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मध्य प्रदेश

भारतीय पत्रकारिता में इंदौर शहर का योगदान

जब धरती के गहन, गंभीर और रत्नगर्भा होने के प्रमाण को सत्यापित किया जाएगा और उसमें जब भी मालवा या कहें इंदौर का जिक्र आएगा निश्चित तौर पर यह शहर अपने सौंदर्य और ज्ञान के तेज से बखूबी स्वयं को साबित करेगा। हिंदी या कहें अन्य भाषाओँ में इंदौर के पत्रकार और साहित्यकारों का एक अलग ही स्थान है। जिस शहर को मध्यप्रांत की पत्रकारिता का केंद्र या कहें नर्सरी ही कहा जाता हो वह शहर का बाशिंदा होना भी अपने आप में गर्वित होने का कारक है।

देश में स्वच्छता में तीसरी बार प्रथम पायदान पर रहना जिस तरह से गौरवान्वित करने का कारण है तो वही यहाँ के पत्रकारों को भी अपने पूर्वजों या समकालीन पत्रकारों के कारण गौरव की अनुभूति होती है। नईदुनिया जैसे अख़बार ने इस शहर को समाचारों की निष्पक्षता और भाषा की शुद्धता का पाठ पढ़ाया तो वही इंदौर से प्रकाशित वीणा साहित्यिक पत्रकारिता के अपने 75 वर्ष पूर्ण करके एक कीर्तिमान रच रही है। यहाँ वेब पत्रकारिता के प्रथम पोर्टल ‘वेबदुनिया’ ने देश को एक दिशा दी है और साथ ही नवाचार का सन्देश भी। फिल्म, खेल, और साहित्य पत्रकारिता का क्षेत्र भी इंदौर से रोशन रहा है। इंदौर का भारतीय पत्रकारिता में योगदान शहर को ताउम्र अमर कर गया है। जब-जब भी भारतीय पत्रकारिता की बात होगी या इतिहास लिखा जाएगा तब-तब बिना इंदौर के विवरण के वह अधूरा ही माना जाएगा। इंदौर की पत्रकारिता जिन सितारों से रोशन है उनके योगदान का जिक्र करना भी गौरव का महोत्सव मनाना है। इसी सन्दर्भ में कई मूर्धन्य पत्रकार, संपादक है जिनका वर्णन आवश्यक है जैसे –

राहुल बारपुते : बाबा के नाम से मशहूर शख्सियत राहुल बारपुते जी का योगदान हिंदी पत्रकारिता में अखंड है। हिंदी पत्रकारिता में शायद ही कोई ऐसा शख्स होगा जिसने राहुल बारपुते का नाम नहीं सुना होगा। पत्रकारिता के युग निर्माता बारपुते जी एक ऐसी शख्सियत है जिन्होंने राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी जैसे दिग्गजों को तराशा है। बाबा के नाम से मशहुर बारपुतेजी ने नईदुनिया रूपी वटवृक्ष के नीचे धूनी रमाते हुए पत्रकारिता जगत को रत्नों से लाद दिया। यह संस्था कब अखबार से विश्वविद्यालय बन गया और बाबा कुलपति बनगए ये उन्होंने भी पता नहीं चला। लोग नईदुनिया पत्रकारिता सीखने आते और बाबा से सीखकर अन्य अखबारों को समृद्ध करने चले जाते। राहुल बारपुते हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा हैं। उनके संपादकत्व में इंदौर की ‘ नईदुनिया ‘ हिंदी पत्रकारिता की ऐसी नर्सरी बनी, जिसकी जड़ें भाषाई और सामाजिक सरोकारों से ऊर्जा पाती थीं।

राजेंद्र माथुर : स्वतंत्र भारत में हिन्दी पत्रकारिता को स्थापित करने वाले स्तम्भ के रूप में राजेन्द्र माथुर जी का नाम अग्रणी है जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिन्दी और पत्रकारिता के लिये समर्पित कर दिया। आपका जन्म 7 अगस्त, 1935 को मध्य प्रदेश के धार जिले की बदनावर तहसील में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा धार, मंदसौर एवं उज्जैन में हुई। उच्च शिक्षा के लिए वे इंदौर आए जहां उन्होंने अपने पत्रकार जीवन के महत्वपूर्ण समय को जिया। इंदौर के पास बदनावर में जन्में और इंदौर को कर्मस्थली बना कर मालवा अंचल के इस प्रतिभावान पत्रकार ने यह प्रमाणित कर दिया कि ऊंचाई प्राप्त करने के लिये महानगर में पैदा होना आवश्यक नहीं है। इंदौर से प्रकाशित नई दुनिया से अपनी पत्रकारिता यात्रा आरंभ करने वाले श्री माथुर हिन्दी राष्ट्रीय दैनिक नवभारत टाइम्स के सम्पादक बने। आरंभ से अपनी आखिरी सांस तक ठेठ हिन्दी पत्रकार का चोला पहने रहे।

प्रभाष जोशी : हिन्दी पत्रकारिता के आधार स्तंभों में से एक आदरणीय प्रभाष जोशी जी का जन्म इंदौर के निकट स्थित बड़वाहा में हुआ था। उनके परिवार में उनकी पत्नी उषा, माँ लीलाबाई, दो बेटे संदीप और सोपान तथा एक बेटी पुत्री सोनल है। उनके पुत्र सोपान जोशी, डाउन टू अर्थ नामक पर्यावरण विषयक अंग्रेजी पत्रिका के प्रबन्ध सम्पादक हैं। प्रभाष जी बंद कमरे में कलम घिसने वाले पत्रकार नहीं होकर एक एक्टिविस्ट / कार्यकर्त्ता थे, जो गाँव, शहर, जंगल की खाक छानते हुए सामाजिक विषमताओं का अध्ययन कर ना केवल समाज को खबर देते थे अपितु उसे दूर करने का हर संभव प्रयास भी उनकी बेमिसाल पत्रकारिता का हीं एक हिस्सा था थे। वे राजनीति तथा क्रिकेट पत्रकारिता के विशेषज्ञ भी माने जाते थे। दिल का दौरा पड़ने के कारण गुरुवार, ५ नवम्बर २००९ मध्यरात्रि के आसपास गाजियाबाद की वसुंधरा कॉलोनी स्थित उनके निवास पर उनकी मृत्यु हो गई।

डॉ प्रभाकर माचवे : आपका जन्म तो ग्वालियर में हुआ किन्तु शिक्षा इंदौर में और आगरा में हुई। इन्होंने एम.ए., पी-एच.डी. एवं साहित्य वाचस्पति की उपाधियां प्राप्त कीं। ये मजदूर संघ, आकाशवाणी, साहित्य आकदमी, भारतीय भाषा परिषद् आदि से सम्बध्द रहे। देश और विदेश में अध्यापन किया। इनके कविता-संग्रह हैं : ‘स्वप्न भंग, ‘अनुक्षण, ‘तेल की पकौडियां तथा ‘विश्वकर्मा आदि। इन्होंने उपन्यास, निबंध, समालोचना, अनुवाद आदि मराठी, हिन्दी, अंग्रेजी में 100 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। इन्हें ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा उ.प्र. हिन्दी संस्थान का सम्मान प्राप्त हुआ है। भारतीय साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता को भी सुशोभित करने में आपका नाम गौरव से लिया जाता है।

डॉ. वेद प्रताप वैदिक : भारत के सुप्रसिद्ध लेखक, पत्रकार और हिंदी सेवी होने के साथ-साथ एक स्वप्न दृष्टा के रूप में वैदिक जी प्रतिष्ठित है। हिन्दी को भारत और वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में सदा प्रयत्नशील रहते हैं। भाषा के सवाल पर स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी और डॉ॰ राममनोहर लोहिया की परम्परा को आगे बढ़ाने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है। वैदिक जी अनेक भारतीय व विदेशी शोध-संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में ‘विजिटिंग प्रोफेसर’ रहे हैं। भारतीय विदेश नीति के चिन्तन और संचालन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय है। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने लगभग 80 देशों की यात्रायें की हैं।

अंग्रेजी पत्रकारिता के मुकाबले हिन्दी में बेहतर पत्रकारिता का युग आरम्भ करने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है। उन्होंने सन् 1958 से ही पत्रकारिता प्रारम्भ कर दी थी। नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक, बाद में विचार विभाग के सम्पादक भी रहे। उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। सम्प्रति भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष तथा नेटजाल डाट काम के सम्पादकीय निदेशक हैं।

वेद प्रताप वैदिक का जन्म 30 दिसम्बर 1944 को इंदौर में हुआ। वे सदैव प्रथम श्रेणी के छात्र रहे। दर्शन और राजनीति उनके मुख्य विषय थे। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में पीएचडी करने के पश्चात् कुछ समय दिल्ली में राजनीति शास्त्र का अध्यापन भी किया।उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। इसके पूर्व वे नवभारत टाइम्स में सम्पादक भी रहे। उस समय नवभारत टाइम्स सर्वाधिक पढा जाने वाले हिन्दी अखबार था। इस समय वे भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष तथा मातृभाषा उन्नयन संस्थान के संरक्षक भी हैं।

विमल झांझरी : बा साहब व नरेश के नाम से प्रसिद्द १ नवंबर 1924 को इंदौर में जन्में विमल झांझरी जी इंदौर की पत्रकारिता का अभिन्न अंग है जिन्होंने देश भर में विभिन्न भाषाओँ में पत्रकारिता कर के इंदौर को सदा ही मान दिलवाया है। आपकी शिक्षा-दीक्षा 1941 में मेट्रिक (त्रिलोकचन्द जैन हाईस्कूल से, इंदौर) 1944 में बी. काम. (आगरा विश्वविद्यालय से)1946 में एल. एल. बी.(आगरा विश्वविद्यालय से) से हुई है। सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सहभागी होने के साथ साथ आपने पत्रकारिता शुरू की, तथा पहला संस्थान टाइम्स आफ इंडिया था , वर्ष 2001 तक टाइम्स आफ इंडिया में सेवाएँ दी। अँग्रेज़ी , हिन्दी, मराठी, गुजराती भाषाओं में आपने पत्रकारिता कर्म का निर्वहन किया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दो वर्ष भूमिगत रहकर ‘प्रजामंडल पत्रिका ‘ का संपादन भी किया। लगभग ६० वर्ष से अधिक की पत्रकारिता के काल में आपने भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय सहभागिता की, होलकर राजशाही को ख़त्म करवाने में महती भूमिका अदा की, रतलाम- खंडवा-अकोला रेल लाइन में गेज कंवर्जन की योजना मंजूर करवाई, महू- इंदौर का टर्मिनल स्टेशन अथक प्रयासों का परिणाम है, इंदौर में माल गोदाम पर छोटा रेलवे स्टेशन बनवाने में आपकी भूमिका सराहनीय रही, इसी के साथ ‘नरेश’ के नाम से आपकी लेखनी ब्रिटिश इंडिया के अख़बारों में भी प्रचलित रही।

श्रवण गर्ग : जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जुडकर अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआ़त करने वाले हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार,लेखक और संपादक श्री श्रवण गर्ग जी ने सम्पादकीय प्रभाग को उन्नत बनाने में अहम् भूमिका निभाई है। ४ मई १९४७ को जन्मे श्रवण गर्ग ने देश में हिंदी पत्रकारिता का परचम लहराया है। आपका परिवार राजस्थान से आकर इंदौर में बस गया था और इंदौर में वे वेद प्रताप वैदिक जी के पड़ोसी थे। शुरुआती पढ़ाई इंदौर में करने के बाद श्रवण गर्ग ने इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया, उसके बाद ग्रेजुएशन किया। दिल्ली जाने के बाद भारतीय विद्या भवन से उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की और अंग्रेजी पत्रकारिता के कोर्स भी किए और फिर नई दुनिया इंदौर में सम्पादकीय विभाग में कार्य करने लगे। नई दुनिया में रहते हुए उनका चयन इंग्लैंड के थॉमसन फाउंडेशन में तीन महीने के एक पाठ्यक्रम के लिए हुआ।

शरद जोशी : आपका जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में २१ मई १९३१ को हुआ। कुछ समय तक यह सरकारी नौकरी में रहे, फिर इन्होंने लेखन को ही आजीविका के रूप में अपना लिया। इंदौर में नईदुनिया से स्तम्भकार के रूप में शुरुआत करते हुए आपने बतौर पत्रकार स्वयं को स्थापित भी किया। आरम्भ में कुछ कहानियाँ लिखीं, फिर पूरी तरह व्यंग्य-लेखन ही करने लगे। इन्होंने व्यंग्य लेख, व्यंग्य उपन्यास, व्यंग्य कॉलम के अतिरिक्त हास्य-व्यंग्यपूर्ण धारावाहिकों की पटकथाएँ और संवाद भी लिखे। हिन्दी व्यंग्य को प्रतिष्ठा दिलाने प्रमुख व्यंग्यकारों में शरद जोशी भी एक हैं। इनकी रचनाओं में समाज में पाई जाने वाली सभी विसंगतियों का बेबाक चित्रण मिलता है। इसी के चलते इंदौर को देश के नक़्शे पर आदरणीय शरद जोशी जी ने गौरवान्वित किया।

आलोक मेहता : 07 सितम्बर 1952 ई॰ को उज्जैन (म॰प्र॰) में जन्में आलोक मेहता जी ने एम॰ए॰ आधुनिक इतिहास की डिग्री विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से ली। हिन्दी के पत्रकार पत्रकार होने के साथ ख्यात संपादक भी है। आपने नईदुनिया ,नवभारत टाइम्स पटना, हिंदुस्तान. आउटलुक पत्रिका, नई दुनिया, दिनमान, दैनिक हिन्दुस्तान आदि में सेवायें दी तथा आपको भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार-पत्रकार सम्मान-2006, दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा श्रेष्ठ लेखन पुरस्कार-1999 आदि पुरस्कार भी प्राप्त हुए। आपकी भाषा सहज, सरल सादगी पूर्ण साहित्यिक खड़ीबोली हिन्दी है तथा यथार्थ परक, सरस, वर्णनात्मक, विचारात्मक, चित्रात्मक शैली है।

डॉ प्रकाश हिंदुस्तानी : 23 जुलाई 1955 को बुरहानपुर, मध्यप्रदेश में जन्में। वहां से इंदौर जिले की महू तहसील के गांव नेऊ गुराड़िया (महू-पातालपानी के बीच) में बचपन बीता । चौथी कक्षा में महू के माहेश्वरी विद्यालय में भर्ती। फिर शासकीय माध्यमिक और हायर सेकेण्डरी स्कूल में। महू के शासकीय कॉलेज से बी.कॉम, फिर एम.कॉम। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से टॉ रेंक पर मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री प्राप्त की। पंचायत और समाज सेवा विभाग में धार में अप अंकेक्षक की नौकरी की उसके बाद फिर श्री राजेन्द्र माथुर के मार्गदर्शन में नईदुनिया में प्रशिक्षु उपसंपादक के तौर पर पत्रकारिता में शुरुआत की। मुंबई में दि टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की पत्रिका ‘धर्मयुग’ में उप संपादक के तौर पर भी कार्य किया उसी बाद नवभारत टाइम्स में स्थानांतरित हो गए। देश की पत्रकारिता के मिजाज को बखूबी समझकर टिपण्णी रचने वाले ध्येय पुरुष के रूप में डॉ प्रकाश हिंदुस्तानी जी कार्यरत है। कई मूर्धन्य सम्पादकों के साथ कार्य करना और इंटरनेटयुगीन वेबदुनिया के आरम्भ और स्थापित करने के लिए भी हिंदुस्तानी जी जाने जाते है।

दीपक चौरसिया: टीवी पत्रकारिता का चर्चित चेहरा दीपक चौरसिया जी का जन्म इंदौर,मध्य प्रदेश में हुआ था। उन्होंने नयी दिल्ली के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन से पत्रकारिता में डिप्लोमा की डिग्री ली। शिक्षा प्राप्त करने के बाद दीपक आज तक में चले गए। २००३ में उन्होंने सहायक संपादक के तौर पर डीडी न्यूज़ में काम करना शुरुआत किया। जुलाई 2004 में वे आजतक वापस आ गए। आज तक टीवी टुडे नेटवर्क का मुख्य न्यूज़ चैनल है। उन्होंने बाद में स्टार न्यूज़ में शामिल हुए जो बाद में ABP न्यूज़ हो गया। दीपक ने जनवरी २०१३ में मुख्य संपादक के तौर पर इंडिया न्यूज़ में शामिल हुए।

सईद अंसारी : सईद अंसारी भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय एंकर्स में से एक हैं। सईद को लाइव एंकरिंग में दक्षता हासिल है। सईद उन गिने-चुने एंकर्स में से हैं जो राजनीति, खेल, व्यापार सभी तरह की खबरों को बेहद प्रभावशाली ढंग से पेश करते हैं। खबरों की संवेदनशीलता को लेकर सईद की गंभीरता दर्शकों को खबर से जोड़ती है। वहीं एक जुझारू पत्रकार के तौर पर भी इनकी पहचान है। फील्ड रिपोर्टिंग हो या एंकरिंग या फिर डेस्क वर्क, हर जगह इन्होंने अपना परचम लहराया है।

सईद अंसारी को देशभर की कई संस्थाओं ने प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार प्रदान किए हैं। सईद को ENBA का सर्वश्रेष्ठ एंकर अवॉर्ड, BCS रत्न बेस्ट एंकर अवॉर्ड, नारद पुरस्कार जैसे तमाम अवॉर्ड मिल चुके हैं। सईद के नाम एक ऐसा कारनामा भी है जो आजतक कोई भी एंकर नहीं कर पाया, सईद ने लगातार 18 घंटे बिना ब्रेक के लाइव एंकरिंग कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है, जिसे लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है।

सईद अंसारी रेडियो जॉकी रहे हैं, उन्होंने सैकड़ों डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाईं। लिखने-पढ़ने के शौकीन सईद साहित्य प्रेमी हैं। इंडिया टुडे पत्रिका और देश के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सईद के लेख छपते रहते हैं। सईद की विशेषता पुस्तक समीक्षा करना है। कई सौ पुस्तकों की सईद अंसारी समीक्षा कर चुके हैं और यह सिलसिला लगातार जारी है। देशभर के विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थाओं, विभिन्न सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सईद अंसारी को मीडिया विशेषज्ञ और वक्ता के रूप में आमंत्रित किया जाता है। सईद ने मास कम्यूनिकेशन में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के अलावा पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है. सईद ने मास मीडिया और क्रिएटिव राइटिंग में भी दो साल का डिप्लोमा किया है।

लेखक डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’ इंदौर के पत्रकार एवं स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क 09406653005 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है. डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं.

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