ममता मल्हार-
मुझे अफसोस है कि पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान मीडिया टूर में हमारी सबसे पहली मुलाकात तत्कालीन इंडिया टुडे के संपादक जगदीश उपासने से हुई थी। यह वह दौर है जब एक के बाद एक तमाम बड़े गम्भीर कहलाने वाले पत्रकारों के मुलम्मे उतरते जा रहे हैं।
मुझे अफसोस है कि एक पत्रकार जो एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे हों वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महिला पत्रकार को सोशल मीडिया पर सिर्फ इसलिए बेइज्जत कर रहे हैं कि उसने हमारे देश के प्रधानमंत्री से सवाल पूछ लिया। उस पर उस विदेशी पत्रकार को कांग्रेस समर्थक का प्रमाण पत्र भी दे दिया। इस पर मुझे हंसी आई क्योंकि सवाल पूछने वालों को कांग्रेसी घोषित करने वाले बहुत छोटे स्तर के आईटी सेल के 50 पैसे से 2 रुपये वाले प्रति ट्वीट/पोस्ट वाले मजदूर होते हैं।
यह करके उपासने जी ने यह भी सार्वजनिक तौर पर घोषित और साबित कर दिया कि हमारे देश में अगर महिला पत्रकार सवाल पूछती है तो हम उसके साथ कैसा बर्ताव करते हैं। यह तो कुछ भी नहीं किसी भी प्रकार के लांछन भी लगा सकते हैं। पर शायद उपासने जी भूल गए कि वह नार्वे की पत्रकार है। एक ऐसा देश जहां की मीडिया नम्बर 1 पर है और आपके देश की मीडिया 157वें नम्बर पर। और उस महिला पत्रकार को धेले भर का भी फर्क नहीं पड़ेगा पर आपकी नैतिकता का क्या?
कल अंजना ओम कश्यप का वीडियो आया था सामने जो इस पत्रकार द्वारा पीएम मोदी से सवाल पूछने पर उसकी आलोचना तो कर रही थीं मगर उन्हें शब्द खोजने पड़ रहे थे। उन्हें देखकर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ था पर उपासने जी ने तो हैरान ही कर दिया।
भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो छवि बनेगी उसका असर आगे क्या होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन मैं नई पीढ़ी के पत्रकारों को बस एक सलाह देना चाहूंगी कि इस फील्ड में न किसी को बड़ा मानो न महान औऱ आइडियल तो बिल्कुल भी नहीं। वरना आपको खुद पर शर्मिंदगी होगी।

वैसे स्वीमिंग करने में स्वीमिंग कॉस्ट्यूम ही पहना जाता है।
हमेशा मेरा एक सवाल होता है पुरानी पीढ़ी से आज पत्रकारों को जो गालियां पड़ रही हैं उसमें आप लोगों का न्यूजरूम में ऐसा क्या योगदान रहा कि हमें विरासत में गालियां ही मिलीं?
अब पहनावे से पत्रकारिता के मापदंड तय होंगे क्या? पत्रकारिता की गम्भीरता को गिरवी रख छिछोरपंथी की राह अपनाने वालों को समर्पित।
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