरह खत्म हो चुका है। द हिन्दू में आज महाराष्ट्र के बदलापुर मुठभेड़ मामले में एसआईटी की जांच और पांच पुलिसवालों के खिलाफ एफआईआर के आदेश देने की खबर है। आपको याद होगा कि ठाणे के बदलापुर स्थित एक स्कूल की दो बच्चियों के यौन उत्पीड़न के आरोपी अक्षय शिन्दे को गिरफ्तारी के करीब एक महीने बाद 23 सितंबर 2024 को गोली मार दी गई थी। उस समय उसे कल्याण से तजोला जेल ले जाया जा रहा था।
मुठभेड़ में हत्या के मामले की मजिस्ट्रेटी जांच की रिपोर्ट 20 जनवरी को आई थी। इसमें पांच पुलिस वालों को दोषी (जिम्मेदार) ठहराया गया था पर एफआईआर नहीं हुई। अब हाईकोर्ट ने एसआईटी जांच और पांच पुलिस वालों के खिलाफ एफआईआर के आदेश दिये हैं। आज ही खबर है कि कुणाल कामरा को मद्रास हाईकोर्ट से 17 अप्रैल तक के लिए जमानत मिल गई है और बांबे हाईकोर्ट ने कामरा की रिट याचिका पर सुनवाई की मंजूरी दे दी है। बलात्कार, मुठभेड़ और मौत तो फिर भी अपराध के मामले हैं लेकिन भाजपा राज में कॉमेडी करके घर चलाना भी मुश्किल हो गया है। डबल इंजन वाले भिन्न राज्यों में कितने ही कॉमेडियन अलग कारणों से अपना काम नहीं कर पा रहे हैं। उभरती प्रतिभायें नष्ट होने की कगार पर हैं। उसमें कुणाल कामरा का मामला इस समय सबसे चर्चित है इस मामले के जरिये महाराष्ट्र पुलिस ने कॉमेडी करने और देखने को ही अपराध की श्रेणी में ला दिया है और दर्शकों को भी गवाही देने के लिए समन किये जाने की खबर है। ऐसे में देश में क्या हो रहा है और क्या होना चाहिये समझना मुश्किल नहीं है और यह स्थिति एक दिन में नहीं बनी है। दिल्ली के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उसके 10 प्रतिशत आदेशों का भी अनुपालन नहीं होता है। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार की खिंचाई की है।
आप जानते हैं कि दिल्ली में भले ही आम आदमी पार्टी की सरकार थी और अब भाजपा की सरकार है पर चलती केंद्र सरकार की ही थी क्योंकि यह केंद्र शासित प्रदेश भी है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का अनुपालन नहीं होने के अपने मायने हैं खासकर तब जब सरकार ने कानून बनाकर आदेश को पलट भी दिये हैं। ऐसे में दो दिन पहले खबर थी कि दिल्ली में पुलिस जल्दी ही फेशियल रेकगनिशन टेक्नालॉजी तैनात करेगी। 20 मार्च 2025 की एक खबर के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने चांदनी चौक का 80 लाख का लूटकांड 24 घंटे में सुलझा दिया, आरोपी भी गिरफ्तार कर लिये गये। इसे एआई का कमाल बताया गया था। आज केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के हवाले से अखबारों में खबर छपी है कि देश की सीमा की सुरक्षा इलेक्ट्रॉनिक निगरानी प्रणाली से होगी। अमर उजाला में यह दो कॉलम से बड़ी खबर है। खास बात यह है कि अपराध रोकने की जो व्यवस्था दिल्ली में पहले की जा चुकी है वह सीमा पर अब की जा रही है और फिर भी पहले पन्ने की खबर है। उत्तर प्रदेश या दिल्ली सरकार के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वह (कई अखबारों में भिन्न कारणों से) पहले पन्ने पर नहीं है। अमित शाह के प्रचार की यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में सिंगल कॉलम में है।
आज की खबरों में एक फर्जी डॉक्टर की गिरफ्तारी की खबर भी है। दिलचस्प यह है कि उसका काम भी डबल इंजन वाले मध्य प्रदेश में चल रहा था और सरकार तो छोड़िये, चिकित्सकों के संगठन को भी नहीं लगी। गैर भाजपा राज्यों में एमसीआई की सक्रियता देखते बनती है। सोशल मीडिया की अपुष्ट खबरों के आधार पर डॉ एन जॉन केम उर्फ नरेन्द्र यादव आयुष्मान भारत योजना के तहत सरकारी धन प्राप्त कर रहा था। यह सब अल्ट न्यूज के मोहम्मद जुबैर के खुलासे के बावजूद चल रहा था और 2023 की उनकी पोस्ट तो अब भी सोशल मीडिया पर है। कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने इस संबंध में लिखा है, एक भूरे भूरे बालों वाला शख्स था ट्विटर पर, नाम था प्रोफेसर एन जॉन कैम। भूरे बाल, कैमरे के एंगल और थोड़े गोरे से दिखने पर आपको भी यही लगता था ना कि वो कोई अंग्रेज़ हैं? नहीं, वह नरेंद्र विक्रमादित्य यादव है, यह ख़ुद को ब्रिटेन का फेसम डॉक्टर बताता था। सोशल मीडिया पर ज़हर उगलना, विपक्ष के ख़िलाफ़ अनर्गल लिखने वाला मोदी भक्त है यह। लेकिन अब इसने जो किया वो अक्षम्य है। फ़र्ज़ी डॉक्टर बनकर इस आदमी ने मध्य प्रदेश के दमोह में लोगों की हार्ट सर्जरी कर डाली – जिसमें 7 लोगों की मौत हो गई। इस हत्यारे को बीजेपी वालों ने खूब बढ़ाया, आईटी सेल वालों ने खूब हीरो बनाया, इसके ट्वीट वगैरह तो ख़ुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी ने साझा किए – पर अब कुछ नहीं बोले रहे? इस आदमी का सारा सच जानते हुए, उसको डाक्टर बन कर इलाज करने की इजाज़त किसने दी? कौन है इन मौतों का ज़िम्मेदार – प्रोफेसर एन जॉन कैम उर्फ़ विक्रमादित्य या भाजपा?
इन खबरों के बीच आज सरकार के काम या प्रचार की खबरों में पहली इंडियन एक्सप्रेस की एक्सक्लूसिव खबर है, सरकार ऑनलाइन गेमिंग फर्मों को पीएमएलए के तहत लाने के लिए काम कर रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस सरकार ने रोजगार व्यवसाय के सारे रास्ते बंद और खराब करने के बाद पूंजी बाजार को भी नहीं बख्शा और भले अंत में उसका कारण ट्रम्प के टैरिफ को मान लिया जाये पर सरकार की ओर से भी कोई कसर नहीं छोड़ी गई थी। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को पीएमएलए के तहत जेल में रखने के बाद अब सरकार अपेक्षाकृत नये और तकनीक वाले गेमिंग फर्म को पीएमएलए के तहत ला रही है।



