लखनऊ | 11 अप्रैल 2025 |
“न्याय में देरी, न्याय से इनकार है” – और शायद यही हो रहा है यूपी की बहुचर्चित गोमती रिवरफ्रंट घोटाले में, जहां हजारों करोड़ का सरकारी पैसा डकारने वाले अफसर और नेता आज भी आराम से घूम रहे हैं, जबकि जनता ठगी-सी देख रही है।
लखनऊ के राजाजीपुरम निवासी सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार पैरोकार संजय शर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक आग उगलता पत्र भेजकर इस पूरे मामले की जांच में हो रही शर्मनाक देरी पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि CBI और ED वर्षों से “जांच” का ढोंग कर रहे हैं, लेकिन न कोई गिरफ्तारी हुई, न कोई ठोस चार्जशीट, और न ही किसी गुनहगार को अदालत के कटघरे तक लाया गया।
कहां गया 1,435 करोड़ रुपये का हिसाब?
1,500 करोड़ की लागत से बनी गोमती रिवरफ्रंट परियोजना का 60% काम हुआ, बाकी पैसा हवा में उड़ गया! और जिनके नाम इस लूट में सामने आए – आलोक रंजन (पूर्व मुख्य सचिव), दीपक सिंघल (पूर्व सिंचाई सचिव) और शिवपाल सिंह यादव (पूर्व सिंचाई मंत्री) – वो आज भी न पार्टी से बाहर हुए, न जेल गए, न किसी कार्रवाई की आंच उन तक पहुंची। क्या यही है “न खाऊँगा, न खाने दूँगा”?
संजय शर्मा का सवाल सीधा और तीखा है – “अगर ये लोग निर्दोष हैं तो सरकार स्पष्ट क्यों नहीं करती? और अगर दोषी हैं तो अभी तक जेल में क्यों नहीं?” जनता से लिया गया टैक्स किसके ऐशोआराम के लिए लुटाया गया?
उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने जो रिपोर्ट सौंपी है, उसमें साफ लिखा है कि CBI और ED की जांच अभी भी जारी है। लेकिन जांच की कोई समयसीमा नहीं, कोई निष्कर्ष नहीं। सिर्फ फाइलों का बोझ बढ़ता जा रहा है और घोटालेबाज चैन की नींद सो रहे हैं।
हर चुनाव में भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़हर उगलने वाले नेताओं की अब चुप्पी गूंज रही है। जनता पूछ रही है – क्या जीरो टॉलरेंस सिर्फ विपक्ष के लिए है? जब बात अपनों की आती है तो सरकार की रीढ़ क्यों कमजोर पड़ जाती है?
संजय शर्मा ने चेतावनी दी है – “अगर जल्द से जल्द इस मामले में ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सिर्फ एक घोटाले की बात नहीं रहेगी, यह लोकतंत्र और न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सीधा हमला होगा।”
अब देखना है कि प्रधानमंत्री कार्यालय इस खत को रद्दी की टोकरी में फेंकता है या किसी घोटालेबाज की गर्दन पर कानून की तलवार चलती है।


