कलम से ही डरती हैं मज़हबी राजशाहियां… संदर्भ- पत्रकार खाशोज्जी हत्याकांड

खाशोज्जी की हत्या के खिलाफ उठी अमेरिकी आवाज से अन्य मुस्लिम राजशाहियां भी डरेगी, कलम के सिपाहियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होंगी, अमेरिका-यूरोप की तरह चीन और रूस को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। खतरा यह भी कि कच्चे तेल के दामों में आग भी लग सकती है। अमेरिकी प्रतिबंध लग गये तो फिर प्रतिक्रिया में सउदी अरब तेल उत्पादन घटा देगा। सउदी अरब को ईरान-कतर और सीरिया तथा यमन में तकरार की नीति पर अमेरिकी सहायता जरूरी है। अगर अमेरिका ने साथ छोड दिया तो फिर अरब जगत में सउदी अरब अलग-थलग रह जायेगा, सउदी अरब की अर्थव्यवस्था भी विध्वंस को प्राप्त होगी।

Vishnu Gupt

अमेरिका की दो छवियां हैं जो पूरी दुनिया को दुखी भी करती है, प्रताड़ित भी करती हैं, लूटती भी है और प्रसन्न भी करती है, अमानवीय नीतियों से बचाती हैं, लोकतंत्र की रक्षा करती हैं, अभिव्यक्ति की रक्षा करती हैं, आंदोलनों और अभियानों को गति भी देती हैं। एक छवि उनकी चैधराहट की है, दुनिया का स्वयंभू चैधरी भी है, दुनिया के संसाधनों पर उसकी बूरी नजर रहती है पर दूसरी छवि में वह पालनहार भी है, शांति और सहायता का नायक भी है और लोकतांत्रिक दुनिया का संरक्षणकर्ता भी है।

पर पहली छवि की ही चर्चा होती है और खलनायक की संज्ञा दे दी जाती है। खलनायक की संज्ञा दी ही जानी चाहिए। पर हमें यह तथ्य नहीं भूलना चाहिए जहां पर पूरी दुनिया चूप बैठ जाती है, कानों को बंद कर लेती है वहां पर आवाज लगाने के लिए अमेरिका ही खंडा होता है, दुनिया में जहां भी मानवता को शर्मसार करने वाली घटनाएं घटती हैं, मानवता को लहूलुहान किया जाता है, लोकतंत्र को कूचला जाता है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर तुषराघात होता है वहां पर अमेरिका ही खडा होता है।

अभी-अभी जमाल खाशोज्जी की हत्या का प्रश्न देख लीजिये। जमाल खाशोज्जी की हत्या पर जहां पूरा विश्व चूप है, जहां पर पूरे विश्व के लिए जमाल खाशोज्जी की हत्या कोई चिंता की बात नहीं है, जहां पर पूरे विश्व के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न बेअर्थ है वहां पर सिर्फै और सिर्फ अमेरिका ही अकेला ऐसा देश है जो खड़ा है और यह कहने से भी नहीं चूकता है कि जमाल खाशोज्जी की हत्या के दुष्परिणाम झेलने पडेगे, हत्यारों को बेनकाब किया जायेगा, हत्यारों को सबक सिखाया जायेगा।

जमाल खाशोज्जी की हत्या को लेकर अमेरिका की उठी नाराजगी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्र्ड ट्रम्प की दहाड ने न केवल हत्यारे सउदी अरब के राजशाही सरगना क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की हडिडयों को कंपकपाने के लिए बाध्य किया है बल्कि तुर्की को भी चिंता में डाला है। सुखद परिणाम निकला। सुखद परिणाम क्या है? सुखद परिणाम यह है कि सउदी अरब की राजशाही को हत्या की संलिपत्ता स्वीकार करनी पडी और अपनी गुप्तचर सेवा के प्रमुख सहित अन्य अधिकारियों को पद से बर्खास्त तक करने की मजबूरी उठानी पडी है। फिर भी अमेरिका की कार्यवाहियां काल बनेगी।

अब यहां एक नहीं बल्कि कई प्रश्न उठते हैं। जिसके जवाब की जरूरत है। पहला प्रश्न यह है कि पत्रकार खाशोज्जी थे कौन और पत्रकार खाशोज्जी किस लिए विख्यात थे, क्या खाशोज्जी सही में लोकतंत्र के नायक थे, क्या पत्रकार खाशोज्जी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रतीक थे? दूसरा प्रश्न यह है कि सउदी अरब ने पत्रकार खाशोज्जी हत्या क्यों करायी, सउदी अरब क्या सिर्फ एक पत्रकार की लेखनी को अपने लिए खतरनाक और अस्तित्व सक्रियता के लिए हानिकारक समझ बैठा था, क्या सउदी अरब में लोकतंत्र बहाली आंदोलन जोर पकडेगा, क्या सउदी अरब में राजशाही के खिलाफ बंवडर उठेगा? तीसरा प्रमुख प्रश्न यह है कि सउदी अरब और अमेरिका के सबंध किस हद तक बिगडेंगे, अमेरिका की सहायता के बिना सउदी अरब मजबूती के साथ खडा रह सकता है क्या, अरब में सउदी अरब की शक्ति कितनी घटेगी? चैथा प्रश्न यह है कि चीन-रूस जैसे देश जो अपने आप को दुनिया की चैघराहट कायम करने के लिए तत्पर रहते है, उनके लिए पत्रकार जमाल खाशोज्जी की हत्या कोई चिंता की बात क्यों नहीं होती है?

अब इस प्रश्न पर आते हैं कि जमाल खाशोज्जी कौन थे और उनकी सक्रियता क्या थी? जमाल खाशोज्जी सिर्फ पत्रकार ही नहीं थे, वे सिर्फ वाशिगटन पोस्ट से ही नहीं जुडे हुए थे। सच तो यह था कि जमाल खाशोज्जी की दुनिया में एक पहचान थी, खासकार उनकी पहचान बहुत बडी थी, उनकी पहचान कोई सउदी अरब तक नहीं छिपी हुई थी। उनकी पहचान अरब जगत में विख्यात थी, सउदी अरब छोडने के बाद जमाल खाशोज्जी की पहचान पूरी अमेरिका में फैली हुई थी, यूरोप की पत्रकारिता भी खाशोज्जी की पहचान के साथ सक्रिय थी।

कहने का अर्थ यह है कि जमाल खाशोज्जी की पहचान और जमाल खाशोज्जी की पत्रकारिता सउदी अरब, अरब जगत, अमेरिका और यूरोप तक विख्यात थी। अरब जगत की पत्रकारिता पूरी तरह से मुस्लिम तानाशाही के किले में बंद रहती है। मुस्लिम तानाशाही का गुणगान ही पत्रकारिता का अंतिम निष्कर्ष होता है। मुस्लिम तानाशाही के खिलाफ जाने का अर्थ है सर्वनाश को आमंत्रण देना, सीने में तानाशाही का खंजर भोकवाना, तानाशाही और अंधेरगर्दी की जेलों में सडना तथा मजहबी कोडे खाना।

हजारों-हजार अभिव्यक्ति के सेनानी मुस्लिम तानाशाही और कम्युनिस्ट तानाशाही की जेलों में सड़ने के लिए बाध्य हैं जिनके अंदर निरंतन लोकतंत्र की ज्योति जलती रहती है। उल्लेखनीय यह है कि अधिकतर अरब देशों में मुस्लिम तानाशाही ही पसरी हुई है। जमाल खाशोज्जी का परिवार भी विख्यात रहा है। जमाल खाशोज्जी दुनिया के कुख्यात हथियार विक्रेता अदनान खशोज्जी के भतीजे थे। एक समय पूरी दुनिया में अदनान खशोज्जी का डंका बजता था और हथियार बनाने वाले यूरापीय देश और अमेरिका अदनान खशोज्जी की उंगलियों पर नाचते थे। अदनान खाशोज्जी हथियारों की बिक्री और कमीशन में माहिर थे। दुनिया में रसूख रखने वाले परिवार का कोई विख्यात आदमी की जब हत्या होगी तो वह हत्या भी कैसे नहीं चर्चित होगी?

जमाल खाशोज्जी की हत्या तो ऐसे तुर्की में हुई है जहा पर वे सउदी अरब के वाणिज्य दूतावासा में नागरिकता से संबंधित कागजात हासिल करने गये थे। तुर्की स्थित सउदी अरब के वाणिज्य दूतावासा के अंदर ही जमाल खाशोज्जी की हत्या होती है, हत्या के बाद उसके शव को तहस-नहस कर विलुप्त कर दिया गया। जब जमाल खाशोज्जी के लापाता होने के बाद जांच हुई तब पता चला कि सउदी अरब ने एक साजिशपूर्ण ढंग से जमाल खाशोज्जी की हत्या करायी है। तुर्की की पुलिस पहले दिन से ही यह कह रही थी कि हत्या सउदी अरब दूतावास के अंदर ही हुई है। पहले सउदी अरब हत्या में अपनी सलिप्तता से इनकार करता रहा था और तुर्की की पुलिस के आरोपों का खंडन करता रहा था। पर जब अमेरिकी दहाड सामने आयी, अमेरिकी पत्रकारिता एक साथ मिलकर प्रहार करने के लिए सक्रिय हो गयी, डोनाल्ड ट्रम्प की दहाड सामने आयी तब जाकर सउदी अरब ने हत्या में अपनी सलिप्तता स्वीकार करने के लिए बाध्य हुआ।

सउदी अरब ने जमाल खाशोज्जी की हत्या क्यों करायी? मुस्लिम तानाशाही सबसे ज्यादा घृणा और हिंसा अभिव्यक्ति की आजादी पर करती है। अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने के लिए किसी भी प्रकार की हिंसा को चुनने के लिए तैयार होती है, हिंसक और घृणात्मक कार्रवाई करने से भी नहीं हिचकती है। मुस्लिम तानाशाही हो या फिर कम्युनिस्ट तानाशाही, इसके अंदर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात सोची भी नहीं जा सकती है। सउदी अरब से लेकर चीन तक इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं और यह जाने जा सकते है कि तानाशाही की घेराबंदी में मानवता और अभिव्यक्ति की आजादी किस प्रकार से बंधित है, प्रताड़ित है, हिंसक रूप से शिकार है। जमाल खाशोज्जी सउदी अरब के लोकतांत्रिक करण के पक्षधर थे। सउदी अरब के राजशाही शासक का्रउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की नीतियों के भी वे आलोचक रहे थे। मोहम्मद बिन सलमान ने सउदी अरब के अंदर में कई ऐसे हथकंडे अपनाये हैं जिसके दुष्परिणाम गंभीर हुए हैं। जमाल खाशोज्जी को पहले ही खतरे का अंदेशा था। इसीलिए वे सउदी अरब को छोड कर अमेरिका चले गये थे।

डोनाल्र्ड ट्रम्प ने यह नहीं देखा कि सउदी अरब में उसका हित प्रभावित होगा। फिर भी उसने आवाज उठायी और सउदी अरब को झुकने के लिए बाध्य किया है। अभी भी डोनाल्र्ड ट्रम्प संतुष्ट नहीं है। ट्रम्प ने सउदी अरब पर प्रतिबंध लगाने की बात तक कह डाली है। साल भर पूर्व ही सउदी अरब ने अमेरिका से 110 बिलियन डालर्स का हथियार सौदा किया था। सउदी अरब ने अप्रत्यक्ष तौर पर धमकी दी है कि अगर अमेरिका ने कार्यवाही की और प्रतिबंध लगाये तो फिर वह चीन और रूस के साथ सुरक्षा समझौता करेगा और चीन-रूस से हथियार खरीदेगा। इसके साथ ही साथ तेल का उत्पादन घटा देगा जिससे तेल के बाजार में आग लग जायेगी।

सउदी अरब के रास्ते आसान नहीं हैं। सउदी अरब यमन और सीरिया में उलझा हुआ है, सउदी अरब को अपनी सुरक्षा और अस्तित्व के लिए अमेरिकी सहायता और संरक्षण की जरूरत है। सउदी अरब को ऐसी हत्याओं की नीति पर नही चलनी चाहिए। एक-दो कलम के सिपाहियों की हत्या से कोई विचार दफन नहीं हो जाता है। जमाल खाशोगी के हत्यारों को सजा तो मिलनी ही चाहिए और ऐसी हत्याओं पर रोक लगनी चाहिए। जमाल खाशोज्जी की हत्या के खिलाफ अमेरिकी दहाड से अन्य मुस्लिम तानाशाही वाले देशों को भी सबक मिलेगा और इस तरह की हत्या पर डर भी कायम होगा।

विष्णु गुप्त हिन्दी के विख्यात लेखक हैं और इनकी कई पुस्तकें आ चुकी हैं। इनका संपर्क नंबर 9315206123 है।

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