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भारतीय मीडिया उद्योग: जिनपर निगरानी रखनी थी उसके ही हाथों की कठपुतली बन गया!

2024 की FICCI-EY रिपोर्ट के अनुसार भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है….

मनोज अभिज्ञान-

मीडिया को लंबे समय तक लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया। माना गया कि वह सत्ता से प्रश्न करेगा, जनता की आवाज़ बनेगा और समाज को सूचित रखेगा। लेकिन पिछले तीन दशकों में भारतीय मीडिया की संरचना में ऐसा परिवर्तन हुआ है जिसने इस आदर्श को गहराई से प्रभावित किया है। आज देश का मीडिया क्षेत्र कुछ सीमित कॉरपोरेट समूहों के हाथों में केंद्रित होता जा रहा है। परिणाम यह हुआ कि सार्वजनिक विमर्श का दायरा सिकुड़ रहा है, जनता के वास्तविक प्रश्न पीछे जा रहे हैं और चौथा स्तंभ धीरे-धीरे सरकारी विज्ञप्ति में बदलता जा रहा है।

भारत में मीडिया उद्योग विशाल व्यावसायिक उद्योग बन चुका है। 2024 की FICCI-EY रिपोर्ट के अनुसार भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग का आकार लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। इतनी बड़ी आर्थिक संरचना स्वाभाविक रूप से बड़े निवेशकों और उद्योग समूहों को आकर्षित करती है। समस्या तब पैदा होती है जब सूचना का माध्यम भी उसी आर्थिक शक्ति के अधीन हो जाए जिसके ऊपर उसे निगरानी रखनी चाहिए।

आज टीवी समाचार, डिजिटल प्लेटफॉर्म, अखबार, रेडियो, फिल्म और इंटरनेट वितरण तक में कुछ बड़े समूहों का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। Reliance Industries के नेटवर्क18 समूह के अंतर्गत News18, CNBC-TV18, CNN-News18 जैसे अनेक चैनल आते हैं। Adani Group ने NDTV में बड़ी हिस्सेदारी हासिल की। बड़े अखबार समूह पहले से ही विज्ञापन आधारित मॉडल पर निर्भर हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर पत्रकार नियंत्रित है, लेकिन संस्थागत स्तर पर मीडिया की आर्थिक निर्भरता उसकी संपादकीय स्वतंत्रता को प्रभावित करती है।

भारत में मीडिया का सबसे बड़ा वित्तीय स्रोत अब पाठक नहीं बल्कि विज्ञापन है। कई बड़े अखबार अपनी आय का 70% से 90% तक विज्ञापनों से प्राप्त करते हैं। विज्ञापन देने वाले प्रमुख स्रोत बड़े कॉरपोरेट समूह, रियल एस्टेट कंपनियाँ, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और सरकारें हैं।

यहीं से मीडिया की संरचनात्मक सीमा शुरू होती है। जो संस्था आर्थिक रूप से उन्हीं शक्तियों पर निर्भर हो जिनकी आलोचना करनी है, उसकी स्वतंत्रता स्वाभाविक रूप से सीमित हो जाती है। भारत सरकार भी देश की सबसे बड़ी विज्ञापनदाताओं में से एक है। पहले DAVP और अब Bureau of Outreach and Communication के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारें बड़े पैमाने पर विज्ञापन जारी करती हैं। छोटे और मध्यम मीडिया संस्थानों के लिए यह राजस्व जीवनरेखा जैसा होता है। परिणामस्वरूप सत्ता की तीखी आलोचना आर्थिक जोखिम बन जाती है।

इसका असर सार्वजनिक विमर्श में स्पष्ट दिखता है। बेरोजगारी, श्रम अधिकार, कृषि संकट, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा का निजीकरण, मजदूरों की स्थिति और स्थानीय पर्यावरणीय संघर्ष जैसे प्रश्न अक्सर मुख्यधारा मीडिया में सीमित स्थान पाते हैं। इसके विपरीत स्टूडियो आधारित टकराव, धार्मिक ध्रुवीकरण, व्यक्तित्व-केंद्रित राजनीति और भावनात्मक मुद्दे अधिक प्रमुख हो जाते हैं। कारण आर्थिक भी है। दर्शक संख्या और विज्ञापन मॉडल ऐसी सामग्री को अधिक लाभदायक बनाते हैं।

2024 की Reporters Without Borders प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग में भारत 180 देशों में 159वें स्थान पर रहा। सवाल केवल सरकारी दबाव का नहीं है, बल्कि मीडिया स्वामित्व, मुकदमों, विज्ञापन निर्भरता और कॉरपोरेट-राजनीतिक गठजोड़ की व्यापक संरचना से जुड़ा हुआ है।

डिजिटल मीडिया के आने से एक समय लगा था कि सूचना का लोकतंत्रीकरण होगा। कुछ हद तक हुआ भी। स्वतंत्र यूट्यूब चैनल, पोर्टल और छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्म उभरे। लेकिन डिजिटल क्षेत्र में भी बड़ी टेक कंपनियों और एल्गोरिदम का नियंत्रण तेजी से बढ़ा। गूगल और मेटा जैसी कंपनियाँ डिजिटल विज्ञापन बाजार का बड़ा हिस्सा नियंत्रित करती हैं। छोटे स्वतंत्र मीडिया संस्थानों के लिए टिके रहना कठिन होता जा रहा है।

यहीं पर सामुदायिक मीडिया, सहकारी मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारिता की आवश्यकता सामने आती है। सामुदायिक मीडिया का अर्थ छोटा मीडिया नहीं है। इसका अर्थ है ऐसा मीडिया जिसका नियंत्रण स्थानीय समुदायों, पाठकों, पत्रकारों या सहकारी संस्थाओं के हाथ में हो।

दुनिया में इसके सफल उदाहरण मौजूद हैं। ब्रिटेन का The Guardian ट्रस्ट मॉडल पर चलता है। कई यूरोपीय देशों में सार्वजनिक प्रसारण संस्थाओं को कानूनी सुरक्षा दी गई है। लैटिन अमेरिका में सामुदायिक रेडियो आंदोलनों ने स्थानीय समाजों को आवाज़ दी। भारत में भी सामुदायिक रेडियो के कुछ प्रयोग हुए हैं, लेकिन नीति और वित्तीय समर्थन सीमित रहा है।

लोकतंत्र में सूचना की समान पहुँच और विचारों की विविधता जरूरी है। यदि सूचना के स्रोत कुछ आर्थिक शक्तियों के हाथ में केंद्रित हो जाएँ, तो धीरे-धीरे समाज वही देखने लगता है जो उसे दिखाया जाता है, और वही सोचने लगता है जो बार-बार दोहराया जाता है। इसलिए स्वतंत्र मीडिया नागरिक स्वतंत्रता, सामाजिक चेतना और लोकतांत्रिक भविष्य के लिए बहुत जरूरी है।

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