गाजीपुर- यूपी के गाजीपुर स्थित हरिहरपुर गांव में आठ साल की प्रिया का बचपन खेल और स्कूल की किताबों में नहीं, बल्कि घर के एक कोने में बंधी डोरियों के बीच सिमट कर रह गया है। कमर के नीचे उसका शरीर लगभग निष्क्रिय हो चुका है, पैर सूख चुके हैं। वह न ठीक से बोल पाती है, न समझ पाती है। डोरियां खुलते ही वह चलने–दौड़ने की कोशिश में बार-बार गिर जाती है और चोटिल हो जाती है। उसके शरीर पर चोटों के कई निशान साफ नजर आते हैं। पांच साल की छोटी बहन परिधि की हालत भी कुछ अलग नहीं है।
ऐसी ही दर्दनाक कहानी हरिहरपुर तक सीमित नहीं है। मनिहर, सदर, बहादीपुर, फतेहउल्लाहपुर, हरिहरपुर, धारीकला, तारडीह, राठौली सराय, खुटहन, भौरहारा, बुढ़नपुर समेत दर्जन भर गांवों में पूनम, सलोनी, रमिता, राजू, सोनी, शिवम, राहुल और अक्षय जैसे कई बच्चे मानसिक और शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे हैं।
बच्चों के माता-पिता की आंखों में बेबसी है। उनका कहना है कि सभी बच्चे जन्म के समय पूरी तरह स्वस्थ थे। कुछ महीने या साल बाद तेज बुखार आया और फिर हालत लगातार बिगड़ती चली गई। वर्षों तक इलाज कराने के बावजूद न तो कोई सुधार हुआ और न ही डॉक्टर बीमारी की स्पष्ट वजह बता पाए।

समाजसेवी सिद्धार्थ राय द्वारा मामले को प्रमुखता से उठाए जाने और राजभवन व शासन के हस्तक्षेप के बाद स्वास्थ्य विभाग हरकत में आया है। गांव-गांव स्वास्थ्य टीमें भेजी जा रही हैं और एंबुलेंस लगातार दौड़ रही हैं। प्रशासन को बुखार के बाद झटके आने और मानसिक-शारीरिक अक्षमता से पीड़ित 46 बच्चों की सूची सौंपी गई है, जबकि ग्रामीणों का दावा है कि ऐसे बच्चों की संख्या 100 से अधिक है। अब तक करीब 40 बच्चों का इलाज बीएचयू में कराया जा चुका है, लेकिन ठोस राहत नहीं मिल सकी है।
नहर में छोड़ा जा रहा केमिकल युक्त पानी!
ग्रामीणों ने इस बीमारी के पीछे गंभीर आरोप लगाए हैं। प्रभावित इलाकों से करीब पांच किलोमीटर के दायरे में एक बड़ा सुखबीर एग्रो और एनर्जी प्लांट स्थापित है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 2007 में सुखबीर एग्रो नामक प्लांट लगने के बाद से ही बुखार और शारीरिक अक्षमता के मामले तेजी से बढ़ने लगे।
आरोप है कि प्लांट प्रतिदिन करीब तीन लाख लीटर भूजल का इस्तेमाल करता है और उपयोग के बाद केमिकल युक्त पानी नहर में छोड़ देता है। इससे भूजल प्रदूषित हो रहा है। अधिकांश ग्रामीण हैंडपंप का पानी पीने को मजबूर हैं। हर घर नल योजना के तहत पाइपलाइन तो बिछा दी गई है, लेकिन कई गांवों में आज तक नल से पानी नहीं आया।
अब सवाल यह है कि आखिर इन मासूमों की जिंदगी किसने छीनी और कब तक यह पीड़ा यूं ही चलती रहेगी? प्रशासन और सरकार की जांच पर पूरे इलाके की निगाहें टिकी हैं।
यह मामला सिर्फ इलाज का नहीं, बल्कि पर्यावरण-जनित सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का है। इससे निजात के उपाय तीन स्तरों—तत्काल, मध्यकालीन और दीर्घकालीन होने चाहिए। अगर एक भी कड़ी कमजोर रही तो नई पीढ़ियां भी इसी त्रासदी का शिकार होती रहेंगी।
- तत्काल उपाय (Emergency Public Health Response)
सबसे पहले बच्चों की जान और आगे की क्षति को रोकना जरूरी है।
दूषित पानी पर तुरंत रोक
प्रभावित गांवों में हैंडपंप और कुओं का उपयोग तत्काल प्रतिबंधित किया जाए। टैंकर या बोतलबंद पानी की सरकारी आपूर्ति सुनिश्चित हो। हर घर नल योजना की अस्थायी सप्लाई चालू की जाए (भले टैंकर से)।
मेडिकल इमरजेंसी कैंप
गांवों में न्यूरोलॉजिस्ट, पीडियाट्रिशियन और टॉक्सिकोलॉजिस्ट की टीम भेजी जाए। सभी बच्चों का EEG, MRI, ब्लड–यूरिन टॉक्सिन टेस्ट कराया जाए। मिर्गी/न्यूरोलॉजिकल दवाओं की निःशुल्क आपूर्ति हो।
बच्चों को बांधने की प्रथा रोकना
माता-पिता को समझाया जाए कि डोरी बांधना बीमारी नहीं रोकता, बल्कि नुकसान बढ़ाता है। फिजियोथेरेपी और सपोर्टिव डिवाइसेज़ (ब्रैस, व्हीलचेयर) उपलब्ध कराई जाएं।
- मध्यकालीन उपाय (Investigation & Accountability)
- कारण की वैज्ञानिक जांच
- AIIMS / ICMR / NEERI जैसी स्वतंत्र एजेंसियों से जांच
पानी, मिट्टी, फसल और हवा के हेवी मेटल व केमिकल एनालिसिस खासकर जांच हो:
- आर्सेनिक
- मरकरी
- लेड
- कीटनाशक अवशेष
- इंडस्ट्रियल सॉल्वेंट्स
संदिग्ध प्लांट पर कार्रवाई.. एग्रो/एनर्जी प्लांट का:
- पर्यावरण ऑडिट
- जल उपयोग और अपशिष्ट निपटान की जांच
दोष मिलने पर:
- प्लांट सील
- पर्यावरण क्षति का भारी जुर्माना
- प्रभावित बच्चों के इलाज का खर्च प्लांट से वसूला जाए
FIR और कानूनी कार्रवाई
- IPC + Environment Protection Act + Water Act के तहत केस
- जिला प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका की भी जांच
- दीर्घकालीन समाधान (Permanent Safeguards)
सुरक्षित पेयजल प्रभावित गांवों में:
- RO आधारित सामुदायिक वाटर प्लांट
- पाइप्ड वाटर सप्लाई को 24×7 किया जाए
- भूजल के बजाय सतही जल स्रोत अपनाए जाएं
प्रभावित बच्चों का पुनर्वास.. हर बच्चे को:
- दिव्यांग प्रमाण पत्र
- मासिक पेंशन
- मुफ्त इलाज और शिक्षा
- एक रीहैबिलिटेशन सेंटर (फिजियो, स्पीच थेरेपी, स्पेशल एजुकेशन)
लगातार निगरानी हर 6 महीने पर:
- स्वास्थ्य सर्वे
- पानी और मिट्टी की जांच
- गांवों को हाई-रिस्क जोन घोषित किया जाए
- सबसे जरूरी बात: इसे दबने न दें
ऐसे मामलों में सबसे बड़ा खतरा यह होता है कि, कुछ समय बाद टीमें लौट जाती हैं। मीडिया शांत हो जाता है और बच्चे यूं ही तड़पते रह जाते हैं। इसलिए जरूरी है कि यह मामला हाई कोर्ट / नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल तक पहुंचे। इसे केवल “बीमारी” नहीं बल्कि संभावित औद्योगिक ज़हरकांड माना जाए।



