सचिन झा शेखर-
मैं नोएडा एक्सटेंशन की एक सोसाइटी में रहता हूँ और यहाँ पिछले एक हफ्ते से व्हाट्सऐप ग्रुप पर सिर्फ एक ही बहस चल रही है. घरों में झाड़ू, पोछा और बर्तन साफ करने आने वाली महिलाएँ अब 1500–1600 के बदले 1800 रुपए मांग रही हैं और महीने में चार छुट्टियाँ भी चाहती हैं. लोग नाराज़ हैं, परेशान हैं, और नए नियम बनाने की मांग कर रहे हैं.
लेकिन इस बहस की परतें अगर थोड़ी सी उठाई जाएं तो एक बहुत बड़ी सच्चाई सामने आती है।
अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक ग्रेटर नोएडा वेस्ट की लगभग 100 सोसाइटियों में करीब 20,000 महिलाएं घरेलू कामगार के तौर पर काम करती हैं. औसतन 8 से 12 हजार रुपए कमाती हैं. लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद इनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है.
ना PF, ना मेडिकल, ना जीवन बीमा. कई सोसाइटियों में मेंटेनेंस एजेंसी और गार्ड मिलकर इनकी कमाई में से कमीशन भी काट लेते हैं. यानी एक कमाई, कई हाथ.
सबसे दुखद बात ये है कि इनका कोई यूनियन, कोई संगठन नहीं है. पूंजीवाद ने हवा में ऐसा ज़हर घोला है कि इनमें से ज्यादातर महिलाएं खुद को मजदूर मानती ही नहीं हैं. मजदूर कहने में शर्म, अधिकार मांगने में डर, और शोषण को किस्मत मान लेने वाली मानसिकता, इसी कॉकटेल में इनकी पूरी जिंदगी गुजर रही है. और हमारे समाज ने इनके हाथों में क्या पकड़ा दिया है?
पुराना प्लाईवुड फर्नीचर, सेकंड-हैंड TV, सस्ता सोफासेट. ये चीजें इनके लिए “स्टेटस सिंबल” बन गईं और इसी भ्रम में ये महिलाएं अच्छे स्कूल, अच्छे अस्पताल और सुरक्षित भविष्य जैसी बुनियादी जरूरतों से दूर होती चली जाती हैं.
सबके पास एंड्रॉयड फोन है, इंटरनेट है, पर उस पर पहुंचता वही कंटेंट है जिसे व्यवस्था चाहती है. जब आप अधिकार की बात छेड़ें तो जवाब मिलता है “भय्या, मैं तो ये सब नहीं जानती.” और यहीं पर पूरा सिस्टम जीत जाता है.
इनके इलाकों में नेताओं के एजेंट हर दो-चार महीने में वैष्णो देवी, खाटू श्यामजी के लिए बस भेज देते हैं. कम पैसों में यात्रा हो गई तो खुश, सीट न मिली तो दुखी. धर्म और तीर्थयात्रा की इस लूप में इनकी पूरी भावनाएँ बंधी हुई हैं, और राजनीति इससे ज्यादा कुछ चाहती भी नहीं.
देश की संसद से महज 30 किलोमीटर दूर एक अलग ही दुनिया है। जहाँ अधिकार एक भाषा नहीं, एक “कल्पना” बनकर रह गया है. यहाँ शोषण की कोई पहचान नहीं, सुरक्षा का कोई सिस्टम नहीं, और भविष्य का कोई खाका नहीं है.
और दिमाग में सबसे ज्यादा चुभने वाली बात यह है कि ये महिलाएं बाहर से नहीं आईं. इनमें से अधिकतर यहीं की मूल निवासी हैं. जिनके पूर्वजों ने शहर बसाने के लिए अपनी जमीन दी, जिनके खेतों पर आज सोसाइटियों के टॉवर खड़े हैं. वो पहले किसान थे, फिर मजदूर बने और अब इस शहर के अल्ट्रा-कैपिटलिस्ट मॉडल में एक सर्विस यूनिट मात्र रह गए हैं.
ये पूरा मॉडल चमकदार है, ग्लॉसी है, लेकिन इस चमक के पीछे हजारों महिलाओं की धुँधली जिंदगी छिपी है. और क्योंकि ये आवाज़ उठाना नहीं जानतीं, इसलिए इनकी दुनिया में बदलाव की उम्मीद भी किसी और के मूड पर निर्भर है. ये सोसाइटी में रहने वाले किसी और के मूड पर निर्भर हैं, क्योंकि अधिकतर किसी कंपनी में दिहाड़ी कर रहे हैं, जहां उनकी हालत भी ठीक इन्हीं महिलाओं जैसी है।
अल्ट्रा कैपिटलिस्ट मॉडल की नीरसता को करीब से देखना मजेदार है, लोग जी रहे हैं, जीते जा रहे हैं, उन्हें पता ही नहीं है कर क्या रहे हैं।



