जीएसटी का सच (पार्ट 13 से 23 तक) : जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी

जीएसटी का सच (15) : एनसीआर में आवाजाही आसान हुई तो जीएसटी आया

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

दिल्ली की एक युवती ने अपहरण कर बलात्कार किए जाने की शिकायत की थी। मामले की जांच के दौरान उसने पुलिस को बताया कि उसे फरीदाबाद ले जाया गया था और वहीं उसके साथ बलात्कार किया गया। यह उस समय की बात है जब उत्तर भारत में एम्बैसडर कारें ही चलती थीं। पढ़े-लिखे समझदार लोग ही जानते थे कि टैक्सी और कार में क्या अंतर होता है और अमूमन लोग कार को टैक्सी तथा टैक्सी को कार कहते थे। महिला ने बताया कि उसे टैक्सी से फरीदाबाद ले जाया गया था तो उससे टैक्सी (कार) का रंग पूछा गया। उसने काली-पीली बताया और पुलिस समझ गई कि महिला झूठ बोल रही है। क्योंकि तब काली-पीली टैक्सी फरीदाबाद (दूसरे राज्य में) नहीं जा सकती थी और सिर्फ दिल्ली में चलने के लिए थी। दिल्ली के विकास के साथ-साथ आस-पास के शहरों में आवा-जाही बढ़ रही है औऱ अब तरह-तरह की टैक्सी हैं। सीमा पार आने-जाने में अब कोई दिक्कत नहीं है। ना निजी कार से ना मेट्रो से।

इसके बावजूद जीएसटी के नियमों के अनुसार आप गाजियाबाद रहकर दिल्ली, गुड़गांव या फरीदाबाद के उपभोक्ताओं को घर बैठे अपनी सेवा तकनीकी तौर पर भले मुहैया करा सकें वास्तव में कराएंगे तो गलत करेंगे। गैर कानूनी होगा। इसके लिए आपको जीएसटी पंजीकरण कराना होगा। भले आपका कारोबार 20 लाख की निश्चित सीमा से काफी कम हो। सीवनहीन आवाजाही शुरू हुई तो कारोबार पर जीएसटी का प्रतिबंध लग गया। पता नहीं यह विकास है या विकास के लिए जरूरी। 

वह भी तब जब 17 सितम्‍बर, 2005 को अधिसूचित राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्रीय योजना-2021 का उद्देश्‍य, पूरे राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र को वैश्‍विक दृष्‍टि से श्रेष्‍ठ क्षेत्र के रुप में विकसित करना है। योजना का लक्ष्‍य क्षेत्र को आर्थिक रुप से संवृद्ध और इसका संतुलित विकास करना है। प्रमुख गतिविधियों को आकर्षित करने के लिए विकास के सशक्‍त बिंदु के रुप में मेट्रो और क्षेत्रीय केन्‍द्रों का विकास और क्षेत्रीय परिवहन संबद्धता तथा जनयात्री प्रणाली उपलब्‍ध कराना इसके उद्देश्यों में है। इसी के तहत मेट्रो चल रही है और दिल्ली-सोनीपत-पानीपत, दिल्ली-गुड़गांव-रेवाड़ी-अलवर के साथ दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ क्षेत्रीय रैपिड ट्रांजिट प्रणाली के लिए व्यवहार्यता अध्ययन के बाद विकास पर काम किए जाने की योजना बनी थी।
दरअसल, दिल्‍ली 1951 से ही जनसंख्‍या में अभूतपूर्व वृद्धि का सामना कर रही है। इस मुख्य कारण शहर की ओर जनसंख्‍या के प्रवसन की प्रवृत्‍ति रही है जो न केवल समीपवर्ती राज्‍यों से हुआ है बल्‍कि बिहार जैसे राज्‍यों से भी हुआ है। दिल्‍ली की जनसंख्‍या में हुई वृद्धि से भीड़-भाड़ बढती रही है और नागरिकों को मिलने वाली सुविधाओं का अभाव होता जा रहा है। इसलिए, यह महसूस किया गया है कि जैसे-जैसे दिल्‍ली का विकास होता जाएगा, वैसे-वैसे भूमि, आवास, परिवहन और आवश्‍यक आधारभूत संरचना जैसे जल आपूर्ति और मल-व्‍ययन के संबंध में दिल्‍ली की कठिनाइयां अधिक विकट होती जाएंगी।

इन्‍हीं चिंताओं के परिणामस्‍वरुप, क्षेत्रीय संदर्भ में दिल्‍ली की आयोजना की आवश्‍यकता महसूस की गई थी और     1956 में अंतरिम सामान्‍य योजना में सुझाव दिया गया है कि ‘बाह्य क्षेत्रों और यहां तक कि दिल्‍ली क्षेत्र के बाहर के क्षेत्रों के सुनियोजित विकेन्‍द्रीयकरण के लिए गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए।’ तदनुसार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का विकास हुआ जिसमें बड़े शहरी केंद्र जैसे दिल्ली, गुड़गांव, फरीदाबाद, नोएडा, गाजियाबाद आदि उद्योग और सेवा क्षेत्र के केंद्र के रूप में उभरे हैं। पर्याप्त आर्थिक और रोजगार के मौके तैयार करने के लिए माइक्रो और हाउसहोल्ड एंटरप्राइज के विकास की आवश्यकता महसूस की गई। इस उद्योग क्षेत्र की खासियत है कि इसमें ना सिर्फ रोजगार की उच्च संभावना होती है बल्कि पूंजी निवेश की आवश्यकता भी कम होती है जबकि मूल्यवर्धन का उच्च अनुपात होने के कारण निर्यात और देश के लिए विदेशी मुद्रा कमाने की अच्छी संभावना रहती है।   
इसलिए, सरकार ने 2006 में माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज डेवलपमेंट (एमएसएमईडी) ऐक्ट की घोषणा की ताकि एमएसएमई को प्रभावित करने वाले नीतिगत मुद्दों पर कार्रवाई की जा सके। इसके लिए एक मंत्रालय भी है। इस तरह, स्पष्ट है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के एकमुश्त विकास के लिए काम किया जा रहा है और कई योजनाएं हैं। इनसे प्रेरित होकर और स्वाभाविक कारणों से भी कइयों ने यहां छोटे-बड़े रोजगार शुरू किए हैं जो जाहिर है इस विस्तृत और विविध बाजार के आकर्षण से भी प्रभावित होंगे। पहले पूरा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एक बाजार था। भौतिक रूप से सामान भेजने पर राज्यों की सीमा पर रोक और पूछताछ का सामना करना पड़ता था। जीएसटी से ये सब बाधाएं खत्म करने का भरोसा दिया गया पर जहां ये बाधाएं थी ही नहीं, वहां राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को भी अलग-अलग राज्यों में बांट दिया गया है। 

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