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झूठ की फैक्ट्री, चुनावी शपथपत्र से परेशान करने वाली खबर का राज और ‘ना खाउंगा, ना खाने दूंगा’ का सच  

संजय कुमार सिंह

आज के अखबार (17.10.2025) भागदो

खबरों को लीपने पोतने की भाजपाई व्यवस्था पैसे के दम पर चल रही है और ऑनलाइन गुंडों से कॉपी-पेस्ट की ट्रोलबाजी चाहे जितनी असरकारक हो दूरदर्शी नहीं हो सकती है और यह भाजपा की मौजूदा कार्यशैली की कमजोरी है। अंध समर्थक और प्रचारक इसकी परवाह नहीं करते हैं और वोट चोरी से चुनाव जीते जा सकें तो इसका बहुत मतलब भी नहीं है। लेकिन हाशिए के लोगों को आकर्षित करने के लिए जो सब किया जाना चाहिए वह इस रणनीति में नहीं दिखता है। कम से कम 15 लाख सबको मिलेंगे जैसी कल्पना में। भले ही यह भी दूरदर्शी नहीं था पर पांच साल के लिए सत्ता तो मिल ही गई थी या लोग मानते ही हैं और तब वोट चोरी मुद्दा नहीं था। वह तो बार-बार की जीत के बाद आया। पर अभी मुद्दा है कि भाजपा और सरकार का मीडिया मैनेजमेंट चूक रहा है। भविष्य निधि के पैसों से संबंधित नियमों में संशोधन उसकी सूचना, उसपर प्रतिक्रिया और पीआईबी का बचाव बहुत ही फूहड़ा था। उसपर लिख चुका हूं। आज अखबारों खबर का यह दूसरा हिस्सा मेरे नौ अखबारों में से किसी के पहले पन्ने की खबर पर आधारित नहीं है। पता नहीं अखबारों में है या नहीं या किसमें है, कितना है पर सच यह है कि डिग्री नहीं दिखाने का अदालती आदेश होने के बावजूद भाजपा नेताओं के शपथ पत्र से परेशान करने वाली खबर बन सकती है। ना खाउंगा ना खाने दूंगा के बावजूद सर्वोच्च या सबसे विस्तृत स्तर पर बचाने की कोशिश होती है और अपने लोगों को बचा लेने की पुख्ता व्यवस्था है।

सुप्रिया श्रीनेत ने भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और उनकी पत्नी के आय के उस विवरण की चर्चा की जो पहले से सार्वजनिक हैं और नामांकान के समय शपथपूर्वक दाखिल किए जाते हैं। इसमें कई बातें परेशान करने वाली हैं और परेशानी इतनी कि निशिकांत दुबे ने अब बताया कि राहुल गांधी के पिता (जी हां, यही लिखा है) राजीव गांधी ऐसे थे, वैसे थे। इससे उनका कितना बचाव होगा, राम जानें पर सच यह है कि भाजपा आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने भी उनका पक्ष लिया है और ‘ना खाउंगा ना खाने दूंगा’ के बावजूद पार्टी का आईटी सेल आय के ज्ञात स्रोत से ज्यादा की आय से संबंधित सवाल पर अपने सांसद का बचाव कर रहा है। आम तौर पर यह सामान्य हो सकता था लेकिन ‘ना खाउंगा ना खाने दूंगा’ की ऐतिहासिक घोषणा जो “भूतो न भविष्यति” जैसा है और तीन बार बहुमत दिलाने का आधार हो सकता है उसके बावजूद जो सब हो रहा उसके साथ पार्टी के सबसे मुंहफट सांसद का आरोप, उसका जवाब और फिर बचाव में दिए गए तर्क दिलचस्प हैं। मुद्दा वह सब नहीं है। मुद्दा है अमित मालवीय की दलील, श्रीमती अनामिका गौतम अपना पक्ष लोकपाल के समक्ष रखेंगी। क्योंकि मामला विचाराधीन है, इसलिए आरोपों का जवाब देना उचित नहीं होगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब शिकायतकर्ता स्वयं सुनवाई से बच रहे हैं, तो कांग्रेस को इस विषय पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की ज़रूरत क्यों पड़ी? लगता है, निशिकांत दुबे जी द्वारा दिए गए घाव गांधी परिवार के लिए अब नासूर बन गए हैं।

इसके साथ लगाए गए आदेश की कॉपी में जो अंश हाइलाइट किया गया है वह यह कि….

1. 06.10.2025 के आदेश की शर्तों के तहत मौका दिए जाने के बावजूद शिकायतकर्ता मौजूद नहीं हैं।

2. शिकायकर्ता ने अब एक शपथपत्र दायर किया है जो संभवतः 04.10.2025 का है।

3. शिकायकर्ता द्वारा की गई ऑनलाइन सुनवाई और सुनवाई में शामिल होने के लिए किए गए खर्चों की भरपाई की अपील के संबंध में आरपीएस (प्रतिवादी लोक सेवक) का जवाब दाखिल किए जाने के बाद अगली तारीख पर इस बारे में उपयुक्त ढंग से विचार किया जाएगा।

इससे जाहिर है कि शिकायतकर्ता को सशरीर उपस्थित होने के लिए कहा जा रहा है, ऑनलाइन सुनवाई की मांग नहीं मानी गई है और उपस्थित होने के लिए खर्च के भुगतान के बारे में भी निर्णय नहीं हुआ है। शपथपत्र प्राप्त हो चुका है। ऐसे में शिकायतकर्ता का उपस्थित न होना, ‘स्वयं सुनवाई से बचना’ वैसे ही है जैसे वोट चोरी की शिकायत तब दर्ज होगी जब शपथपत्र देंगे। शपथपत्र अनुराग ठाकुर से नहीं मांगेंगे और शपथपत्र के साथ की गई शिकायत के बारे में कह देंगे कि शपथपत्र नहीं था जब पावती सार्वजनिक है तो चुप्पी साध गए। इसी तरह, वोट चोरी की शिकायत पर चुनाव आयोग सीआईडी की चिट्ठी का जवाब नहीं दे रहा है, सांसद की आय ज्ञात स्रोत से ज्यादा लग रही है, जांच कीजिए कहने वाले को हर सुनवाई में मौजूद रहना है। शपथपत्र से बात नहीं बनेगी। जाहिर है, यह सब पुरानी व्यवस्था है और भ्रष्टाचार ऐसे ही होता था। ‘ना खाउंगा ना खाने दूंगा’ के बावजूद कुछ नहीं हुआ है या हालत और खराब हुई है। जो हो रहा है वह सब दिखावा है और इस कार्रवाई के बारे में भी ऐसा कहा जा सकता है। अभी तक तो आदेश सार्वजनिक नहीं था पर जो अंश हाईलाइट कर सार्वजनिक किया गया है उससे तो यही लगता है। वैसे भी सासंद की शिकायत लोकपाल से की गई है। शपथ पत्र दाखिल किए जाने से यह मुद्दा नहीं बना और जांच की जरूरत नहीं समझी गई। प्रधानममंत्री के शपथपत्र के बारे में भी यह सही है। डिग्री का हाल आप जानते हैं पत्नी की आय का मामला यही है कि पता नहीं है। अगर पता नहीं है, जवाब मान्य है तो शपथपत्र की क्या जरूरत? पर सब चल रहा है। अदालत जब कह चुकी है कि डिग्री दिखाने की जरूरत नहीं है तो शपथपत्र की जरूरत क्यों? जाहिर है, ये सब नियम अनुभव से जरूरत के आधार पर बने थे और अब उन्हें शिथिल किया जा रहा है, ‘ना खाउंगा ना खाने दूंगा’ की गैर जरूरी और बड़बोले घोषणा के बावजूद। कहने की जरूरत नहीं है कि इसका मकसद ईमानदार की छवि बनाना था पर उसके लिए काम नहीं हो रहा है। इसमें यह तथ्य भी है कि न्यायमूर्ति एएम खानविलकर भारत के लोकपाल हैं और इससे पहले देश के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं। उनके फैसलों के कारण उन्हें सरकार का आदमी माना जाता है औ यह सार्वजनिक चर्चा में रहा है कि उन्हें यह पद उनके काम का ईनाम है।

ऐसे में शिकायत, शिकायत पर आदेश का ऊपर वर्णित अंश और फैसले से पहले आरोपों को हल्का करने की संगठित कोशिश बहुत कुछ कहती है। जो खबर होनी चाहिए थी। सोशल मीडिया पर तो है। अखबारों का पता नहीं। ऐसे में लोकपाल की जांच को कितना महत्व मिलना है वह मुद्दा नहीं है उसके उपरोक्त आदेश के आधार पर बचाव में दी गई दलील निश्चित रूप से उल्लेखनीय है। आप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद उच्च पदों पर नियुक्त करना भारत में एक विवादास्पद परंपरा रही है। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। इस संदर्भ में, न्यायमूर्ति खानविलकर की नियुक्ति भी चर्चा में रही है। हालांकि, लोकपाल अधिनियम में यह प्रावधान है कि अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट का पूर्व मुख्य न्यायाधीश या पूर्व न्यायाधीश हो सकता है। आप समझ सकते हैं कि यह व्यवस्था किसलिए होगी और उसका क्या उपयोग हो सकता है। न्यायमूर्ति खानविलकर सुप्रीम कोर्ट के अपने कार्यकाल (2016-2022) के दौरान कई महत्वपूर्ण और बहुचर्चित फैसलों में शामिल रहे हैं, जिनमें से कुछ सरकार के पक्ष में माने जाते हैं। समाचार रपटों और सार्वजनिक बहसों में अक्सर इन फैसलों को उनकी नियुक्ति से जोड़ा जाता है।

निर्णय/मामलाफैसला और सरकार की स्थितिसत्ता के करीबीहोने का आरोप
प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट की संवैधानिक वैधता (2022)जस्टिस खानविलकर की अगुआई वाली पीठ ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी)को गिरफ्तारी, संपत्ति जब्त करने और समन जारी करने की व्यापक शक्तियों को बरकरार रखा।इस फैसले ने ईडी की शक्तियों को मजबूत किया, जिसका उपयोग अक्सर राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ किया जाता है। आलोचना हुई कि यह फैसला सरकार को दमनकारी शक्तियाँ प्रदान करता है।
गुजरात दंगे (ज़किया जाफरी बनाम गुजरात राज्य) (2022)पीठ ने 2002 के गुजरात दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री (और वर्तमान प्रधानमंत्री) नरेंद्र मोदी तथा अन्य को विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा दी गई क्लीन चिट को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। (दिल्ली में पटाखे चलाने की अनुमति और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के खुलासे से अदालत पर सरकार के दबाव का मामला स्पष्ट है और जज लोया की मौत की जांच नहीं होने देने की जिद्द बहुत कुछ कहता है)इस फैसले को सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक जीत माना गया। फैसले में याचिकाकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ पर “मनगढ़ंत सबूत” गढ़ने का आरोप लगाया गया, जिसके तुरंत बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था।
सेंट्रल विस्टा परियोजना (2021)पीठ ने सेंट्रल विस्टा परियोजना (जिसमें नए संसद भवन का निर्माण शामिल था) को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिससे सरकार के लिए परियोजना का मार्ग प्रशस्त हुआ।इस महत्वाकांक्षी सरकारी परियोजना को मंजूरी देने के कारण आलोचना हुई, जिसे कई लोगों ने कार्यपालिका के प्रति नरम रुख माना।
आधार योजना की संवैधानिक वैधता (2018)उन्होंने आधार कानून की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखने वाले बहुमत के फैसले का समर्थन किया, जबकि जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने असहमति जताई थी। एसआईआर में आधार का हाल अलग कहानी है।इस फैसले ने सरकार की प्रमुख योजना को संवैधानिक समर्थन दिया। अब वोटर आईकार्ड की जरूरत नहीं होनी चाहिए पर वह मुद्दा ही नहीं है।
यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) कानून) के तहत जमानत पर फैसला (2019)पीठ ने यूएपीए के तहत जमानत देने को कड़ा कर दिया।इस फैसले ने सरकार को आतंकवाद-संबंधी मामलों में आरोपियों को हिरासत में रखने के लिए व्यापक शक्ति दी। लोग पांच साल से ज्यादा से जेल में हैं।

ऐसे जज निशिंकात दुबे के मामले में क्या फैसला देंगे वह तो बाद की बात है शपथपत्र पर सवाल तो पार्टी का आंतरिक मामला होना चाहिए था और पार्टी में कोई ना खाउंगा ना खाने दूंगा के प्रति गंभीर होता तो सुप्रिया श्रीनेत को आरोप लगाने की जरूरत ही नहीं पड़ती या मौका ही नहीं मिलता। अमित मालवीय के सवाल का जवाब तो बहुत पुराना है कि शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों पर पत्थर नहीं मारते लेकिन स्थिति ऐसी है जैसे पार्टी आम आदमी को पार्टी का समर्थक और प्रचारक ही मानती हो। लोकपाल के पारे में मेरी राय खबरों से बनी है कि वे “भाजपा या सरकार के आदमी” हैं। ऐसे में उनके पास शिकायत की गई है यही कम नहीं है। शपथपत्र दिए जाने के बावजूद वीडियो कांफ्रेंसिंग से सुनवाई न होने और खर्च न देने का फैसला नहीं होने के बावजूद मौजूद नहीं होने पर शिकायत निरस्त भी कर दी जाए तो क्या मामला समझ में नहीं आएगा? (समाप्त)

पहला पार्ट पढ़िए – आज के अखबार : ट्रम्प के दावे की ‘खबर’ और उसे लीपने-पोतने की कोशिश में कमजोरी उजागर;

लिंक – https://www.bhadas4media.com/trumph-ke-dawe-kee-khabar-aur-use-leepne-potne/

लेखक संजय कुमार सिंह से संपर्क [email protected]के ज़रिए किया जा सकता है।

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