संजय कुमार सिंह
आज टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिन्दू और द टेलीग्राफ को छोड़कर मेरे सभी अखबारों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर हमला पहले पन्ने पर है। सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स ने शीर्षक से बताया है कि प्रधानमंत्री ने असल में क्या किया बाकी उनका प्रचार कर रहे हैं। कल इंदिरा गांधी की शहादत का दिन था और अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, “पटेल चाहते थे पूरा कश्मीर हमारा हो, नेहरू ने होने नहीं दिया : मोदी”। जाहिर है, मोदी इंदिरा गांधी को भूल गए पर जिसे याद है वो जानता है कि इंदिरा गांधी की शहादत नहीं हुई होती, खालिस्तान के मामले से ठीक से नहीं निपटा गया होता तो आज पंजाब की कहानी अलग हो सकती थी। 1971 में वे बांग्लादेश बनवा चुकी थीं पर भाजपा के लिए अब यह सब मुद्दा नहीं है। मोदी राज में भारत ने कश्मीर के मामले में क्या किया और कनाडा से कैसे भिड़ गए और ना कोई घुसा है ना घुसा हुआ है जैसा क्या सब हुआ, सबको पता है। वैसे भी, कश्मीर हमारा नहीं हुआ तो बाद में हमने क्या किया और मोदी जी ग्यारह साल क्या करते रहे यह भी बताना था और नहीं बताए तो खबर छापने या लीड बनाने से पहले पूछा जाना चाहिए था और पाठकों को बताया जाना चाहिए। खासकर इसलिए भी कि बहुचर्चित अनुच्छेद 370 को हटाने का क्या लाभ हुआ और पटेल अगर इतनी आसानी से पूरे कश्मीर को हमारा बना सकते थे, तो अब तक क्या दिक्कतें रहीं। मोदी जी ने क्या प्रयास किए आदि। पर खबरों में यह सब नहीं है। ढेरों अखबारों में पहले पन्ने पर है क्योंकि बिहार में चुनाव है, मोदी का प्रचार करना है और कल ही जारी घोषणा या संकल्प पत्र में ऐसा कुछ नहीं है कि अमर उजाला इसे पहले पन्ने पर रखता।
बिहार में भाजपा और नीतिश कुमार की राजनीति में सब ठीक नहीं लग रहा है। अखबारों की खबरों में पक्षपात और पूर्वग्रह साफ है। ऐसे में बिहार की खबरों का महत्व है क्योंकि केंद्र की सरकार नीतिश की पार्टी की बैसाखियों पर भी टिकी है। राज्य विधानसभा चुनाव में अगर कुछ गड़बड़ हुई और वोट चोरी के आरोप में अगर नीतिश ने भाजपा को तेजस्वी बनाकर इस बार फिर यू टर्न मारी तो भाजपा और देश की राजनीति बदल सकती है। लेकिन मुख्यधारा की मीडिया में ऐसी खबरें नहीं हैं। पहले पन्ने की ज्यादातर खबरें नरेन्द्र मोदी की सरकार के प्रचार और जरूरत वाली होती हैं। विरोध या विपक्ष को जगह नहीं मिलती है। जाहिर है, नरेन्द्र मोदी अभी भी कांग्रेस विरोध की राजनीति पर चल रहे हैं। वे अपनी और अपने लोगों की योग्यता बताने की बजाय राहुल गांधी को पप्पू साबित करने में लगे हैं और करोड़ों फूंक कर भी कामयाबी नहीं मिली तब भी हार नहीं मान रहे हैं। हालत यह हो गई है कि राहुल गांधी भी खुल कर जवाब देने लगे हैं। इससे भाजपा का तिलमिलाना स्वाभाविक है और चुनाव आयोग से शिकायत करने का बचपना भी। दूसरी ओऱ, राहुल गांधी ने छठ पर कुछ कहा नहीं लेकिन भाजपा की ट्रोल सेना उनपर छट के अपमान का आरोप लगा रही है। यह सब शुरू में तो नजरअंदाज किया जा सकता था और नवसिखुआ राजनीति का भाग माना जा सकता था लेकिन अब ऐसा नहीं है। अभी भी यह सब करना बता रहा है कि भाजपा के पास कुछ नया नहीं है। रणनीति वही घिसी-पिटी है। नेहरू अच्छे हों या बुरे राहुल गांधी वैसे ही क्यों होंगे जब नरेन्द्र मोदी वाजपेयी और आडवाणी जैसे नहीं हैं। उसी विचारधारा और राजनीति को आगे बढ़ाते हुए मोदी जो कर रहे हैं वह भी तो सबको दिख रहा है। ऐसे में भाजपा के पास वोट मांगने के लिए अपना कुछ नहीं है। ढंग का घोषणापत्र भी नहीं और आज खबर यह भी हो सकती थी।
भाजपा का संकल्प पत्र जो हर तरह से औपचारिकता लग रहा है, टाइम्स ऑफ इंडिया और दि एशियन एज में लीड है, हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर द हिन्दू में सेकेंड लीड है। कुल मिलाकर, किसी ने भाजपा के चुनाव घोषणा पत्र को महत्व दिया है किसी ने नेहरू पर मोदी के आरोप को। दोनों में कुछ है नहीं और केरल की खबर – अगर दावा सही है तब और नहीं है तब भी जरूर होनी चाहिए थी लेकिन वह नहीं है। ऐसा नहीं है कि दिल्ली में केरल की खबर को महत्व नहीं मिला – सच्चाई यह है कि भाजपा सरकार के मतलब की हो, उसकी राजनीति के अनुकूल हो तो करुर की रैली में भगदड़ की खबर दिल्ली में छपती रही। उसकी जांच के अदालती आदेश दिए गए लेकिन एक बाबा के चरण रज लेकर जाने की घोषणा के बाद भगदड़ मचने, उत्तर प्रदेश में ज्यादा लोगों की मौत की खबर दिल्ली के अखबारों में कम छपी। यही आजकल की पत्रकारिता है और रोज स्पष्ट दिखती है। सच्चाई यह है कि प्रधानमंत्री बिहार में लालू के जंगल राज की याद दिला रहे हैं और बिहार में हत्या आम है। अमृतकाल में भी होते रहे हैं और दिल्ली कोई अछूती नहीं है। आज नवोदय टाइम्स में टॉप की खबर का शीर्षक है, “गैंगवार : गोलियां माकर बदमाश की हत्या” और मोदी है तो मुमकिन है का हाल यह है कि दिल्ली के किसी और अखबार ने इसे इतनी प्रमुखता नहीं दी है।
आज जब इस पुरानी खबर या खुलासे को कई अखबारों ने पहले पन्ने पर छापा है तब अखबारों में केरल सरकार का विज्ञापन है जो बताता है कि केरल बेहद (एक्सट्रीम) गरीबी से मुक्त हो गया है। भारत के विकास की कहानी का नेतृत्व कर रहा है। विज्ञापन में दावा किया गया है कि अपने 69 वें स्थापना दिवस पर केरल ने जो हासिल किया है वह देश के किसी अन्य राज्य को हासिल नहीं हुआ है। राज्य में हरेक नागरिक के लिए सम्मान, मौका और उम्मीद सुनिश्चित की जाती है। आप जानते हैं कि शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रतिव्यक्ति आय के मामले में केरल सबसे आगे रहने वाले राज्यों में है और बिहार सबसे पीछे। अब जब बिहार में चुनाव चल रहे हैं, भाजपा भी चुनाव लड़ रही है और केंद्र सरकार की बैसाखियों में एक बिहार की नीतिश कुमार के नेतृत्व वाली पार्टी भी है तो बिहार चुनाव का महत्व समझा जा सकता है। उसमें खबरें हैं कि नीतिश भाजपा या प्रधानमंत्री की पार्टी से नाराज चल रहे हैं। राजग ने सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले चिराग पासवान को विधानसभा चुनाव में भी ज्यादा सीटें दी हैं और इस तरह बिहार में खास राजनीति चल रही है। दैनिक जागरण की खबर के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्ष, यूडीएफ ने राज्य सरकार के दावे को “पूरी तरह से धोखाधड़ी” बताया और विरोध में सत्र का बहिष्कार किया। जैसे ही विशेष विधानसभा सत्र शुरू हुआ विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने कहा कि रूल 300 के जरिए मुख्यमंत्री का बयान “पूरी तरह से धोखाधड़ी” और हाउस के नियमों की “अवमानना” थी। मैं नहीं जानता वास्तविकता क्या है – पर खबर तो है ही और पटेल व नेहरू के जमाने की खबर अथवा खुलासे से महत्वपूर्ण भी है लेकिन इसे पहले पन्ने पर जगह नहीं मिली है। पहले पन्ने पर केंद्र सरकार का प्रचार है।
वह भी तब जब देशबन्धु की लीड कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की मांग है। शीर्षक है, आरएसएस पर फिर लगे प्रतिबंध। उपशीर्षक है, देश में भाजपा-आरएसएस के कारण कानून व्यवस्था की दिक्कतें हो रही हैं। यही नहीं, खरगे ने यह भी कहा है कि जिन लोगों ने गांधी जी की हत्या की आज उसी विचारधारा के लोग कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी सरदार पटेल को याद नहीं करती है। कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री पर पलटवार किया। खबर के हाईलाइट किए हुए अंश यहां पेश कर रहा हूं क्योंकि अमर उजाला ने अगर नेहरू पर प्रधानमंत्री के आरोप को अब लीड बनाना तय किया है तो खरगे या कांग्रेस का पक्ष भी छापना चाहिए था। आप जानते हैं कि सरदार पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया था। खरगे ने कहा है कि मोदी और शाह भी पटेल की तरह ऐसा करके दिखाएं। यही नहीं, खरगे ने यह भी कहा कि भाजपा ने नेहरू-पटेल में दरार पैदा करने की कोशिश की है। कल मैंने लिखा था कि बांटो और राज करने में विश्वास करने वाले एकता दिवस मना रहे हैं। खरगे ने भी लगभग ऐसा ही कहा है। दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खरगे ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। खरगे ने कहा कि ये मेरा विचार है और कि ये मेरा विचार है और मैं खुलकर बोलूंगा कि आरएसएस पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह सरदार वल्लभ भाई पटेल के विचारों का सम्मान करते हैं तो ऐसा करें। नवोदय टाइम्स में यह खबर फोटो के साथ है।
इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर अमर उजाला वाले शीर्षक के साथ तीन कॉलम में है और इसके बीच में बताया गया है कि खरगे ने आरएसएस पर प्रतिबंध की मांग की। इस तरह खरगे का पक्ष भले मूल आरोप के साथ बराबरी में नहीं है और अंदर होने की सूचना है लेकिन अमर उजाला में पत्रकारिता के इस सामान्य व्यवहार का भी पालन नहीं किया गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर लीड है। सरकार का प्रचार भर नहीं करती है फिर भी मूल खबर के साथ कांग्रेस का पक्ष है जो हिन्दी के मेरे तीन में से दो अखबारों में नहीं है। देशबन्धु ने कांग्रेस अध्यक्ष की नई मांग को लीड बनाया है लेकिन प्रधानमंत्री की पुरानी घोषणा और खबर को भी पहले पन्ने पर जगह दी है क्योंकि प्रधानमंत्री के कह देने भर से पुरानी सूचना या विचार को भी खबर बनाने का रिवाज रहा है। ऐसे में बिहार चुनाव की विस्तृत खबर द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है। आज द टेलीग्राफ में बिहार चुनाव की खबरों का मुख्य शीर्षक है, नीतीश: अंत या नई उड़ान? खबर का फ्लैग शीर्षक है, शाह एंड कंपनी द्वारा ‘हाशिए पर’ किए गए नेता के प्रति बढ़ती सहानुभूति के साथ मुख्यमंत्री का मुख्य आधार एकजुट हो रहा है। एक और खबर का शीर्षक है, क्या भाजपा ने उन्हें चुप कर दिया है? सिर्फ समय बताएगा। इससे आप समझ सकते हैं कि मामला बहुत आसान नहीं है और ऐसा तो बिल्कुल नहीं जिसे रिपोर्ट नहीं किया जाए। फिर भी यही हो रही है। देखा जाए, आगे क्या होता है, ऊंट किस करवट बैठता है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


