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इस तरह के एड बिहार कब देगा?

अभिषेक पाराशर-

इसे बोलते हैं टाइमिंग के साथ एक्जिक्यूशन. कल सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार को राज्यपाल के साथ कानूनी लड़ाई में बड़ी जीत मिली और आज खबर के साथ तमिलनाडु सरकार का यह विज्ञापन.

अगर राज्यपाल वाले मामले को हटा भी दें तो एक बिहारवासी होने के नाते मेरा यह सवाल है कि इस तरह के एड बिहार कब देगा?

फिर जवाब मिलता है कि ऐसा कभी नहीं होगा क्योंकि बिहार में गोपाल मंडल जैसा फालतू का नेता है. वह जाति के गणित को सुलझाने में लगा हुआ है. उसे फुर्सत कहां है, बिहार को इस तरह आगे ले जाने में. बिहार में लांडे जैसा अधिकारी हीरो बना हुआ है. वह अपनी पार्टी बना रहा है क्योंकि उसे पता है कि उसे वहां नायक की तरह पूजा जाएगा.

ब्यूरोक्रेसी सड़ी हुई है क्योंकि उसे पता है कि विधायिका गई गुजरी है. बिहार अभिशप्त है पिछड़ा होने के लिए, क्योंकि वहां के नेताओं का कोई विजन नहीं है. वह छठ या होली पर मजदूरों के लिए ट्रेन तक नहीं चलवा पाते…विकास बहुत दूर की बात है. इस तरह के विज्ञापन हमें चिढ़ाते हैं, क्योंकि हमें पता है कि श्री बाबू के बाद बिहार में हर तरह का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलाव थम गया है.

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