मीडिया का नेशनल इश्यू… हनीप्रीत! हनीप्रीत!! हनीप्रीत!!!

गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। हनीप्रीत इस देश के मीडिया के लिए बड़ा मुद्दा है। उस मुद्दे से भी बड़ा जो जन जन से जुड़ा हो सकता है। इसीलिए तो तमाम मीडिया केवल और केवल हनीप्रीत की खबर दिखा और छाप रहा है। हनीप्रीत मिल भी जाए तो इससे जनता का क्या भला होने वाला है। वह मिल जाए तो बाद पेट्रोल-डीजल के दाम कम हो जाएंगे क्या! ना मिले तो नोट बंदी फिर से लागू होने वाली नहीं। सीधी बात सीधे शब्दों मेँ कि उसका मिलना ना मिलना देश हित मेँ कोई महत्व नहीं रखता।

अब मीडिया जिस  कदर उसके पीछे दीवाना हुआ है, उससे ऐसा लगने लगा है कि कहीं उससे संबन्धित खबरों की बाढ़ किसी का कोई छिपा एजेंडा तो नहीं! जनता को फुसलाए रहो हनीप्रीत के नाम से। बहलाते रहो उसके सच्चे झूठे किस्सों से। ताकि कोई और बात ही ना करे। क्योंकि जब जनता को  हर चैनल पर, अखबार मेँ हनीप्रीत ही दिखाई जाएगी तो और कुछ याद भी कैसे आएगा। चर्चा उसी की होनी है। एक सवाल जो सबसे बड़ा है, वो ये कि कोर्ट ने जब बाबा को दोषी करार दिया तब खुद सरकार हनीप्रीत को हेलिकॉप्टर मेँ लेकर गई, बाबा के साथ। सब जानते हैं,  हेलिकॉप्टर वहां तक गया, जहां कोई प्राइवेट गाड़ी जा नहीं सकती थी। उसे जेल मेँ तो रखा नहीं गया तो फिर वहां से हनीप्रीत गई कहाँ? अकेले अपने दम तो कहीं जा नहीं सकती थी। क्योंकि सुरक्षा व्यवस्था ही ऐसी थी कि मीडिया तक को जेल के पास तक नहीं फटकने दिया गया था।

जब कोई जेल के आस पास जा ही नहीं सका  तो ऐसे मेँ हनीप्रीत को उसका साथी तो कहीं ले जा नहीं सकता था। सवाल ये कि वहां से वो  गई कहां! इसका जवाब सरकार दे या वे अधिकारी, जो उसे बाबा के साथ लेकर गए। क्योंकि जहां हनीप्रीत गई थी वहां सरकारी इजाजत के बिना परिंदा भी नहीं आ सकता था। इसका अर्थ ये कि या वो सरकार के पास है, मतलब किसी सरकारी एजेंसी के पास। या फिर उसे किसी सरकारी माध्यम से कहीं भेजा गया। या प्राइवेट गाड़ी द्वारा  सरकारी संरक्षण मेँ! फिर उसे यहां वहां खोजने का नाटक क्यों? कभी नेपाल मेँ दिखने और कभी गुरुसर मोड़िया मेँ खोजने की कहानी क्यों! लेकिन आज तक मीडिया ने कभी किसी से ये सवाल किया ही नहीं। जो हर रोज सीरियल की तरह हनीप्रीत को दिखा और उसके बारे मेँ बता रहे हैं, वे इतने भोले, नादां तो नहीं हो सकते कि उनको इस बात का इल्म ही ना हो कि हनीप्रीत सुनारिया पहुँचने के बाद गायब हुई है। उसके बाद की उसकी कोई लोकेशन नहीं है।

जब अंतिम बार वह सरकार के अधिकारियों के साथ थी तो फिर वो गई कहां? इसका  जवाब केवल और केवल सरकार के पास ही होना चाहिए। उसी से इस बाबत पूछा भी जाना चाहिए। और मीडिया उसे बता रहा है नेपाल मेँ। क्या इससे ऐसा नहीं लगता कि  कुछ तो है जिसे छिपाया जा रहा है। कहीं तो पर्दा है, जिसे उठने नहीं दिया जा रहा। सवाल केवल यही नहीं और भी है। सवाल ये भी छोटा नहीं है कि लीव इन रिलेशनशिप के दौर मेँ किसी को किसी के आपसी रिश्ते से एतराज क्यों? बाबा जाने या हनीप्रीत कि उनमें क्या संबंध हैं!

हनीप्रीत को कोई एतराज नहीं तो फिर आप और हम कौन? नैतिकता! नैतिकता किसे कहते हैं? ये कहाँ रहती है और किस प्रकार की है।  कोई बता सकता है! नहीं बता सकता। क्योंकि नैतिकता नाम की आइटम  अब लुप्त हो चुकी है। चलो मान लिया नैतिकता है। है   तो उसका थोड़ा बहुत अंश मीडिया मेँ दिखाई क्यों नहीं दे रहा! क्या मीडिया की नैतिकता नहीं होती! क्या मीडिया नैतिकता से परे है! या फिर हनीप्रीत ने इसको समाप्त कर दिया है। कितनी हैरानी की बात है कि एक माह से मीडिया का नेशनल इश्यू केवल और केवल हनीप्रीत है। इसके लिए सब खत्म। खबरें भी और नैतिकता भी।  साथ वे सवाल भी, जो किए जाने चाहिए! सरकार से पूछे जाने चाहिए। दो लाइन पढ़ो-

सवाल मेरे पास रह गए, जवाब सारे तू ले गया
तेरा इक इश्क मुझे, हाय!  कैसे कैसे दर्द दे गया।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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