संजय कुमार सिंह
मुझे लगता है कि आज बंगाल चुनाव से संबंधित खबरें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। यह भी दिलचस्प है कि आई-पैक प्रमुख को मतदान के अगले ही दिन जमानत मिल गई। आज यह खबर द टेलीग्राफ और दि एशियन एज में सिंगल कॉलम में पहले पन्ने पर है। मतदान के कई दिनों बाद मतगणना हमेशा संदिग्ध और चुनाव लड़ने वालों के लिए मुश्किल भरा होता है। इस अंतराल को कम करने की कोशिश की जानी चाहिए पर बंगाल में सब कुछ हुआ यही नहीं हुआ है। इसलिए इससे संबंधित खबर तो पढ़ी ही जाएगी। दूसरी खबरों के आलोक में यह महत्वपूर्ण है तभी द टेलीग्राफ के साथ दि एशियन एज और दि इंडियन एक्सप्रेस में आज बंगाल चुनाव से संबंधित खबरें लीड हैं। द टेलीग्राफ और इंडियन एक्सप्रेस की लीड ईवीएम वाले स्ट्रांग रूम की सुरक्षा और उसमें अवैध या संदिग्ध प्रवेश का मामला है तो एक्जिट पोल भी चर्चा में है। यही नहीं, पुनर्मतदान की मांग भी है। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड चौंकाने वाली है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, सुप्रीम कोर्ट ने एम्स से कहा : आप 15 साल की बच्ची को मां बनने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। शीर्षक पढ़कर सवाल उठता है कोई अस्पताल किसी को मां बनने के लिए क्यों और कैसे मजबूर करेगा या चिकित्सीय कारण से कर भी रहा हो तो सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप का क्या मतलब? इलाज से संबंधित जोखिम लेने के लिए अगर अदालत की अनुमति जरूरी हो तो इलाज वैसे ही महंगा है। सुप्रीम कोर्ट में मामला कौन लड़ पाएगा और बिना उचित प्रतिनिधित्व के सुप्रीम कोर्ट में मामला जाने या ले जाने का भी कोई मतलब नहीं लगता है। कुल मिलाकर, ऐसा कुछ है तो उसे खत्म किया जाना चाहिए और जनहित में सुप्रीम कोर्ट की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि चिकित्सीय निर्णय अस्पताल और डॉक्टर ही करें।
यह दिलचस्प है कि इंडियन एक्सप्रेस की खबर और शीर्षक से ऐसा लगता है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का फ्लैग शीर्षक सुप्रीम कोर्ट के हवाले से है, इसे राज्य और नागरिकों के बीच संघर्ष नहीं बनाया जाए। खबर के अनुसार अदालत ने एम्स की याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। हालांकि यह याचिका सर्वोच्च अदालत के आदेश में सुधार के लिए थी और सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है या जो खबर है उसके अनुसार, अस्पताल को बच्ची के माता-पिता की इच्छा का सम्मान करना चाहिए। मुझे लगता है कि अस्पताल भले नियमों की बात कर रहा है लेकिन वह चिकित्सीय जरूरत भी है। हालांकि, मेरे लिए मुद्दा एक मामले की रिपोर्टिंग है न कि मामला। मैं यही कहना चाह रहा हूं कि एक ही खबर दो तरह से रिपोर्ट की जा सकती है और राजनीतिक मामलों में इसी से खेल हो रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का उपशीर्षक भारत के मुख्य न्यायाधीश के हवाले से है। इसके अनुसार उन्होंने कहा है कि अवयस्क लड़की से बलात्कार के कारण अवांछित गर्भ की स्थिति में गर्भपात की समय सीमा खत्म होनी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश अपनी जगह सही हो सकते हैं लेकिन अस्पताल का कहना है कि एक समय के बाद गर्भपात संभव नहीं है और वह समय पूर्व प्रसव कराना होगा जो नवजात के साथ बच्ची की जान के लिए भी खतरा हो सकता है। इस संबंध में कानून अगर होगा तो बच्ची की सुरक्षा के लिए होगा लेकिन खबर से यह स्पष्ट नहीं है और कुछ सवाल या जिज्ञासाएं अनुत्तरित हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि मामला अदालत में तय होना हो तो अदालती निर्णय में हो सकने वाली देरी भी मरीज या संबंधित नागरिक के लिए मुश्किल हो सकती है।
सामान्य समझ यही है कि अगर किसी कारण से किसी को अवांछित गर्भ ठहर जाए और संबंधित बालिका या महिला गर्भपात करना चाहे तो शीघ्रातिशीघ्र प्राथमिकता के आधार पर गर्भपात कराया जाना चाहिए क्योंकि देरी से मुश्किल हो सकती है। अस्पताल को लगता है कि देरी हो चुकी है तो उसकी सलाह मानी जानी चाहिए और बाद की व्यवस्था होनी चाहिए न कि देरी के बाद पीड़िता को उसके हाल पर छोड़ दिया जाना चाहिए या किसी विशेष स्थिति के लिए मजबूर किया जाना चाहिए। अमर उजाला में यह खबर टॉप पर सात कॉलम में छपी है। इसमें एक छोटी खबर है, पीड़िता के बारे में सोचने की जरूरत। इसमें कहा गया है, हम अजन्मे बच्चे पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, जबकि उस लड़की के बारे में सोचने की जरूरत है, जिसने इतना कष्ट सहा है। उसके लिए हर पल मुश्किल है। अगर गर्भपात की अनुमति नहीं दी गई तो यह नाबालिग के लिए जीवनभर का जख्म होगा। ऐसे मामलों में यह देखना जरूरी है कि पीड़िता की गरिमा को कैसे वापस लाया जा सकता है – सुप्रीम कोर्ट। मुझे लगता है कि अजन्मे बच्चे को समय पूर्व पैदा होने पर मरने के लिए छोड़ा नहीं जा सकता है या छोड़ा नहीं जाना चाहिए और इससे संबंधित नियम स्पष्ट नहीं होंगे तो समस्या बनी रहेगी और इस पर भी बात होनी चाहिए। गर्भपात और समय पूर्व प्रसव अलग चीजें हैं। अवांछित गर्भ चाहे जिस कारण से हो, पैदा होने वाले बच्चे से संबंधित निर्णय और नियम कन्या भ्रूण हत्या से संबंधित कानून के संदर्भ में भी होना होगा और यह निर्णय अस्पताल करे या कोर्ट, यह भी सोचना होगा। आज की खबर आधी-अधूरी लगती है। गर्भपात के मामले में ऐसी खबरें आती रहती हैं।
मुझे लगता है कि हर बार मामला सुप्रीम कोर्ट तय करे उससे बेहतर होगा कि वह नियम और आधार तय कर दे तथा फैसला चिकित्सक या अस्पताल को करने दे। अवैध संतान को गोद लेने-देने की व्यवस्था है तो अवांछित संतान के बावजूद कोई किसी को मां बनने के लिए मजबूर नहीं करेगा और जिन स्थितियों में अवांछित गर्भ ठहरता है उसके लिए (ज्यादातर मामलों में) अस्पताल दोषी नहीं हो सकता है। अस्पताल अगर तय करता है कि गर्भपात कराना खतरनाक हो सकता है तो उसके निर्णय को माना जाना चाहिए। इसमें कानून की कोई जरूरत नहीं है कानून इसके बाद पैदा होने वाले बच्चे के संबंध में हो सकता है या बच्चे पर मां या उसके पिता के अधिकार का भी हो सकता है। खबर के अनुसार बच्ची (और उसके माता-पिता) नहीं चाहते हैं कि सामान्य प्रसव हो जबकि अस्पताल का कहना है कि अब गर्भपात संभव नहीं है जो होगा वह समय पूर्व प्रसव होगा और नवजात की जान का जोखिम होगा (जाहिर है उसकी हत्या नहीं की जा सकती है और न उसे मरने के लिए छोड़ा जा सकता है, भले बच्ची और उसके माता पिता के लिए इसका मतलब नहीं हो)। अदालत का कहना है कि वह बच्ची और उसके माता-पिता की इच्छा का सम्मान करे और अपना फैसला न थोपे। मुझे लगता है और खबर यही है कि इस समय गर्भपात कराना बच्ची के लिए भी खतरनाक हो सकता है। जाहिर है, अदालत में मामला बच्ची की ओर से ले जाया गया है।
मुख्य खबर के साथ एक खबर यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट ने मां की अपील पर अवमानना का नोटिस भी जारी किया है। खबर से मुझे लगता है कि 15 साल की लड़की के 17 साल के लड़के से संबंध थे। लड़की गर्भवती हो गई। मां को देर से पता लगा (या समझ में आया)। अस्पताल ने देरी के कारण गर्भपात कराने से मना कर दिया तो मामला अदालत गया। सामान्य स्थितियों में यही हुआ होगा। आम मध्यमवर्गीय परिवार शायद यही करे लेकिन अदालत की यह सोच और कि अस्पताल किसी को मां बनने के लिए मजबूर कर रहा है या कर सकता है – मुझे नहीं जम रही है। मां बनने का मामला दो लोगों के बीच का है। कानून उन्हें वयस्क न मानता हो पर प्रकृति मानती है तभी लड़की गर्भवती हुई है। चिकित्सक अगर गर्भपात संभव नहीं मानते हैं तो इसका भी सम्मान किया जाना उतना ही जरूरी है जितना बच्ची और उसके माता पिता की इच्छा का कि बच्चा पैदा ही नहीं हो। ऐसे में कानून की भूमिका पैदा होने वाले बच्चे से संबंधित भी होनी चाहिए। पीड़ित परिवार या अस्पताल से ही नहीं। जो भी हो, यह चर्चा का एक विषय है। आधुनिक समाज में इस तरह की समस्या आ सकती है और फैसला आगे के लिए सोच विचार कर किया जाना चाहिए। अभी मामला शीर्षक का है और मेरी टिप्पणी जनहित में शीर्षक से संबंधित है। अब के बच्चे हमारे समय के बच्चों के मुकाबले सब जानते समझते हैं इसलिए ऐसा होना नहीं चाहिए था लेकिन हो गया तो शीर्षक किसी बच्चे को मामला समझाने के लिए उत्सुक नहीं करेगा या खबर पढ़कर समझ में आ जाएगा लेकिन कुछ मां-बाप के लिए ऐसे अखबार को छिपाना पड़ सकता है। जवाब देना भी मुश्किल होगा। लेकिन सबको जागरूक करने के लिए ऐसी खबरें होनी ही चाहिए।

फोटो मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


