सर्वप्रिया सांगवान-
सीमा पर लड़ने के लिए ट्रेनिंग होती है, डॉक्टर, वकील, टीचर..सब बनने के लिए ट्रेनिंग होती है. लेकिन नागरिक बनने की ट्रेनिंग कौन देता है?
मेरे ख़याल से वो ट्रेनिंग पत्रकार देता है और ये ट्रेनिंग अनवरत चलती है. खुद पत्रकार की भी और जनता की भी. इसलिए पत्रकारिता कोई ऐसा प्रोफ़ेशन नहीं, जहां आप त्वरित नतीजों की उम्मीद लगाएं या नतीजे साक्षात ना दिखने से उम्मीद खो दें. लोकतंत्र की यात्रा ऐसी ही होती है.
ऐसे समय में जब हमारा मीडिया और लोकतंत्र बेहिसाब चुनौतियों से गुज़र रहा है, ‘द लास्ट मैन’ ने मुझे अपने काम और लोकतंत्र के लिए बहुत उम्मीदें दी. मुझे नहीं पता ये काम कितने लोगों तक पहुंचा पर जितने भी लोगों तक पहुंचा, मुझे उसकी बहुत संतुष्टि है. जीवन में 1000 लोग भी आपकी बात समझते हैं, या उन्हें उससे कुछ हासिल हुआ, तो किसी पत्रकार के लिए ये छोटी बात नहीं है.
इस काम को रामनाथ गोयनका अवॉर्ड मिला है. बल्कि, एक साल में तीन अलग-अलग ज्यूरी से इस sociopolitical सीरीज़ को तीन अवॉर्ड मिले हैं और ये मेरे लिए किसी peer review जैसा validation है. मेरा यकीन और पुख़्ता हुआ है कि पत्रकारिता का जो तरीका मैंने और दूसरे कई साथी पत्रकारों ने चुना है, वो भले ही मुश्किल है, धीमा है, पर वो लोकतंत्र में कुछ योगदान तो दे रहा है.
आख़िर में, बस इतना ही कि कभी किसी की लकीर छोटी नहीं की. ना किसी से रेस लगाई. फॉलोअर्स के लिए कभी पत्रकारिता की मर्यादा नहीं तोड़ी. किसी तोहमत का जवाब नहीं दिया. कोई झूठी इमेज बिल्डिंग नहीं की. किसी की बात बुरी लगी, तो निजी स्पेस में बता दिया या चुपचाप दूरी बना ली. अपना रास्ता बनाने के लिए बड़ी जगह छोड़कर ज़ीरो से भी शुरूआत की. नज़र की ईमानदारी और शब्दों की ताकत बनाए रखने के लिए ईर्ष्या, लालच और घमंड भी छोड़ने पड़ते है.
और सब अपने आस-पास के लोगों को ही देखकर सीखा है. आप सबने हमेशा इतना प्यार और भरोसा दिया कि ये यात्रा तमाम चुनौतियों के बावजूद सुगम लगी. कितने ही लोगों ने ऐसा जताया जैसे मेरा कुछ हासिल कर लेना उनका अपना कुछ हासिल है. ये एक ऐसी चीज़ है, जो खरीदी नहीं जा सकती. भरोसे की ज़िम्मेदारी भी सबको नहीं मिलती. शुक्रिया


