उमेश चतुर्वेदी-
दो दिन पहले की बात है.. रात करीब सवा दस बजे एक अनजान नंबर से कॉल आया.. उस ह्वाट्सअप ऑडियो कॉल को उठा लिया..
उधर से आवाज आई, उमेश बोल रहे हो..
जी, मेरा जवाब था..
आप लिखते हो…
मैं फलां…संस्थान से फलां बोल रहा हूं..
दोबारा मेरा जवाब वही था, जी..
अपने लेख भेज दिया करो…हमारे यहां छप जाएंगे..
लगा भाई मुझ पर अहसान कर रहा है…
फोन करने वाले ने अपना नाम भी बताया था.. जानबूझकर नहीं लिख रहा..
आवाज से लगा कि वह अभी पत्रकारिता संस्थान से निकला जेन जी का ही कोई सदस्य है..
आम तौर पर ऐसी भाषा मुझे चिढ़ा देती है.. मैं ब्लास्ट कर जाता हूं.. लेकिन पता नहीं क्यों.. तब गुस्सा नहीं आया..
आप पेमेंट करते हैं.. मैंने उसके प्रस्ताव के बाद पूछ लिया..
नहीं.. हम छाप देते हैं.. यही क्या कम है.. वैसे बाद में देखेंगे और पैसे देने की सोचेंगे..
मेरा पारा चढ़ते-चढ़ते रूक गया..
भाई जब पैसे देने लगना, तब फोन करना.. मैं फ्री में अपवादों को छोड़ नहीं लिखता..
वैसे जिस संस्थान से फोन आया था, वहां मैं भी काम कर चुका हूं.. तो मैंने लगे हाथ उसे बता भी दिया…कि बेटे जब तुम शायद स्कूल में भी नहीं रहे होगे.. तब वहां काम कर चुका हूँ.
इस वार्तालाप से दो बातें उजागर हुईं..
पहला यह कि मीडिया संस्थानों और उनके संपादकीय कर्ता-धर्ताओं को अब लगता है कि हिंदी में लेखक – स्तंभकार पलिहर का वानर है..खलिहर है..छपने को लालायित जीव है..तो उसे छाप दो और छापकर अहसान कर दो…तृप्त और कृतकृत्य रहेगा…
दूसरा यह कि जिसे हम जेन जी कहते हैं, उसने अपनी नैतिकता, लिहाज, संस्कार को घोलकर पी लिया है..उसे ना तो उम्र का लिहाज है..न ही सामने वाली शख्सियत की परवाह है..उसे संस्कारों से भी कुछ लेना-देना नहीं है…
मुझे अपनी साढ़े तीन दशक पुरानी पत्रकारिता की पढ़ाई का काल याद आ गया, तब मोटे तौर पर हम हिंदी ही नहीं, अंग्रेजी के भी प्रमुख पत्रकारों और लिक्खाड़ों को जानते थे..अगर नहीं जानते होते तो शायद भारतीय जनसंचार संस्थान के इंटरव्यू में ही छंट जाते..
आज की तरह नहीं था कि एनटीए की परीक्षा में टिक लगाओ…कुछ नंबर जुटाओ और भारतीय जनसंचार संस्थान में दाखिला पा लो..तब इंटरव्यू बोर्ड के सामने खुद को साबित करना होता था. इसीलिए हमारे बैच में शायद ही कोई था, जिसे लिखना-पढ़ना नहीं आता था, जिसे पत्रकारिता, राजनीति, अर्थनीति की बुनियादी जानकारी नहीं थी..जिसे साहित्य में दिलचस्पी नहीं थी..जो तमीजदार नहीं था..
हमारी पीढ़ी के लोग आज भी अपने गुरूओं, अपने वरिष्ठों के सामने विनम्र भाव से खड़े होने में ही अपनी गरिमा समझते हैं.
आजकल स्तंभकारों के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर राजनीति और प्रचार तंत्र भी खड़ा हो गया है..हर दिन नामी हस्तियां लेख लिख रही हैं..या उनके प्रचार तंत्र लेख लिख रहे हैं..ऐसे में पहले से ही पारिश्रमिक का रोना रो रहे स्तंभकारों के सामने संकट और बढ़ गया है..
संस्थानों का क्या है, वे हर मद में खर्च कर देंगे..
उनकी नजर में लेखक तो वैसे ही खलिहर है..उसका पेट भी नहीं होता..उसे भूख नहीं लगती..उसके बच्चे फ्री में पढ़ते हैं..
संस्थानों को शायद ऐसा ही लगता है….इसलिए उसे पैसे क्या देना…
वैसे संस्थानों का भी दोष नहीं है..जब राजनीति ही रोजाना लेख लिखने लगेगी..वह फ्री में उसे मुहैया भी कराएगी तो भला कोई संस्थान किसी स्तंभकार को क्यों छापे और छापने के बाद अहसान क्यों न जताए..
मित्रों..सोचिएगा इस पर..




केएस नंदू
May 29, 2026 at 5:21 pm
इस बहाने कुछ अच्छा पढ़ने को मिला।