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NDTV अडानी का है, इसलिए माफी मांगनी पड़ी—वरना सवाल पूछना अब भी गुनाह है!

मनीष दुबे-

मध्य प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय द्वारा एनडीटीवी के पत्रकार अनुराग द्वारी से की गई अभद्र टिप्पणी और उसके बाद सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की घटना ने एक बार फिर भारतीय मीडिया की बदली हुई संरचना और सत्ता–मीडिया संबंधों पर बहस छेड़ दी है।

घटना तब सामने आई जब एनडीटीवी के पत्रकार ने इंदौर में दूषित पानी पीने से हुई मौतों और पीड़ितों को मुआवज़े को लेकर सवाल किया। मंत्री विजयवर्गीय ने कैमरे के सामने पत्रकार के सवाल को “फोकट का सवाल” बताते हुए आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया। वीडियो वायरल होते ही मामला राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया।

माफी क्यों मांगनी पड़ी—यह सवाल अहम है
कैलाश विजयवर्गीय जैसे वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता का सार्वजनिक रूप से माफी मांगना असामान्य माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों और मीडिया जगत में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह माफी केवल पत्रकार के सवाल या जनदबाव का नतीजा थी, या इसके पीछे बदला हुआ मीडिया पावर स्ट्रक्चर भी एक कारण रहा।

यह तथ्य है कि एनडीटीवी अब प्रणव राय के स्वामित्व में नहीं है और अडानी समूह के अधिग्रहण के बाद उसका कॉरपोरेट प्रोफाइल और प्रभाव पहले से अलग हो चुका है। इसी संदर्भ में यह बहस तेज हुई है कि क्या किसी बड़े कॉरपोरेट समूह से जुड़े मीडिया संस्थान के पत्रकार के साथ बदसलूकी करने का राजनीतिक जोखिम अब पहले से अधिक हो गया है।

तुलनात्मक सवाल भी उठ रहे हैं
मीडिया कर्मियों का कहना है कि अतीत में जब एनडीटीवी प्रणव राय के नेतृत्व में स्वतंत्र पत्रकारिता का प्रतीक माना जाता था, तब भी कई बार पत्रकारों के साथ सत्ता पक्ष की बदसलूकी सामने आई, लेकिन सार्वजनिक माफियाँ दुर्लभ थीं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सत्ता आज मीडिया के बदले स्वरूप को लेकर अधिक सतर्क हो गई है।

फैक्ट यह भी है कि माफी से पहले सोशल मीडिया, पत्रकार संगठनों और राजनीतिक विपक्ष की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई। एनडीटीवी के पत्रकार के समर्थन में व्यापक एकजुटता देखने को मिली, जिससे दबाव और बढ़ा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक पत्रकार और मंत्री के बीच संवाद का नहीं, बल्कि उस बिंदु का है जहाँ मीडिया की विश्वसनीयता, कॉरपोरेट स्वामित्व और सत्ता की संवेदनशीलता आपस में टकराती हैं।

इस पूरे प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सवाल पूछने वाले पत्रकार आज भी असहज किए जाते हैं, लेकिन साथ ही यह भी सच है कि जब मीडिया अपने ऊपर हुए हमले को एकजुट होकर उठाता है, तो सत्ता को पीछे हटना पड़ता है।

सवाल अब भी कायम है— क्या यह माफी पत्रकारिता की जीत है, या बदले हुए मीडिया मालिकानों के दौर में सत्ता की रणनीतिक सतर्कता?… उत्तर आने वाले समय में सत्ता और मीडिया के रिश्तों से खुद सामने आएगा।


माफी तो मांगनी ही थी, दरअसल बात ये है कि कैलाश विजयवर्गीय ये भूल गये थे कि एनडीटीवी अब प्रणय रॉय का नहीं बल्कि उनके बाप अडाणी का चैनल है….राजीव तिवारी बाबा, वरिष्ठ पत्रकार

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