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आज के अखबार : हेडलाइन मैनेजमेंट का दूसरा चरण, अब ANI के सहारे, AI सम्मेलन में अव्यवस्था खबर नहीं

संजय कुमार सिंह

अमर उजाला की आज की लीड प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हवाले से है और इसके जरिए उन्होंने अपनी सरकार का प्रचार किया है। यह सरकार के बचाव या प्रधानमंत्री के प्रयास का दूसरा चरण कहा जा सकता है जो सार्वजनिक सभा, प्रेस कांफ्रेंस या उद्घाटन भाषण से अलग है और राहुल गांधी के सवालों का जवाब नहीं दे पाने की कमजोरी को छिपाने के लिए किया जाता लग रहा है। इससे पहले, 15 फरवरी को प्रधानमंत्री ने प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया से (लगभग) पहली बार एक्सक्लूसिव बात की थी और जो कहा था वह पहले पन्ने पर खूब छपा था। वह एआई इंपैक्ट सम्मेलन का पहला दिन था। आज दूसरे दिन की खबर छपी है और कल यानी 17 फरवरी को प्रधानमंत्री ने एएनआई से बात की। पीएम मोदी ने एएनआई को दिए साक्षात्कार में कहा, आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एआई के इस्तेमाल के लिए हमारा दृष्टिकोण तीन स्तंभों पर टिका हुआ है। ….. हर भारतीय एआई को अवसर उपलब्ध कराने वाला, क्षमता कई गुना बढ़ाने वाला और मानवीय गरिमा के सेवक के रूप में अनुभव करेगा, न कि आजीविका के लिए खतरे के रूप में। स्पष्ट है कि यह प्रधानमंत्री और सरकार का दृष्टिकोण है और पहले के दृष्टिकोण के बारे में हम जानते हैं। कांग्रेस के भ्रष्टाचार और ना खाउंगा ना खाने दूंगा से झोला उठाकर चल दूंगा और नोटबंदी तक सबको सुर्खियां मिलती रही हैं। देश को कोई लाभ हुआ या नहीं। अब उसकी बात भी नहीं होती। इसलिए यह साक्षात्कार हेडलाइन मैनेजमेंट से ज्यादा कुछ नहीं है। ‘दृष्टिकोण’ का प्रचार है जो जमाने से चल रहा है।

जहां तक एआई के उपयोग और लाभ की बात है, अमर उजाला में इसी पन्ने पर छपी खबर का शीर्षक है, एआईसे बन रहीं याचिकाएं, सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी नजीरों पर चिन्ता जताई और कहा (या अखबार ने लिखा है) कृत्रिम बुद्धिमत्ता ….. खतरे से कम नहीं है (एआई से तैयार) याचिकाओं में ऐसे फैसलों का हवाला दिया गया जिनका वजूद ही नहीं है। इसी खबर में आगे कहा गया है, अदालत ने स्पष्ट किया कि तकनीक अनुसंधान व केस प्रबंधन में सहायक हो सकती है, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी वकीलों और न्यायाधीशों की ही है। कहने की जरूरत नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट में अगर वकील एआई का सही इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं या गच्चा खा जा रहे हैं या पकड़े जा रहे हैं तो अभी एआई को समझने की जरूरत है। संभव है उसे कुछ ज्यादा ही समझ लिया गया हो। उल्लेखनीय है कि 29 मार्च 2024 को माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स के साथ एक बातचीत में प्रधानमंत्री  मोदी ने कहा कि भारत में कुछ भागों में लोग “मां” को “आई” कहते हैं और छोटे बच्चे अपनी मां को आई भी कहने लगे हैं (दोनों शब्द समान ध्वनि वाले हैं)। प्रधानमंत्री ने बिल गेट्स से यह बात सार्वजनिक तौर पर कही थी और इसमें कितना मजाक था, कितनी अनौपचारिकता मैं नहीं जानता लेकिन भारत में एआई का यही मतलब प्रधानमंत्री ने बिल गेट्स को बताया था। और यह उनके दृष्टिकोण का भाग तो है ही। मुझे नहीं लगता प्रधानमंत्री का ऐसा कोई दृष्टिकोण अब हेडलाइन बनने लायक है। इसलिए किसी ने बनाया भी नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री जो भी कहें, उसका अपना महत्व है और इसे समझना होगा। हालांकि, वे इसी का फायदा उठाकर पार्टी और निजी हित में हेडलाइन मैनेजमेंट करते दिख रहे हैं।

भारत में एआई के उपयोग या दुरुपयोग से संबंधित एक खबर जनसत्ता में है। इसके अनुसार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल की एक महिला पदाधिकारी ने एआई का इस्तेमाल करके बंगाल में 58 लाख मतदाताओं के नाम हटवा दिए। एआई, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चल रहे एसआईआर, विदेशी नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर करने के घोषित उद्देश्य की आड़ में चुनाव आयोग जो कर रहा है और तर्कसंगत विसंगतियों को दूर करने के लिए किए जा रहे गैर जरूरी कार्य और परेशानियों से संबंधित तमाम मुद्दों को छोड़कर प्रधानमंत्री का दृष्टिकोण या प्रचार या काम पहले पन्ने पर कैसे जगह पा रहा है समझना मुश्किल नहीं है और ऐसी ही कोशिशों तथा समर्थन के कारण प्रधानमंत्री विश्व गुरू होने का दावा कर रहे हैं। इसी तरह इस देश में बहुत कुछ बेहद प्रचारित है और हो रहा है। मुकदमों की सुनवाई की बजाय अदालतों को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनाने की दृढ़ता के साथ हिन्दुत्व से संबंधित मामलों की चिन्ता और इससे संबंधित ज्ञान गंगा का प्रवाह भी अखबारों की खबरों में दिखता रहता है। इसपर मैंने कल यहां लिखा था। देशबन्धु में आज टॉप पर छपी एक खबर के अनुसार, एआई सम्मेलन के पहले ही दिन अचानक फोटो खिंचवाने के लिए प्रधानमंत्री के सम्मेलन स्थल पर पहुंच जाने के कारण लोगों का भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। सोशल मीडिया पर और मुख्यधारा की मीडिया से अलग, इसकी खूब चर्चा है। सरकार समर्थक अखबारों से पहले पन्ने पर इस खबर की उम्मीद तो कोई नहीं करेगा लेकिन विपक्ष के नेता के आरोप को भी अखबारों ने जगह नहीं दी है। मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रचार पाने की भूख के कारण इस शिखर सम्मेलन का पूरा माहौल अराजक हो गया।

प्रचार पाने की प्रधानमंत्री की भूख पुरानी है। दूसरी ओर, एआई की बात चली तो सरकार ने इतना मसाला दिया कि अमर उजाला में पहले पन्ने पर एआई से जुड़ी तीसरी खबर है, सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि देश को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) सेक्टर में अगले दो साल में 200 अरब डॉलर का निवेश मिलने की उम्मीद है। यही नहीं, मंत्री ने कहा और अमर उजाला ने प्रमुखता से छापा है, हमारे एआई और डीपटेक इकोसिस्टम पर दुनिया भर की निगाहें हैं। एआई मिशन 2.0 का एलान भी जल्द किया जाएगा। इन खबरों के साथ आज एक खबर यह भी है और इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने पर छापा है कि, सोशल मीडिया से कंटेंट हटाने की हाल में घोषित भारत के सख्त टाइम लाइन नियमों पर चिंता जताते हुए सोशल मीडिया क्षेत्र की बड़ी कंपनी मेटा ने मंगलवार को कहा कि ऑपरेशनल नज़रिए से इन नियमों का पालन करना “चुनौतीपूर्ण” हो सकता है। यह फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप्प जैसे प्लेटफ़ॉर्म चलाती है। खबर के अनुसार, मेटा के वाइस प्रेसिडेंट पॉलिसी और डिप्टी चीफ़ प्राइवेसी ऑफ़िसर रॉब शर्मन ने यहां चल रहे इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान रिपोर्टर्स से कहा, “ऑपरेशनल तौर पर, तीन घंटे (टेकडाउन विंडो) सच में बहुत मुश्किल होने वाला है। जाहिर है, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित मामला है और अगर किसी पोस्ट या सामग्री को तीन घंटे में हटाने का नियम होगा तो जाहिर है कि उसके अनुपालन की मजबूरी में सोच-विचार करना संभव ही नहीं होगा और आदेश का पालन ही किया जा सकेगा। यहां जनरल नरवणे की किताब पर सरकारी रवैया उल्लेखनीय है। इसके बाद राहुल गांधी ने संसद में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के जरिए सरकार पर देश “बेचने” जैसा आरोप लगाया तो केंद्रीय नेताओं ने इसे ग़लत और भ्रामक तथा संसदीय विशेषाधिकार का उल्लंघन बताया है। दूसरी ओर, सरकार ने राहुल गांधी के सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया है और प्रधानमंत्री हेडलाइन मैनेजमेंट कर रहे हैं।

इसमें यह मुद्दा रह ही गया कि रक्षा मंत्री ने पूर्व सेना प्रमुख की किताब के उद्धृत अंश को संसद में पढ़ने से रोकने के लिए उसे अप्रकाशित बताया जबकि रक्षा मंत्रालय ने उस तैयार पुस्तक को प्रकाशित और बिक्री करने की अनुमति दो साल से ज्यादा समय में नहीं दी है। पुस्तक अगर प्रकाशन योग्य नहीं है या आपत्तिजनक है तो उसे प्रतिबंधित भी नहीं किया गया है। फिर भी सरकार के काम का प्रचार हो रहा है जो असल में सिर्फ प्रचार है। इसमें इस बात का भी ख्याल नहीं रखा गया कि विपक्ष के नेता और कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कल ही कहा था कि, एप्सटीन फाइल के एक मेल में एपस्टीन ने रीड हॉफमैन से कहा था कि भारत में हरदीप सिंह पुरी से मिलो, भारत में आपका आदमी है। यह शब्दशः नहीं है। उन्होंने नाम उल्टा-पुल्टा लिया लेकिन मतलब यही निकलता है। इसी क्रम में पवन खेड़ा ने एआई सम्मेलन का हवाला देते हुए कहा कि आगे पता चलेगा कि वह कैसे आयोजित हुआ और किन संबंधों के कारण इसका आयोजन संभव हुआ। इसका खुलासा समय के साथ होगा। जाहिर है, पवन खेड़ा की मानें तो ऐसे सम्मेलन दलालों के जरिए आयोजित होते हैं, दूसरों का उद्देश्य चाहे जो हो, भारत (सरकार) का उद्देश्य प्रचार होता है। ऐसे आयोजन का उपयोग, सरकारी पार्टी और नरेन्द्र मोदी के पक्ष में प्रचार के लिए होता है – यह दिख रहा है। मल्लिकार्जुन खरगे ने आरोप लगाया है, खबर भी है लेकिन सब जगह नहीं। पहले पन्ने पर नहीं। जाहिर है, मीडिया सरकार का प्रचार तो कर रहा है विपक्ष के आरोपों को महत्व नहीं दे रहा है और यही हेडलाइन मैनेजमेंट है।

यह तो हुई अमर उजाला की लीड और उससे संबंधित कहानी। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार के प्रचार की बात हो तो अमर उजाला दूसरे अखबारों के मुकाबले छोटा या बड़ा प्रचारक हो सकता है लेकिन उसकी कहानी अलग होगी और वह अलग मुद्दा है। अब मैं बताऊं कि आज ज्यादातर अखबारों की लीड मुंबई में हुई भारत-फ्रांस संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस की है। जनसत्ता ने इसे, वैश्विक उथल-पुथल से निपटने के लिए मोदी-मौक्रों की पहल कहा है और मोदी जो कह रहे हैं उसे कंप्रोमाइज्ड होने के राहुल गांधी के आरोप, एपस्टीन जैसे अपराधी से हरदीप पुरी की मुलाकात को पेशेवर दलाल से मिलने का रंग देने की कोशिशों के आलोक में देखा जाना चाहिए और कल पवन खेड़ा ने जो आरोप लगाए, सवाल पूछे उसके आलोक में देखा जाना चाहिए। लेकिन इन बातों का हवाला नहीं के बराबर है, कम से कम पहले पन्ने पर। खबर के अनुसार, दोनों पक्षों ने महत्त्वपूर्ण खनिजों, रक्षा, उच्च प्रौद्योगिकी, अक्षय ऊर्जा और स्वास्थ्य सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए कुल 21 समझौतों और दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। इन समझौतों में रक्षा सहयोग पर एक समझौता तथा भारत में ‘हैमर’ मिसाइलों के उत्पादन के लिए भारत इलेक्ट्रानिक्स लिमिटेड (बीईएल) और फ्रांसीसी रक्षा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी सैफरान के बीच संयुक्त उद्यम पर समझौता शामिल है। भारतीय सेना और फ्रांसीसी थलसेना में अधिकारियों की पारस्परिक तैनाती के लिए एक अलग समझौता भी किया गया। आज हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, दि एशियन एज के साथ नवोदय टाइम्स और देशबन्धु की लीड यही है। आप जानते हैं कि हाल में भारत ने ईयू के साथ वर्षों से रुके करार की घोषणा की थी। उसके तुरंत बाद अमेरिका से करार की घोषणा की गई और अब फ्रांस के साथ। दस साल सरकार चलाने के बाद ताबड़-तोड़ हो रही ये घोषणाएं और कंप्रोमाइज्ड होने का आरोप बहुत गंभीर मुद्दा है लेकिन रिपोर्टिंग वैसी नहीं है या कहिए तो प्रचार ही है। नवोदय टाइम्स ने एआई सम्मेलन और फ्रांस के साथ करार को समान महत्व दिया है, अमर उजाला ने एआई सम्मेलन को दिया है जबकि बाकी के कई अखबारों ने फ्रांस के साथ करार को। द हिन्दू और द टेलीग्राफ की लीड अलग है। द हिन्दू में फ्रांस के साथ करार की खबर तो पहले पन्ने पर है लेकिन एआई सम्मेलन की खबर नहीं है। टेलीग्राफ में भी यही स्थिति है। फ्रांस के साथ करार तो है लेकिन एआई सम्मेलन नहीं है। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, राजनीतिक नेताओं और अधिकारियों को भाईचारा बढ़ाना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट। देशबन्धु ने लिखा है, नेताओं के भाषणों पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी नसीहत। खबर इस प्रकार है, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा के कथित हेट स्पीच के संदर्भ में दायर याचिका पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि देश में माहौल जहरीला होता जा रहा है। सिब्बल ने दलील दी कि किसी एक नेता के खिलाफ राहत नहीं मांगी जा रही है, बल्कि भाषणों में जवाबदेही तय करने के लिए गाइडलाइन बनाने का अनुरोध किया गया है। कपिल सिब्बल ने चुनाव आचार संहिता का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान आचार संहिता लागू होती है, लेकिन उससे पहले दिए गए भाषण सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते हैं। उन्होंने पूछा कि ऐसे मामलों में मीडिया की क्या जिम्मेदारी है ताकि लोकतांत्रिक माहौल खराब न हो। जस्टिस बागची ने कहा कि कोर्ट केवल आदेश पारित कर सकता है, लेकिन उन्हें लागू करना एक चुनौती है। भाजपाई मुख्यमंत्री के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख रेखांकित करने लायक है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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