ओम थानवी-
प्रसंगवश बताना मुनासिब होगा कि यह नियुक्ति मेरे कार्यकाल में नहीं हुई। हमारा विश्वविद्यालय नया था, मैं पहला कुलपति था और ये सज्जन राजस्थान विवि से आए थे। मैंने उनकी नियुक्ति पर मिली शिकायत की जाँच करवाई थी।
हालाँकि मुझे विवि छोड़े अब तीन साल होने को आए। क्योंकि तथ्यान्वेषी समिति (FFC) की रिपोर्ट पर वकील की राय जिस समय आई, मुझे उसी सप्ताह कार्यभार छोड़ना था। जाते दौर में बड़े निर्णय न करने का क़ायदा है, इसलिए कार्रवाई की अपनी अनुशंसा मैं लिख आया था।
आरोप सामने आने पर मैंने पहले विवि के भीतर जाँच करवाई, फिर बाहर के विश्वविद्यालयों के तीन प्रोफ़ेसरों की एफ़एफ़सी से। डॉ देवस्वरूप के कार्यकाल में प्रबंध बोर्ड (अन्यत्र सिंडिकेट) की उप-समिति ने जाँच की और आरोपी शिक्षक को अपना पक्ष रखने का फिर से मौक़ा दिया। सब समितियों ने आरोपों को सत्य पाया।
उसके बाद में पता नहीं क्यों विवि ने जाँच की अपनी ही प्रक्रिया पर राज्य सरकार से क़ानूनी सलाह माँगी। विवि स्वायत्त संस्थान होता है। प्रबंध बोर्ड/सिंडिकेट ही उसकी सरकार है। बहरहाल, विधि विभाग ने जवाब दे दिया कि जो क़ानूनी सलाह चाही गई है, वह राज्य सरकार के विधि विभाग की नियमावली में नहीं आती है; विवि ने एफ़एफ़सी की रिपोर्ट प्राप्त कर ली है, तथ्यों के संबंध में विधि विभाग की किसी प्रकार की राय की आवश्यकता नहीं है, विवि द्वारा ही निर्णय लिया जाना है। इस प्रकार सरकार की ओर से भी निर्णय की हरी झंडी मिल गई।
इन तथ्यों की रोशनी में मुझे नहीं लगता कि दोषी को बचाने की कोशिश हो रही होगी। कुलपति प्रो सुधि राजीव स्वयं संजीदा प्रोफ़ेसर रही हैं, वे शिक्षा में इस तरह की साबित बेईमानी — गुमराह कर नौकरी हथियाने की घटना — के कलंक को क्यों विवि के माथे पर ढोना चाहेंगी। वे जानती हैं कि एक व्यक्ति को बचाने से विवि को बचाना बड़ी बात है। उन पर जातिवाद के कारण मामला उलझाने की चर्चाएँ भी सही नहीं जान पड़तीं।
बोर्ड ने निर्णय उन पर छोड़ा है। वे मिसाल क़ायम करेंगी, ताकि विवि की नैतिक साख बची रहे, बड़ी संख्या में विद्यार्थी पत्रकारिता में विवेक, नैतिकता और ईमानदारी के निर्वाह का पाठ पढ़ने के लिए यहाँ प्रवेश लें और भविष्य में बेईमानी का ऐसा हादसा विवि के समक्ष पेश न आए।




Rudra pratap
December 15, 2024 at 11:06 pm
ये ओम थानवी महाशय खुद इस यूनिवर्सिटी में भ्रष्टाचार की नई इबारत लिख कर आए हैं। ये भी इनकी ही उपज है एक टीचर को बदनाम करने की।
इससे पहले ये एक ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष और कई पत्रकारों को बदनाम कर चुके हैं। बस खुद सबसे शरीफ हैं। और सब चोर हैं।