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राजस्थान

आईपीएस पंकज चौधरी का डिमोशन नहीं होगा, CAT ने खारिज किया सरकारी आदेश

जयपुर। राजस्थान कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी को उनके खिलाफ चल रहे विवादास्पद पारिवारिक प्रकरण में केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) जयपुर बेंच से बड़ी राहत मिली है। 09 मई 2025 को पारित आदेश में ट्रिब्यूनल ने राज्य सरकार द्वारा जारी डिमोशन आदेश को रद्द कर दिया है। इससे पहले श्री चौधरी को छह अलग-अलग न्यायालयों से राहत मिल चुकी है, जिससे राज्य सरकार की कार्रवाईयों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

मामला क्या है?

पंकज चौधरी का पारिवारिक विवाद वर्ष 2014 से इलाहाबाद हाईकोर्ट में विचाराधीन था। इस दौरान उन्होंने आरोप लगाया था कि राजस्थान कैडर के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने उनके व्यक्तिगत मामले को जानबूझकर उलझाया। 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के निर्देश पर उन्हें पारिवारिक विवाद के आधार पर चार्जशीट थमा दी गई। जांच की ज़िम्मेदारी एक ऐसे आईएएस अफसर को दी गई जो खुद भ्रष्टाचार के मामलों में निलंबित और जेल जा चुके थे।

अब तक के महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले:

  • 01 मई 2018 | इलाहाबाद हाईकोर्ट

तलाक की डिक्री के साथ दोनों पक्षों के विवाद को समाप्त मानते हुए श्री चौधरी के पक्ष में निर्णय।

  • 10 दिसंबर 2020 | कैट, नई दिल्ली

जांच अधिकारी की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए चौधरी को तत्काल सेवा में लेने का आदेश।

  • 19 मार्च 2021 | दिल्ली हाईकोर्ट

राज्य सरकार की अपील खारिज, चौधरी को राहत।

  • 07 मई 2021 | सुप्रीम कोर्ट

राज्य सरकार की SLP खारिज, आदेश बरकरार।

  • 13 मई 2021 | कैट, नई दिल्ली

अवमानना के दोषी पाए गए मुख्य सचिव और कार्मिक सचिव, देर रात श्री चौधरी को सेवा में बहाल किया गया।

  • 09 मई 2025 | कैट, जयपुर बेंच

राजस्थान सरकार द्वारा 3 साल के लिए किया गया डिमोशन आदेश रद्द।

आगे क्या?

न्यायालय के इन आदेशों के बाद अब श्री पंकज चौधरी को पदोन्नति के साथ लगभग 1 करोड़ रुपये का एरियर मिलना तय माना जा रहा है। साथ ही, मुख्य सचिव, गृह सचिव, कार्मिक सचिव और डीजीपी के खिलाफ न्यायालयीन आदेशों की जानबूझकर अवहेलना करने से संबंधित याचिकाएं फिलहाल विचाराधीन हैं।

बड़ा सवाल

पूरे मामले ने राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी और राजनैतिक तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या व्यक्तिगत दुर्भावना और राजनीतिक दबाव में एक वरिष्ठ अधिकारी के करियर के सात साल नष्ट कर दिए गए? क्या यह मामला ‘गुड गवर्नेंस’ और लोकसेवकों के अधिकारों पर एक गंभीर चेतावनी नहीं है?

इससे पहले क्या हुआ था, जानिए…

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