विक्रांत दुबे-
बनारस के जगन्नाथ मंदिर में बृजेश सिंह की एंट्री! चर्चा ज़ोरों पर है- अमर सिंह, केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय और सुनील भाई ओझा जो न करा पाये उसे बृजेश सिंह ने कर दिखाया.
तो आइये जानते हैं क्या है कहानी जगन्नाथ मंदिर और बृजेश सिंह की. बड़े-बड़े दिग्गज जिस काम को नहीं कर पाये उसे बृजेश सिंह बेहद सरलता और बग़ैर हो-हल्ला मचाये अंजाम दे रहे हैं.
वाराणसी के अस्सी घाट से सटे तकरीबन एक लाख स्क्वायर फ़ीट जमीन पर ट्रस्ट श्री जगन्नाथ जी की है. जिसमें जगन्नाथ जी का मंदिर है. आज की वैल्यू डेढ़ सौ करोड़ से ज्यादा होगी. धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व की बात करें तो ये करीब 2 सौ 50 साल पुराना है. उड़ीसा में पूरी के जगन्नाथ मंदिर के बाद बनारस में ये देश का दूसरा मंदिर है. जिसकी स्थापना 1780 में बेनीराम ने की थी. साथ ही इसका संचालन निर्बाध चलता रहे इसके लिए “ट्रस्ट श्री जगन्नाथ जी मंदिर” बनाया.
असि और गंगा के संगम पर लखौरिया ईंट से बने मंदिर में जगन्नाथ जी, बलभद्र जी, और सुभद्रा जी की सुंदर काठ की मूर्तियां पूरी भव्यता के साथ विराजमान है. 1802 में पूरी के ही तर्ज पर रथयात्रा मेले की शुरुआत हुई, जिस स्थान पर रथ रखा गया वो स्थान आज बनारस में रथयात्रा के नाम से जाना जाता है. बेनीराम के वंशज अपनी इस धार्मिक थाती को आने वाली पीढ़ियों को सौंपते चले आ रहे है. अब इस विरासत को दीपक शाहपुरी और आलोक शाहपुरी सँभाले हुए हैं.
बाबा विश्वनाथ के काशी में जो भी आता था उसे जगन्नाथ जी का आशीर्वाद भी मिलता था. ये मंदिर काशी के प्राचीन तीर्थ यात्रा पंचक्रोशी मार्ग पर है.
बनारस के रईस परिवारों में एक शाहपुरी परिवार ने यह तय किया कि धर्म के लिए दी गयी जमीन का सामाजिक उपयोग भी होना चाहिए. इसलिए 1975 में बनारस में अधिकारियों के माध्यम से उन्होंने UP सरकार से पार्किंग व अन्य समाज उपयोगी कार्य के लिए ट्रस्ट की जमीन को निशुल्क अधिग्रहण का प्रस्ताव दिया. लेकिन बात बनी नहीं.
समय बीतता गया और धीरे-धीरे मंदिर कैम्पस के अंदर अवैध अतिक्रमण बढ़ने लगे. किसी ने होटल खोला तो किसी ने मकान बना लिया. हालात इतने बदतर हो गये कि विशाल प्रांगण वाले जगन्नाथ जी का मंदिर नाम मात्र का रह गया. जिनका मंदिर या ट्रस्ट से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है वो यहां के मालिक बन बैठे और मंदिर का ट्रस्टी परिवार यहां आने से बचने लगा. कारण कब कौन इज्जत उतार ले. ट्रस्ट अवैध कब्जेदारों से मंदिर परिसर को मुक्त कराने के लिए मुकदमा लड़ रहा है. सालों से तारीख के बाद तारीख मिल रही है.
मंदिर कैम्पस की दुर्दशा से दुखी शाहपुरी परिवार अधिकारियों, नेताओं और प्रभावशाली लोगों से संपर्क करते रहा. इस बीच कांग्रेस, बसपा, सपा से लेकर भाजपा तक कई सरकारें बदली.
सालों से प्रयासरत शाहपुरी परिवार को 2005 में सपा सरकार ने सहारा दिया. उन दिनों अमर सिंह का जलजला था, माना जाता था कि वो जहां होते, वहीं सरकार है. किसी तरह दीपक शाहपुरी ने अमर सिंह तक पहुंच बनाई. सिंह साहब के अंदर भी भाव जगा और उन्होंने मंदिर के जीर्णोद्धार के प्रस्ताव पर तुरंत अमल करवाया. और पूरे लाव लश्कर के साथ खुद असि स्थित जगन्नाथ मंदिर पहुंचे. मंदिर परिसर के पुनरुद्धार का बिगुल बज गया. मल्टीलेवल पार्किंग सहित कई योजनाएं इस जमीन पर उतरने लगी. मामला जमीन पर उतरता कि सरकार और अमर सिंह दोनों ही जमीन पर आ गये.
लेकिन दीपक और उनके भाई आलोक शाहपुरी ने हार नहीं मानी. 2009 में फिर मौक़ा मिला, कांग्रेस सरकार में केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय उम्मीद बन कर उभरे. उन्होंने पर्यटन विभाग के जरिए कुछ योजनाएं से ट्रस्ट को जोड़ दिया. लेकिन फ़ाइलें आकार लेती इससे पहले ही सुबोधकांत सहाय को हटना पड़ा. मंदिर को सँवारने के सारे प्रयास विफल हो रहे थे. ऐसा लग कि जगन्नाथ जी अपने जीर्णोद्धार का जिसे मध्यम बनाना चाहते थे वो कहीं दूर है.
सुनील भाई ओझा ने जीर्णोद्धार का भरोसा दिया
एक दशक बाद 2021 में एक चमकती उम्मीद दिखी. नाम था सुनील भाई ओझा. सुनील भाई बीजेपी के महत्त्वपूर्ण अंग थे. प्रधानमंत्री बनारस को उन्हीं की नज़र से देखते थे. 2014 से सुनील भाई बनारस के विकास की धुरी रहे. बीजेपी के स्थानीय नेताओं के माध्यम से शाहपुरी बंधु सुनील भाई तक पहुँच गये. उन्होंने इस कार्य में रूचि दिखाते हुए दीपक शाहपुरी की सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ से ट्रस्ट अधिग्रहण हेतु मुलाकात कराई. इस कार्य में वर्तमान में MLC धर्मेंद्र सिंह ने भी मदद की. लेकिन दुर्भाग्यवश इसी बीच सुनील भाई का निधन हो गया. जो शाहपुरी परिवार के लिए आख़िरी उम्मीद थे. आलोक शाहपुरी को सुनील भाई से मिलने में दो साल से ज़्यादा का समय गया था. और एक ही झटके में सारी मेहनत ज़मींदोज़ हो गयी.
सारी उम्मीद टूट गयी और जगन्नाथ मंदिर पर अवैध कब्जा बढ़ रहा था, जिसे रोकने की सारी कोशिशें नाकाम. विडंबना यह की बनारस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है, जहाँ रोज विकास के लिए जमीनें अधिग्रहित की जा रही हैं. वहीं शाहपुरी परिवार अपनी एक लाख स्क्वायर फ़ीट जमीन निशुल्क सरकार को देने के लिए भटकता रहा.
खैर जगन्नाथ जी ने अपने बारे में कुछ तो सोचा होगा. बिना उनके पत्ता भी नहीं हिलता.
इस कुछ महीनों पहले नई एंट्री हुई बृजेश सिंह की. दुनिया जिसे माफिया डॉन के नाम से जानती है. लेकिन यहां इससे पलट इनका नया रूप देखने को मिल रहा है. बृजेश सिंह जगन्नाथ मंदिर जीर्णोद्धार के लिए बढ़ चढ़कर लगे है. अक्सर मंदिर के कार्यक्रमों में उनकी तस्वीरें देखने को मिलती है. बृजेश सिंह का नाम आते ही शहर में चर्चा आम है कि ट्रस्ट की जमीन पर माफिया का क़ब्ज़ा हो रहा है. ये क़यास बेवजह भी नहीं है. जहाँ मठ-मंदिरों पर कब्ज़े लेकर साधू-संन्यासी कोर्ट कचहरी रहे हैं तो फिर बृजेश सिंह से क्या उम्मीद करेंगे, जिनका अतीत आरोपों के घेरे में है. कुछ उतावले लोगों ने ट्रस्टी शाहपुरी बंधुओं से पूछा भी, की आप लोगों ने ये क्या कर दिया. बृजेश सिंह को ट्रस्ट सौंप दी!
शाहपुरी बंधुओं ने कहा जगन्नाथ जी पर भरोसा है वो अच्छा ही करेंगे. महर्षि वाल्मीकि का अतीत क्या था?
यहाँ कुछ वैसा ही हो रहा है. बृजेश सिंह ने ट्रस्ट के सरकारी अधीग्रहण की योजना तैयार की और शाहपुरी बंधुओं की मुलाकात दूसरी बार मुख्यमंत्री योगी जी से करा दी. जमीन कब्जा तो दूर की बात है उन्होंने खुद को पीछे कर शाहपुरी बंधुओं को आगे रखा. उन्हें उनका सम्मान दिलाया.
फिलहाल सरकार इसे कब अधिग्रहित करेगी पता नही लेकिन बृजेश सिंह के नेतृत्व में स्थानीय लोग उत्साहित भाव में मंदिर के जीर्णोद्धार में जुट गये हैं. मंदिर के कार्यक्रम जो बीते कुछ सालों से सिर्फ परम्परा का निर्वहन के लिए हो रहे थे अब उनमें रौनक है. भीड़ बढ़ रही है. बताया जा रहा कि अवैध कब्जे भी धीरे-धीरे कम हो रहे है.
अब देखिए भगवान जगन्नाथ जी अपने मंदिर के जीर्णोद्धार का माध्यम बनने का आशीर्वाद बृजेश सिंह जी को देते हैं. जय जगन्नाथ जी

अजीत कुमार सिंह-
काशी में ‘चमत्कार’ की आहट : जहां सत्ता के सूरमा फेल हुए, वहां बृजेश सिंह की ‘खामोश एंट्री’; जगन्नाथ मंदिर की 150 करोड़ की विरासत बचाने का उठाया बीड़ा!
अमर सिंह का रुतबा, सुबोधकांत का मंत्रालय, सुनील ओझा का सियासी कद भी नहीं दिला पाया न्याय; शाहपुरी परिवार बोला- जगन्नाथ की मर्जी, वाल्मीकि भी तो बदले थे!

वाराणसी। बाबा विश्वनाथ की काशी में अस्सी घाट से सटे 250 साल पुराने श्री जगन्नाथ मंदिर की दीवारों से अब एक नई इबारत लिखी जा रही है। जिस दर पर कांग्रेस के सुबोधकांत सहाय, सपा के अमर सिंह और भाजपा के सुनील ओझा जैसे सियासत के सूरमा नाकाम लौटे, वहां अब बृजेश सिंह की खामोश दस्तक ने हलचल मचा दी है। मंदिर ट्रस्ट की डेढ़ सौ करोड़ से ज्यादा की एक लाख वर्ग फीट जमीन को कब्जामुक्त कराने और जीर्णोद्धार की उम्मीद फिर जगी है।
पुरी के बाद देश का दूसरा जगन्नाथ धाम
1780 में बेनीराम ने असि-गंगा संगम पर लखौरिया ईंटों से इस मंदिर की नींव रखी थी। जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काठ की मनोहारी मूर्तियां यहां विराजमान हैं। 1802 में यहीं से शुरू हुई रथयात्रा ने बनारस को ‘रथयात्रा’ मोहल्ला दिया। पंचक्रोशी परिक्रमा मार्ग का यह अहम पड़ाव आज कब्जों के बोझ तले कराह रहा है।
बेनीराम के वंशज दीपक शाहपुरी और आलोक शाहपुरी इस विरासत के मौजूदा संरक्षक हैं। 1975 में ही शाहपुरी परिवार ने पार्किंग और जनहित के लिए ट्रस्ट की जमीन सरकार को निशुल्क देने का प्रस्ताव रखा था। मगर फाइलें दफ्तरों में दम तोड़ती रहीं और मंदिर प्रांगण में होटल-मकान उगते गए। हालात ऐसे हुए कि ट्रस्टी परिवार का मंदिर आना तक मुश्किल हो गया।
तीन दशक, तीन दिग्गज, एक नाकामी
1. अमर सिंह का जलजला: 2005 में सपा राज में अमर सिंह लाव-लश्कर के साथ असि पहुंचे। मल्टीलेवल पार्किंग और जीर्णोद्धार का ऐलान हुआ। सत्ता बदली और योजना धूल फांकने लगी।
2. सुबोधकांत का वादा: 2009 में यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने पर्यटन योजनाओं से ट्रस्ट को जोड़ा। मंत्रालय जाते ही फाइलें बंद हो गईं।
3. सुनील ओझा की आखिरी उम्मीद: 2021 में पीएम मोदी के करीबी सुनील भाई ओझा ने शाहपुरी बंधुओं की सीएम योगी से मुलाकात कराई। एमएलसी धर्मेंद्र सिंह भी साथ थे। सुनील ओझा के असमय निधन ने सारी मेहनत पर पानी फेर दिया।
‘माफिया’ की एंट्री, बदला नजारा
पिछले कुछ महीनों से बृजेश सिंह का नाम जगन्नाथ मंदिर से जुड़ते ही काशी का सियासी पारा चढ़ गया है। मंदिर के आयोजनों में उनकी मौजूदगी की तस्वीरें वायरल हैं। शहर में कानाफूसी है- ‘कहीं कब्जा तो नहीं?’ लेकिन ट्रस्टी आलोक शाहपुरी दो टूक कहते हैं, “जगन्नाथ जी की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। महर्षि वाल्मीकि का अतीत क्या था? भगवान जिसे माध्यम बनाना चाहें, वही बनेगा।”
चौंकाने वाली बात यह है कि बृजेश सिंह ने कब्जे की बजाय शाहपुरी बंधुओं को आगे रखकर दूसरी बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कराई। सरकारी अधिग्रहण की फाइल फिर दौड़ पड़ी है। असर जमीन पर दिख रहा है। सालों से रस्म अदायगी तक सिमटे मंदिर के कार्यक्रमों में भीड़ लौटने लगी है। अवैध कब्जे भी सिमट रहे हैं। स्थानीय लोग खुद जीर्णोद्धार में जुट गए हैं।
सवाल अब भी कायम
पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र में विकास के लिए रोज जमीन अधिग्रहित हो रही है, वहीं शाहपुरी परिवार अपनी एक लाख वर्ग फीट जमीन निशुल्क देने को दर-दर भटकता रहा। अब जब बृजेश सिंह ने कमान संभाली है तो सवाल उठ रहा है- क्या जगन्नाथ जी अपने धाम को संवारने का श्रेय उसी शख्स को देंगे जिसका अतीत सवालों के घेरे में रहा है? काशी इसका जवाब तलाश रही है।



