
संजीव पालीवाल-
अस्पताल में मेरे चचेरे भाई भर्ती थे। दिमाग की नस फट गयी थी। दिलशाद गार्डन में रहते थे। भले पड़ोसी उनको लेकर अस्पताल गये थे। घर के पास ही ये अस्पताल है। दुर्भाग्य से भैया अब इस दुनिया में नहीं रहे।
लेकिन भैय्या जाते-जाते एक ऐसा काम कर गये जिसका आईडिया मुझे नहीं था। अब इस सरकारी अव्यवस्था का शिकार होने के बावजूद मैं बेहद संतोष में हूं। भैय्या ने जो किया वो हम सबके लिये प्रेरणादायक है।
मेरे भाई अकेले रहते थे। नितांत अकेले। परिवार में किसी के साथ रहना मंजूर नहीं था। शादी की नहीं। बच्चा कोई नहीं। बैंक की नौकरी से रिटायर। पेंशन भोगी इंसान किराये के घर में रहते थे। लेकिन फोन से सबके सम्पर्क में रहते थे।
अक्सर वो ये ज़िक्र करते रहते थे कि उनकी मृत्यु के बाद उनका शरीर दान दे दिया जाये रिसर्च के लिये। तो जब मैं अस्पताल में था और डाक्टर ने बता दिया कि इनके पास ज्यादा वक्त नहीं है तब परिवार में सबने तय किया कि उनकी इच्छा का पालन किया जाये। मेरी बुआ की बेटी जो दिल्ली में ही रहती है उसने ये ज़िम्मेदारी ली।
भैया ने देहदान के एक संकल्प पत्र पर साइन किये थे। लेकिन उस पर लिखा हेल्पलाइन नंबर काम नहीं कर रहा था। बहन ने फिर ऑनलाइन रिसर्च किया। AIIMS से जुड़ी एक संस्था को फोन किया। कोई जवाब नहीं मिला। फिर एक और सरकारी संस्था को फोन किया। उन्होंने बताया कि वो फुल बॉडी नहीं लेते हैं। सिर्फ़ ऑर्गन लेते हैं। लेकिन उन्होंने ‘दधीचि देह दान समिति’ के सुधीर गुप्ता का नंबर दिया। उन्होंने बहुत तत्परता से सारी बात समझी और पंद्रह मिनट में उनका नुमाइंदा हमारे सामने अस्पताल में खड़ा था।
बेहद सम्मान के साथ भैय्या के शरीर को स्वीकार किया और मोर्चरी में रख दिया गया।
आज सुबह हम परिवार के लोग GTB Hospital परिसर में स्थित University College of Medical Sciences के Department of Anatomy पहुँचे। वहां की विभागाध्यक्ष ने परिवार का स्वागत किया और भैय्या की देह दान के लिये धन्यवाद दिया। हमें पूरे सम्मान के साथ सारे काग़ज़ात सौंपे गये। दधीचि देह दान समिति के सदस्य भी वहां मौजूद रहे।
ये पूरा कार्यक्रम आँखें खोलने वाला रहा। भैय्या की इस इच्छा ने हम सबको सोचने पर मजबूर कर दिया। अस्पताल में हमें बताया गया स्वेच्छा से देह दान करने की प्रथा उत्तर भारत में ना के बराबर है। जबकि दक्षिण में ये बेहद सामान्य है।
देहदान से प्राप्त देह का इस्तेमाल मेडिकल छात्रों की शिक्षा के लिये होता है। अगर देह नहीं होगी तो प्रैक्टिकल कैसे होगा? छात्र कैसे शरीर की संरचना और उसके विज्ञान को सीखेंगे?
हमें वो जगह भी दिखाई गयी जहां शरीर सुरक्षित रखा जाता है। हमने वो लैब भी देखी जहां छात्र प्रैक्टिकल करते हैं। और ये भी जाना कि अपना उद्देश्य पूरा करने के बाद देह का समापन कैसे होता है।
ये समझ आया कि जीवन जीने का सिर्फ़ एक ही तरीका नहीं होता। जो हमें पता है वो कुछ भी नहीं है। बहुत कुछ है जो अनजाना है। भैय्या की आत्मा को भगवान शांति दें। भैय्या जाते-जाते एक नयी राह दिखा गये। मैंने इस राह पर चलने का संकल्प ले लिया है।
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