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सुख-दुख

संपादक जयदीप कार्णिक के जन्मदिन पर पत्रकार श्रुति अग्रवाल के ‘मन की बात’

श्रुति अग्रवाल-

एक व्यक्ति जिसकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं…. उन्हें जन्मदिन की हार्दिक-हार्दिक शुभकामनाएं…

यदि आप अमर उजाला डिजिटल के नेशनल एडिटर जयदीप कर्णिक जी को रामदेव बाबा को पटखनी देने वाले वीडियो से जानना-समझना चाहते हैं तो थोड़ा रुकिए…मीडिया की दुनिया में चुनिंदा संपादक होंगे जो सबसे तेज की जगह खबर की पुष्टि करते हैं। जो अपने साथियों पर दूसरे लोगों से ज्यादा विश्वास करते हैं। उस समय जब इंडियन मीडिया धर्मेंद्र को श्रद्धांजली दे रहा था तब ये अकेले थे जो अपनी रिपोर्टर से बात करके धर्मेंद्र के निधन की खबर को नकार रहे थे। वेबसाइट जो हिट्स की दुनिया है वहां यह संपादक अपने रिपोर्टर से खबर को ब्रेक करने नहीं उस पर काम करने के लिए कहते हैं।

जयदीप कर्णिक जी को सालों से जानती-पहचानी ही नहीं आईडियलॉइज भी करती हूं। जयदीप जी से पहली मुलाकात 19 साल पहले बड़ी औचक सी हुई थी। आयुषमान के जन्म औऱ राजीव के लंदन जाने के बाद …मैं भी बोरिया बिस्तर समेट लंदन जा रही थी। मां बनने के बाद मेरी हालत कामगार महिलाओं की चुनौतियों से अलग ना थी। हर दूसरा व्यक्ति कह रहा था, पत्रकारिता में कैरियर खत्म समझो। लंदन में खाली वक्त मिलेगा, वहां सोचना आगे क्या करना है।

पोस्टपार्टम डिप्रेशन क्या होता है, यह बता तो नहीं सकती लेकिन उस समय महसूस जरूर किया। ऐसे समय में सहारा समय में बॉस रहे प्रकाश हिंदुस्तानी सर ने मुझे जयदीप कर्णिक जी से मिलने को कहा। बोला वेबदुनिया का बीबीसी से टॉयअप है, शायद वे मदद कर सकें।

बीबीसी उस समय लंदन के बुश हॉउस से ही संचालित होता था। मैं झिझकते हुए वेबदुनिया के ऑफिस गई थी मन में यह तय करके गई थी कि घंटे भर की चर्चा और चाय…बस यही हासिल होना है लेकिन ….जयदीप जी ना सिर्फ गर्मजोशी से मिले बल्कि तुरंत मेरी सलमा जैदी ( बीबीसी, लंदन में वेबसाइट हेड) से फोन पर बात कराई। उस समय व्हाट्स एप कॉलिंग ना थी तो विदेश बात करना खासा महंगा था। फिर मुझे सहारा समय छोड़े हुए भी एक साल हो चुका था लेकिन जयदीप जी ने बिना किसी हिचक के मेरे लिए बात की।

पंद्रह दिन की फैलोशिप दिलवा दी और बोला आगे का रास्ता आपको खुद तय करना है, और बेटे के साथ मुझे अंजाने देश में जाने-पहचाने नाम के साथ ट्रेनिंग और फ्रीलांसिग का मौका मिला।

एक माँ बनी थोड़ी सी लथार्जिक हो चुकी लड़की को उन्होंने किसी तरह का कोई लैक्चर नहीं दिया। ना ही जजमेंटल हुए। आज तक कभी किसी के समाने उन्होंने इस बात का जिक्र तक नहीं किया, एहसान जताना तो नामुमकिन, शायद उन्हें याद भी ना होगा।

इसके बाद दूसरा वाक्या था, लंदन से लौटकर मैंने वेबदुनिया ज्वाइन किया तब। एक इंटर्न के एक्सीडेंट के बाद सामने वाले लोगों ने (बाइक शोरुम के) उसे बंधक बना लिया था। मैंने देखा जयदीप जी औऱ चार-पांच साथी उस बच्चे की मदद के लिए जा रहे थे। मैंने टोकते हुए कहाः पहले पुलिस को फोन कर लें। सर का जवाब था, तुम करो…रिपोर्टिंग टीम के लोग भी कर रहे हैं। वे सीधे-साधे बच्चे का नुकसान न कर देँ। आज के समय में जब लोग दूसरों के फटे में टांग अड़ाने से डरते हैं। अखबार-टीवी मीडिया अपने ही पत्रकारों पर हुए अन्याय को दिखाता भी नहीं। एक संपादक सब-कुछ छोड़कर एक अभिभावक की तरह भागा था….कि उसके जूनियर साथी को खरोंच भी ना आ जाए।

मैंने जयदीप जी को कभी गुस्से में नहीं देखा, इस एक समय को छोड़कर। उसी समय साथियों से पता चला था कि यदि कुछ गलत भी होता तो गुंडई कर रहे लोगों से ये व्यक्ति अकेले निपटने का माद्दा रखता है। पूरा बचपन अखाड़े की मिट्टी में बिताया है।

इसी तरह का अलग सा अनुभव अपने साथी कैमरामेन धर्मेंद्र सांगले की शादी में हुआ था। धर्मेंद्र के बड़े भाई जयदीप जी के दोस्त थे। यहां संपादक से अलग दोस्त और सामाजिक व्यक्तित्व देखा। जीवन संगिनी का हाथ थामे जयदीप जी बाकी बारातियों को ट्रेन में खाने के पैकेट बांट रहे थे, बड़े की तरह ख्याल रख रहे थे। इसी समय उन्हें बड़े भाई की तरह जाना और माना।

ना जाने हमारे कितने साथी हैं जो इस बात के गवाह हैं कि नौकरी में मुश्किल आने पर, वे नहीं जयदीप जी उन्हें पहला कॉल करके ना सिर्फ ढांढस बंधाते हैं बल्कि यह बोलते हैं कि कुछ नहीं होगा, जब तक कहीं व्यवस्था नहीं होती, मेरे पास नहीं तो फलां-फलां जगह यह काम है, करो, खाली मत बैठो। यह कह पाते हैं क्योंकि असुरक्षित महसूस करने वाले दौर में वे स्वयं पर विश्वास करते हैं। टीम लीडर कैसा होना चाहिए, उन्हें देख कर समझा जा सकता है। इन्हीं परफेक्ट टीम लीडर का जन्मदिन है…उन्हें जन्मदिन बहुत-बहुत मुबारक हो।

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