समरेंद्र सिंह-
हिंदी के कुएं में लहर खूब उठती है और क्रांतिकारी मेंढक टर्र टर्र भी बहुत तेज करते हैं… दो दिन पहले मैंने आपसे कविता, कहानी और उपन्यास को छोड़ कर हिंदी में मौलिक किताबों का सुझाव मांगा था। उस पोस्ट को दो-चार सुधीजनों ने लाइक किया। लेकिन कमेंट एक भी नहीं आया। लगा कि मैंने पूछ कर गुनाह कर दिया है!

गूगल पर अंग्रेजी में पूछिए कि इकोलोजी की बेस्ट बुक कौन-कौन सी हैं। एक सूची निकल आएगी। देश दुनिया की राजनीति पर पूछिए एक शानदार सूची निकलेगी। मनोविज्ञान, भू-विज्ञान, पर्यावरण, क्लाइमेंट चेंज – आप कोई भी विषय डालिए, आपको बेहतरीन किताबों की सूची मिलेगी। बेस्ट बुक के आगे हिंदी जोड़ दीजिए आपको प्रतियोगिता दर्पण जैसी किताबें मिलेंगी।
हिंदी किताबें पढ़ कर कोई चपरासी, क्लर्क, बाबू, हवलदार और अधिक से अधिक मास्टर बन सकता है। उससे आगे जाने के लिए उसे भाषा की दहलीज पार करनी पड़ती है। दुनिया में इतने बदलाव हो रहे हैं कि संवेदनाएं भी बदल रही हैं। लेकिन हमारी हिंदी का हाल बद से बद्तर हो रहा है। हिंदी किताबें पढ़ कर किसी का कोई बौद्धिक विकास नहीं होता। वो ठस बुद्धि का बनता है। हमारे ज्यादातर बुद्धिजीवी भी ठस, जाहिल, जातिवादी, मर्दवादी, सामंती और परवर्ट हैं। (आप अपने को इनसे अलग रखें। आप संवेदनशील इंसान हैं।)
तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और बांग्ला का क्या हाल है मैं नहीं जानता। लेकिन ये हिंदी का सच है।
लेकिन हिंदी वालों में एक खास बात है। इनके कुएं में लहर खूब उठती है। समंदर से ज्यादा लहर उठती है। और इस कुएं के मेंढक टर्र-टर्र बहुत करते हैं। बहुत क्रांतिकारी मेंढक हैं। उछल उछल कर आवाज निकालते हैं। कोई उलट-पुलट कर टर्रटराता है। कोई लहरों पर लहराते हुए टर्रटराता है।
इतना शोर होता है कि आपको लगेगा कि कान के पर्दे फट जाएंगे।
कुछ दिन से दो टके के एक कवि की ओछी हरकत पर हिंदी के कुएं में तूफान आ गया था। एक पीड़ित महिला ने अपने कुछ करीबियों से उस दो टकिए कवि की ओछी हरकत पर चर्चा की। उनमें से दो-तीन टर्रटराने लगे। फिर कंपटीशन शुरू हो गया। छोटे-मोटे, जवान-बूढ़े सारे मेंढक मैदान में कूद पड़े। कुछ मेंढक उस लफंगे कवि के बचाव में उतर आए। लफंगे कवि का हौसला बढ़ा, उसने नोटिस भेजना भी शुरू कर दिया। जड़ियल मेंढक है, मोटी खाल है। वो महिला जो सामने नहीं आना चाहती थी, उसे सामने आना पड़ा।
वैसे तो वास्तविक मेंढक लड़ते नहीं हैं। लेकिन हिंदी के कुएं वाले मेंढक लड़ते खूब हैं। खासकर जब महिलाओं से जुड़ा मसला हो तो उछल-उछल कर लड़ते हैं। ये जातिवादी, क्षेत्रवादी, इधर वादी, उधर वादी – सारे तरह के वादी परवर्ट करतब दिखा कर लड़ते हैं।
नतीजा ये रहा कि मामला पीड़ित और आरोपी तक सीमित नहीं रहा। आगे बढ़ा है। हिंदी के क्रांतिकारी मेंढकों की तलवार एक दूसरे कुजात मगर लोकप्रिय और मोटे मेंढक की ओर मुड़ गई। नैतिक पाखंड से ओत-प्रोत एक जातिवादी, परवर्ट मेंढक ने लोकप्रिय और मोटे मेंढक के बहिष्कार की चुनौती धर दी। कई पाखंडी ताल ठोंकने लगे। कुएं में एक नया बवंडर लाने की कोशिश होने लगी है।
कमाल है! नैतिकता का इतना पाखंड! इतना करतब! इन मेंढकों का भविष्य उज्जल है! हिंदी के कुएं में लाल पताका एक न एक दिन जरूर लहराएगी! तब ऐसे सूरमाओं से हिंदी धन्य होगी! अब भी धन्य ही है!
मेरी हिंदी, तेरी हिंदी, जय हिंदी, तय हिंदी, वाह हिंदी, आह हिंदी!




Arvind
July 3, 2025 at 12:11 pm
यार भाई मैने पूरा लेख पढ़ा, किसको क्या कह रहे हो कुछ पता नहीं लगा। मीडिया में इतना टर् -2 करने से अच्छा था, उस आदमी के सामने जाते और सब कुछ बोल देतेl फिर मीडिया में बताते कि मैं यह महान काम किया हैl