जीएसटी का सच (पार्ट 13 से 23 तक) : जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी

जीएसटी का सच (18) : इनपुट क्रेडिट के बारे में

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

जीएसटी की बुनियादी खासियतों में एक यह बताया गया है कि इसमें उपभोक्ता को बार-बार टैक्स नहीं देना पड़ता है। आम उपभोक्ताओं को यह बात समझ में नहीं आ रही है। मुझसे कइयों ने पूछा कि यह कैसे हो सकता है जबकि इसकी आड़ में यह भी कहा जा रहा है कि जीएसटी से उपभोक्ताओं को अंततः फायदा होगा। आज इसे समझते हैं। यहां यह स्पष्ट कर दूं कि जीएसटी के तहत एक बड़ी कोशिश यह की गई है कि टैक्स आधार व्यापक बने। इसके तहत टैक्स देने वालों के साथ-साथ टैक्स योग्य वस्तुओं और सेवाओं का भी विस्तार किया गया है। इससे एक तरफ तो ज्यादा चीजों औऱ सेवाओं पर टैक्स लगने से कीमतें बढ़ेंगी दूसरी ओर सरकारी खजाने में ज्यादा राजस्व आने से सरकार को टैक्स की दर या टैक्स बढ़ाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। मुमकिन है बाद में इसे कम भी किया जा सके। यह बात सिद्धांत रूप में भले संभव हो, व्यवहार में क्या होगा, भविष्य बताएगा। फिलहाल, जीएसटी लागू होने से कीमतें बढ़ गई हैं।

इनपुट क्रेडिट के बारे में बताया गया है कि किसी भी सामान के निर्माता से लेकर अंतिम उपभोक्ता तक इसका प्रवाह सीवनहीन रहेगा। निर्माण चाहे कहीं हो, अंतिम उपभोक्ता किसी और राज्य का निवासी क्यों नहीं हो। उसे बार-बार लगने वाले टैक्स से राहत मिलेगी। इसे ऐसे समझें कि किसी भी सामान पर इनपुट टैक्स और आउटपुट टैक्स लगता है। इनपुट टैक्स वह है जो किसी सामान के निर्माण पर खर्च होता है या खर्च में शामिल है। इसी टैक्स को आउटपुट टैक्स में घटाया जा सकता है और यही जीएसटी का फायदा बताया जा रहा है। आउटपुट टैक्स वह है जो कोई निर्माता अपने उत्पाद पर लेता है (या लगता है)। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि जब आप किसी पंजीकृत विक्रेता से कोई उत्पाद/सेवा खरीदते हैं तो उसपर टैक्स देते हैं। यह सामान आपने निजी उपयोग के लिए नहीं खरीदा है और इसका मूल्यवर्धन करके या इससे कुछ बनाकर आप बेचेंगे जिसपर फिर टैक्स लगेगा वह आउटपुट टैक्स होगा। अगर आप बेचने वाले सामान पर जो टैक्स लेने वाले हैं उसमें से खरीदने के समय लगा पहले वाला टैक्स घटा दें तो जो घटाया वह आपके पास इनपुट टैक्स क्रेडिट था या है। अब बाकी बची राशि ही आपको आउटपुट टैक्स या टैक्स के रूप में जमा कराना है। इसी व्यवस्था को इनपुट टैक्स क्रेडिट और उसका उपयोग कहा जाता है।

अगर आप नौकरी के अलावा, कोई भी काम करते हैं और उसके बदले पैसे लेते हैं तो संभावना है कि आप पर जीएसटी लागू होगा। कुछेक अपवाद हैं पर ये ऐसे और इतने हैं कि एक दूसरे को निरर्थक बना देते हैं। उसपर चर्चा फिर कभी करूंगा। फिलहाल इनपुट टैक्स क्रेडिट व्यवस्था और इसके कारण हो सकने वाले लाभ को ही  समझते हैं। मान लीजिए कोई सिली-सिलाई कमीज बनाता है। इसके लिए वह कपड़ा खरीदेगा। मान लीजिए वह 1000 रुपए का कपड़ा खरीदता है। इसपर उसे 10 प्रतिशत जीएसटी के हिसाब से (जो भी दर हो) 100 रुपए जीएसटी देना होगा। यानी निर्माता 1000 रुपए का कपड़ा जीएसटी चुकाकर 1100 रुपए का खरीदेगा। अब कमीज तैयार करने के बाद निर्माता इसे 2000 रुपए में बेचता है। इसपर अगर 12 प्रतिशत के हिसाब से जीएसटी हुआ तो 240 रुपए जीएसटी होगा। पर वह 100 रुपए कपड़ा खरीदने के समय कपड़ा बेचने वाले बतौर जीएसटी को दे चुका है। इसलिए वह उपभोक्ता से 240 रुपए आउटपुट टैक्स लेगा इसमें से 100 रुपए इनपुट टैक्स घटाकर 140 रुपए जमा कराएगा। यहां 100 रुपए इनपुट टैक्स है। लेकिन वह जिसे बेचेगा उससे 240 रुपए बतौर टैक्स लेगा और कमीज की कुल कीमत 2240 रुपए हो जाएगी।

अब जीएसटी से पहले की स्थिति को देखिए। कमीज बनाने वाला टैक्स देकर 1100 रुपए का कपड़ा खरीदता था। उसे 2000 रुपए अपनी कीमत में 100  रुपए टैक्स के कुल बिक्री मूल्य 2100 रुपए टैक्स पर लेने होते थे और 12 प्रतिशत टैक्स 252 रुपए होते। कमीज की कुल कीमत होती 2520 रुपए। अब वह चूंकि 100 रुपए इनपुट टैक्स क्रेडिट ले सकता है इसलिए कमीज 2000 रुपए में ही बेचेगा। इसपर 12 प्रतिशत टैक्स 240 रुपए होगा तो कमीज की कीमत होगी 2240 रुपए। इस तरह, दावा किया जा रहा है कि जीएसटी से पहले जो कमीज आपको 2520 रुपए की मिलती वह जीएसटी के बाद 2240 रुपए मिलेगी।

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