Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

वेब-सिनेमा

गलगोटिया मामले में प्रोफेसर नेहा सिंह का व्यवहार हर बड़ी संस्था के प्रवक्ता के लिए एक सबक होना चाहिए!

अमिताभ श्रीवास्तव-

चार वीडियो। चारों गलगोटिया यूनिवर्सिटी से जुड़े हैं। पहले तीन वीडियो में दिल्ली में एआई सम्मेलन के दौरान एक चाइनीज रोबोट ओरियान को गलगोटिया यूनिवर्सिटी में डेवलप करने के बेईमान दावे और उससे पैदा हुए विवाद के बाद सफाई की कहानी है। काफी बेशर्मी, दीदादिलेरी, ढिठाई चाहिए इस तरह की बेईमानी और उस पर लीपापोती के लिए। लेकिन मोदी है तो यह सब बड़े पैमाने पर मुमकिन है।

चौथा वीडियो पुराना है जिसमें लोकसभा चुनाव के माहौल में कांग्रेस के खिलाफ सड़क पर उतारे गये गलगोटिया यूनिवर्सिटी के छात्रों से आज तक के रिपोर्टर आशुतोष ने बहुत दिलचस्प तरीके से सवाल पूछ कर पूरे अभियान को बेनकाब कर दिया था।

पिछले 12-13 साल में नरेंद्र मोदी के शासन काल में देश में इस तरह की गलाघोंटिया प्रतिभाओं का विस्फोट हुआ है। इन सबके सिरमौर प्रधानमंत्री खुद हैं। एक्सट्रा टूएबी वाला एलजेब्रा हो, नाली की गैस से चाय बनाना हो या बादलों में रडार का चमत्कारी विश्लेषण हो, मोदी ‘न भूतो न भविष्यति’ का अपराजेय रुतबा कायम कर चुके हैं। झूठ, धोखा, फरेब, चालबाज़ी, पैंतरेबाज़ी को राष्ट्रीय गुण बनाने का ऐसा उद्यम पहले भारतीय राजनीति में किसी नेता में नहीं देखा गया। यहां मोदी ने नेहरू, इंदिरा समेत सबको फेल कर दिया है।

तुलसीदास इन जैसों के लिए ही लिख गये हैं- झूठई लेना, झूठई देना, झूठई भोजन, झूठ चबेना। देश का सत्यानाश कई स्तरों पर एकसाथ बहुत तेज़ी से किया जा चुका है। मीडिया इस महायज्ञ में सहभागी है।

https://twitter.com/TheDeshBhakt/status/2023961209066988022

नीरज बधवार-

गलगोटिया मामले के असली सबक… गलगोटिया मामले में यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नेहा सिंह का व्यवहार हर बड़ी संस्था के प्रवक्ता के लिए एक सबक होना चाहिए। होता ये है कि हमारी संस्थाओं में ऐसे पदों पर भर्ती के वक्त ये देखा जाता है कि सामने वाला कितनी तेज़तर्रार अंग्रेज़ी बोल पा रहा है, उसके बोलने में कितना कॉन्फिडेंस है। ऊपर से अगर उसका चेहरा-मोहरा भी ठीक है, तो बस और क्या चाहिए।

चूंकि मोटे तौर पर समाज के अवचेतन में अंग्रेज़ी को लेकर एक कॉम्प्लेक्स है, लिहाज़ा जो ये सब कर पाता है, वो सिर्फ अंग्रेज़ी बोल पाने और इससे मिले सम्मान की वजह से ही खुद को विद्वान भी मान बैठता है। फिर वो कुछ मनोवैज्ञानिक चालाकियां सीख लेता है कि कैसे पब्लिक डीलिंग में सामने वाले को अपने इन्हीं तेवरों से दबाव में लाया जा सके।

भारतीय कॉरपोरेट जगह में ऐसे हवाई लोग भरे पड़े हैं, जिनकी एक मात्र योग्यता ये है कि वो मुंह बना-बनाकर तेज़तर्रार अंग्रेज़ी बोल लेते हैं। लेकिन ये सब चीज़ें तो कम्यूनिकेशन का श्रृंगार भर हैं। आपको पता होना चाहिए कि किस मौके पर कितना बोलना है, आपकी बात में कितना उत्साह होना चाहिए। अपनी बात रखते वक्त आपके शब्दों का चयन कैसा है, आप कितने इमोशनल इंटेलिजेंट हैं। मतलब, जब शब्द मुंह से निकलकर बाहर आएं, उससे पहले आप कई तराजुओं पर तौलकर उनका नाप-तौल कर लेते हैं। आपके अंदर ये परिपक्वता हो कि मेरे एक-एक शब्द के क्या मायने हैं। और सबसे ज़रूरी बात, जो आदमी इस पद पर रख रहा है, क्या वो जानता है कि आपमें ये सब होना चाहिए?

मुझे याद आता है, सत्या नडेला ने एक इंटरव्यू में कहा था कि जब मैं सालों पहले माइक्रोसॉफ्ट में इंटरव्यू के लिए गया था, तो अंतिम राउंड में शीर्ष अधिकारी ने मुझसे बस एक सवाल पूछा था—अगर तुम सड़क पर रोते हुए बच्चे को देखोगे, तो क्या करोगे? सत्या ने बताया, “मैंने कहा, अगर मैं ऐसे किसी बच्चे को रोता देखूंगा तो 911 पर कॉल करूंगा।” सत्या ने कहा कि मुझे नौकरी पर रख लिया गया, मगर उस अधिकारी ने कहा, “अगर आप कभी सड़क पर रोते बच्चे को देखें, तो सबसे पहले उसे गले लगाकर चुप करवाएं।”

ये जो भावनात्मक समझदारी है न, यही किसी पद पर बैठे आदमी की सबसे बड़ी ताकत होती है। खासतौर पर अगर आप पब्लिक डीलिंग में हैं, तो आपमें इस बात की और अधिक समझ होनी चाहिए। अगर नेहा सिंह ने अपने अतिआत्मविश्वास में पहले दिन कुछ गलत बोल दिया था या उससे वो झूठा दावा करवाया गया, तो गलगोटिया यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट में इतनी समझ होनी चाहिए थी कि उसे दोबारा जनता के सामने मत आने दिया जाए। आपको ये भी समझना चाहिए था कि जब कोई इंसान इस हद तक एक्सपोज़ हो चुका है, तो उसकी तरफ से दी गई किसी भी तरह की सफाई लोगों में और गुस्सा पैदा करती है।

मगर पता नहीं क्यों, गलगोटिया की जिस प्रवक्ता की वजह से भारत का एआई समिट बुरी रोशनी में आया, अगले दिन संस्थान ने उसी नेहा सिंह को फिर से मीडिया के सामने पेश कर दिया। और सामने आ भी गई तो, बजाय विनम्रता दिखाते हुए गलती मानने के, वो ये साबित करने में लग गई कि मैंने तो ऐसा कभी कहा ही नहीं, तुम लोग ही मूर्ख हो! अब ये तो धूर्तता है।

अब ऐसी धूर्तता वही दिखा सकता है जो सारा जीवन झूठे आत्मविश्वास और मनोवैज्ञानिक पैंतरेबाज़ियां दिखाकर लोगों को मूर्ख बनाता रहा हो, जिसका अहंकार ये मानने को तैयार ही नहीं हो कि मुझसे गलती हो गई हो।

यही वो मौका था जब गलगोटिया मैनेजमेंट को भी क्राइसिस मैनेजमेंट करना था। लेकिन इस अतिआत्मविश्वासी और अहंकारी प्रवक्ता को फिर से जनता के हवाले करके मैनेजमेंट ने भी बता दिया कि हमें इन सब चीज़ों की रत्तीभर अक्ल नहीं। अगर नेहा सिंह यूनिवर्सिटी के इशारे पर भी ऐसा कोई झूठ बोल रही थी, तो अगले दिन किसी और से माफी मंगवाकर मामले को हल्का किया जा सकता था, मगर ऐसा भी नहीं किया गया।

मेरी हैरानी ये है कि जो यूनिवर्सिटी लाखों छात्रों को इस जिंदगी की चुनौतियों के लिए तैयार कर रही है, अगर वो खुद एक छोटे से संकट से डील नहीं कर सकती, तो वो बच्चों को क्या ही सिखा रही होगी।

गलगोटिया का मामला सिर्फ किसी एक प्रवक्ता के बड़बोलेपन का नहीं है, बल्कि भारतीय समाज और शिक्षा तंत्र में बड़े पैमाने पर मौजूद संवाद की संवेदनहीनता का है। मगर अफसोस, उस पर हमारे यहां बहुत कम चर्चा होती है।


अभिषेक उपाध्याय-

बीजेपी क्या 2010 के दौर की कांग्रेस हो चुकी है? जबरदस्त अनिर्णय की शिकार। केंद्रीय आईटी मिनिस्टर अश्विनी वैष्णव चाइनीज मॉडल को भारतीय बताने वाले इस ट्वीट को अब तक डिलीट नहीं कर सके हैं,

जबकि इस AI कुत्ते को गोद लेकर आनन फानन में इसका पिता बन जाने वाले गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने खुद मान लिया है कि ये माल चाइनीज़ था, उसने ये तक कह दिया है कि हमने कभी नहीं क्लेम किया कि ये हमारा है।

इसके बावजूद अश्विनी वैष्णव का ट्ववीट अब भी इसी तस्वीर के साथ भारत के Sovereign model की कहानी बयां कर रहा है। बीजेपी कदम कदम पर ऐसे ही ठहराव और अनिर्णय की शिकार दिखाई दे रही है।

आप यूजीसी पर कोई निर्णायक कदम लेने की स्थिति में नहीं हैं। वो तो सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दे दिया और आपको उसका परिस्थितिजन्य लाभ मिल गया, वरना आप कुआं और खाई के बीच में खड़े होकर किंकर्तव्यविमूढ़ता के भरतनाट्यम नृत्य का अभ्यास कर रहे थे।

आप अपनी ही महाभ्रष्ट और महाजातिवादी साबित हो चुकी सरकारों पर कोई एक्शन लेने की स्थिति में नहीं हैं, बस किसी बूढ़े और लाचार बाप की तरह अपने जवान बेटे की बिगड़ी हुई लतों को हुक्का भरते हुए देख रहे हैं और अपने दिन गिन रहे हैं।

आप अपने ही मंत्रिमंडल से ‘डेड वुड’ को छांटकर ‘फ्रेश ब्लड’ भरने की स्थिति में नहीं हैं। आपका सोशल मीडिया का सारा नैरेटिव उसी तरह ध्वस्त हो चला है, जैसे कोई ताश का महल एकाएक भड़भड़ाकर नीचे गिरता है! आप अपनी इलेक्शन मशीनरी पर ‘आत्ममुग्ध’ प्रतीत होते हैं।

आपको शायद ख़बर भी नहीं कि जनाक्रोश के ट्रैफिक ने जब इमरजेंसी की मशीनरी का चक्का जाम कर दिया था तो आप फिर क्या हैं? बीजेपी 2014 के बाद से अपने सबसे मुश्किल दौर में है।

न सवर्ण साथ हैं और न पिछड़े और दलित ही संतुष्ट हैं। त्वरित निर्णय लेने की जो क्षमता एक दौर में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थी, वही अब सबसे बड़ी लॉयबिलिटी बन चुकी है। इतिहास ने बड़ी से बड़ी राजशाही को एक रोज़ ऐसे ही ध्वस्त होते हुए देखा है!!

Related News…

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन