
मामला शपथपत्र की जरूरत और उसकी गंभीरता का भी है
संजय कुमार सिंह
आज ज्यादातर अखबार सरकार के पक्ष में माहौल बनाने में लगे हैं। वोट चोरी के आरोपों का क्या हुआ, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ कहां है या उनके गायब होने का सवाल क्यों है, उनके इस्तीफे से संबंधित सवालों का क्या हुआ से अलग, भारतीय जनता पार्टी, उसकी सरकार और प्रधानमंत्री पर लगने वाले आरोपों को कम महत्व देना या महत्व ही नहीं देना आम है। राहुल गांधी और वोटचोरी के आरोप के मद्देनजर सीएसडीएस के संजय कुमार के बहाने उनके खुलासे को खारिज करने वाली व्यवस्था में मीडिया सरकार का प्रचार ही करता है। किसानों के आंदोलन को कुचलने और उनका दमन करने वाली सरकार अब कह रही है कि किसानों पर आंच नहीं आने देंगे (देशबन्धु)। किसानों को दिल्ली पहुंचने से रोकने के लिए गोली चलाने से लेकर सड़कों पर कील बिछाये जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वादा किया है कि किसानों का हित उनके लिये सर्वोपरि है। इसमें यह खबर नहीं है कि ‘तपस्या में कमी रह गई होगी’ के बाद क्या हुआ या यह वादा चुनाव जीतने के लिए तो नहीं है। सरकार जब कॉलेजियम सिस्टम के खिलाफ है तब आज हिन्दुस्तान टाइम्स में मुख्य न्यायाधीश के रिश्तेदार को जज बनाने के प्रस्ताव से संबंधित खबर पहले पन्ने पर है। आज ही खबर है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की स्नातक डिग्री पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सूचना आयोग के आदेश को खारिज किया। इसका मतलब यह हुआ कि प्रधानमंत्री की डिग्री के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय का रिकार्ड सार्वजनिक नहीं किया जायेगा। यह आदेश तब आया है जब प्रधानमंत्री की डिग्री उनके दो विश्वासपात्र, उस समय के भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली सार्वजनिक कर चुके हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट में दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हो चुके हैं। जाहिर है यह सब प्रधानमंत्री की इच्छा के बगैर नहीं हुआ होगा। यह तब हुआ है जब राहुल गांधी ने यह चुनौती दे रखी है कि चुनाव आयोग उन्हें डिजिटल मतदाता सूची दे तो वे साबित कर देंगे कि पिछले चुनावों में वोट चोरी हुई। प्रधानमंत्री पर भी वोट चोरी से चुनाव जीतने के आरोप हैं। वोट चोरी के आरोप भाजपा नेता अनुराग ठाकुर ने भी लगाये हैं। जाहिर है कि चुनावों में अगर वोट चोरी होती है या हुई है तो उसमें सुधार की जरूरत है। वोट चोरी का लाभ उठाकर प्रधानमंत्री बनने वाले के पद पर रहते हुए यह संभव नहीं है कि सुधार निष्पक्ष हो। इसलिये एसआईआर के नाम पर जो हो रहा है वह दिख रहा है। भले खबर कम छप रही है। दूसरी ओर, स्थिति को सरकार के पक्ष में करने के लिए सरकार पीएम, सीएम या मंत्री के जेल में रहने पर उनका पद स्वयं चले जाने का विधेयक पेश किया गया है। घटिया राजनीति की सस्ती चाणक्य नीति वाला यह विधेयक जैसा है और इसका जैसे प्रचार किया जा रहा है वही सरकार के हित साधने के लिए पर्याप्त है। इसमें यह मुद्दा तो दब ही गया है कि प्रधानमंत्री को यह साबित करना चाहिये कि वे वोट चोरी से नहीं जीते हैं। तय है कि इतने से ही बात नहीं बनेगी और अगर प्रधानमंत्री के चुनाव में वोट चोरी साबित नहीं हो तो यह भी साबित होता चाहिये राजग के बहुमत के लिये आवश्यक 25 सीटें भी वोट चोरी से नहीं जीती गई हैं। यह सब चुनाव आयोग का काम है और अगर वह खुद नहीं कर रहा है तो प्रधानमंत्री को स्वयं यह पेशकश करनी चाहिये ताकि डिजिटल वोटर लिस्ट जारी कर दिये जायें। पहले आरोप लगने पर इस्तीफा देने का रिवाज था ताकि जांच में पद पर रहने का लाभ नहीं मिले। अब इस्तीफा तो छोड़िये जांच की बात भी नहीं होती। इसके उलट जिसे चाहें उसे किसी मामले में फंसा कर, जेल में रखकर पद से हटाने का कानून बनाने के लिए विधेयक पेश किया गया है। न सिर्फ उसकी जरूरत बताई जा रही है बल्कि उसकी प्रशंसा भी हो रही है जबकि ऐसे कानून की जरूरत इसीलिए है कि भाजपा में इस्तीफे नहीं होते। 2014 से पहले की कांग्रेस सरकार में हुए थे या लिये गये थे।
अब जब सरकार अपने मुखिया के मामले में आरटीआई कानून के तहत दिये गये आदेश को नहीं मान रही है। बचाव के लिए सॉलिसिटर जनरल मैदान में उतर गये तब मशहूर अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक्स पर सवाल किया है, दिल्ली विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री की डिग्री क्यों छिपानी चाहिए? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इसके खुलासे पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए? क्या इसलिए कि उन्हें थर्ड डिवीजन मिला है? या इसलिए कि डिग्री है ही नहीं? जाहिर है कि प्रधानमंत्री ने चुनाव लड़ने के लिए की गई अपनी घोषणा में दिल्ली विश्वविद्यालय से 1978 में स्नातक और गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद से 1983 में मास्टर ऑफ आर्ट्स तक शिक्षित होने की घोषणा की है और इसका शपथपत्र है। डिग्री अगर सार्वजनिक हो जाये तो सर्वश्रेष्ठ स्थिति में यह प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होना बतायेगी या तृतीय श्रेणी में। डिग्री में उत्तीर्ण बताने के अलावा अंक तो होते नहीं है और ना कोई अंकपत्र देखना चाहता है। जो डिग्री सार्वजनिक है उसके अनुसार, प्रमाणित किया जाता है कि सन 1978 में परीक्षा के उपरांत कला स्नातक की उपाधि के योग्य सिद्ध होने पर नरेन्द्र दामोदर दास मोदी को 1979 के दीक्षांत समारोह में उक्त उपाधि दी गई है। श्रेणी में तृतीय भी लिखा है। जाहिर है, विश्वविद्यालय जो डिग्री देगा उसमें इससे ज्यादा कुछ होना ही नहीं है। इसलिए उसमें निजता को कोई मामला हो ही नहीं सकता है।
दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश गुजरात विश्वविद्यालय के लिए हो न हो और अभी वह मुद्दा भी नहीं है। तथ्य है कि यह उनकी डिग्री एंटायर पॉलिटिकल साइंस के लिए है और स्नातकोत्तर की डिग्री फर्स्ट क्लास की है। इसपर लिखा है कि यह डुपलीकेट कॉपी है। इन दोनों डिग्रियों को जारी किये जाने के बाद यह आरोप लगा था कि इनमें कई सारी जबरदस्त गड़बड़ियां हैं। इनमें एक यह भी था कि गुजरात विश्वविद्यालय की डिग्री पर जिस केएस शास्त्री के दस्तखत हैं उनका निधन पहले ही हो गया। बाद में फैक्ट चेक करने वालों ने बताया कि यह गलत सूचना है और उस समय वे कुलपति थे। दूसरी ओर दिल्ली विश्वविद्यालय ने अधिकृत तौर पर कहा है कि जो डिग्री सार्वजनिक है वह सही है और विश्वविद्यालय के पास सभी संबंधित रिकार्ड हैं। तब इस गलती को मामूली कहा गया था कि पास करने का वर्ष 1979 लिखा है जबकि यह एक साल पहले होना चाहिये। जाहिर है मामला प्रधानमंत्री की निजता का है ही नहीं। वह तो पहले से सार्वजनिक है। मामला दिल्ली विश्वविद्यालय के इस बयान का है कि डिग्री सही है और उसके पास सारे रिकार्ड हैं। प्रधानमंत्री ने जब अपनी शैक्षिक योग्यता की जानकारी चुनाव लड़ने के लिए दी है और इसमें धन-संपत्ति का विवरण, पैन नंबर, मोबाइल नंबर, पता, सब लिखा है और सार्वजनिक है तो मामला प्रधानमंत्री से संबंधित हो ही नहीं सकता है। मामला दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रमाणन और पुष्टि का है कि कैसे उसने तमाम गलतियों और दोष के बावजूद इसे सही कहा है। अगर यह डिग्री सही है तो और लोगों की दी गई होगी (क्योंकि नाम हाथ से लिखे गये हैं) पर ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है। संभव है दिल्ली विश्वविद्यालय ने दबाव में ऐसा कहा हो पर यह भी खबर है कि उसपर कोई दबाव नहीं है।
ऐसे में एक संभावना यह बनती है कि दिल्ली (और गुजरात) विश्वविद्यालय ने 2016 में उस समय के प्रधानमंत्री के लिये डिग्री की कॉपी और डुपलीकेट कॉपी जारी की हो जिसमें गलतियां हैं। विश्वविद्यालय ने यह गलती क्यों की, सिर्फ प्रधानमंत्री के मामले में हुई या और भी ऐसी डिग्रियां हैं – जांच का विषय हैं। वह इसलिए भी कि अगर कोई आम पूर्व छात्र अपनी इस डिग्री को पेश करे तो फर्जी माना जा सकता है और उसे परेशान होना पड़ सकता है। ऐसे ही मामले में दिल्ली के कानून मंत्री को पद छोड़ना पड़ा था, गिरफ्तार किया गया था और परेशान होना पड़ा था। जितेंद्र सिंह तोमर ने पुलिस रिमांड पर भेजे जाने के बाद इस्तीफा दे दिया था। तब उसे मंजूर भी कर लिया गया था। यह जुलाई 2015 का मामला है। बाद में खबर आई थी कि तिलका माझी भागलपुर यूनिवर्सिटी (टीएमबीयू) ने दिल्ली के पूर्व कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर की एलएलबी की डिग्री रद्द कर दी थी। इसलिए, डिग्री का यह मामला दिल्ली विश्वविद्यालय से भी संबंधित हो सकता है जो प्रधानमंत्री की आड़ में फर्जी डिग्री देने के अपने धंधे का बचाव कर रहा है और आम आदमी पार्टी के नेता के मामले में बिहार का विश्वविद्यालय नहीं कर पाया था। बाद में अगर अरविन्द केजरीवाल ने गिरफ्तार किये जाने पर इस्तीफा नहीं दिया तो वे इस भेदभाव को जानते थे और सुप्रीम कोर्ट ने भी कार्रवाई नहीं की क्योंकि कानून नहीं था। अब प्रधानमंत्री कानून बनाकर अपनी रणनीति को स्थापित करना चाहते हैं। चुनाव आयोग भी ऐसा ही करता दिख रहा है और यह दूसरी जगह भी है पर अभी वह मुद्दा नहीं है लेकिन ज्यादातर अखबार-मीडिया इसे या तो समझ नहीं रहे हैं या उनकी खबरों से दिख नहीं रहा है। यह सब आम जनता भी समझे – इसके लिये कुछ नहीं हो रहा है।
सरकार ने विश्वविद्यालयों द्वारा फर्जी डिग्री जारी किये जाने के संभावित मामले को प्रधानमंत्री की निजता से जोड़कर संभवतः फर्जी डिग्री के धंधे पर आंख मूंद लिया है। और भी लोगों की डिग्री फर्जी होने की खबरें हैं और जितेन्द्र तोमर की गिरफ्तारी के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के उस समय के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया कि भारत में 30 प्रतिशत वकील फर्जी हैं और उनके पास फर्जी कानून की डिग्रियां हैं। श्री मिश्रा चेन्नई में बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित लॉयर्स मीट, 2015 में उपस्थित लोगों को संबोधित कर रहे थे, जब उन्होंने कहा कि यह कानूनी पेशे की गुणवत्ता में गिरावट का एक प्रमुख कारण है। इसे सार्वजनिक डिग्री को सार्वजनिक न करने के फैसले से जोड़कर देखें तो पुरानी बात अब गंभीर लगती है। वह इसलिये भी कि मामला प्रधानमंत्री की डिग्री का है ही नहीं। यह डिग्री देखने दिखाने का मामला भी नहीं है। असल में यह मामला शपथपूर्वक झूठ बोलने के अंदेशे की पुष्टि का है। झूठी शपथ देना या शपथपूर्वक झूठ बोलना भारतीय कानून के तहत एक गंभीर अपराध है। यह भारतीय दंड संहिता की धारा 191, 193 आदि के अंतर्गत आता है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर कोर्ट में या किसी अन्य कानूनी कार्यवाही में झूठ बोलता है, तो साधारण केस में अधिकतम 7 साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।
अपनी किताब, ईवीएम वाशिंग मशीन में धुली से संबंधित चर्चा और पॉडकास्ट के साथ बिहार में एसआईआर पर चर्चा के क्रम में मैंने कई बार कहा और लिखा है कि चुनाव आयोग को शपथपत्र की सत्यता की पुष्टि करनी चाहिये। चुनाव आयोग जब राहुल गांधी से शपथपत्र मांग रहा था तब अनुराग ठाकुर से नहीं मांगा और समाजवादी पार्टी के 18,000 शपथपत्रों के मामले में गलत बयानी तो मेरा मानना है कि उसे प्रधानमंत्री की डिग्री (और अब वोट चोरी) से संबंधित विवाद के क्रम में प्रधानमंत्री की घोषणा और शपथपत्र की पुष्टि करनी चाहिये। चुनाव आयोग यह काम नहीं करेगा लेकिन कल इस संबंध में तथ्य ढूंढ़ते हुए मुझे एक अगस्त 2014 की एक सरकारी विज्ञप्ति मिली। यह चुनाव लड़ने के लिये की गई घोषणा के तुरंत बाद की है और तब डिग्री विवाद शुरू भी नहीं हुआ था। जाहिर है, जब तक सत्ता में रहें तब तक के लिए तो था ही। बाकी के लिए उनकी सरकार चुनाव आयुक्त को कार्यकाल खत्म होने पर किसी कार्रवाई से मुक्त रखने का कानून बना ही चुकी है और पांच बजे के बाद पड़ने वाले वोट से संबंधित शंका को दूर करने के लिए 45 दिन बाद वीडियो नहीं देने का भी कानून बनाया है। ऐसे में आम आदमी के लाभ के लिए हलफनामों और सत्यापन के स्थान पर स्व-प्रमाणन को प्रोत्साहित किये जाने की प्रधानमंत्री की यह कार्रवाई अब रेखांकित की जानी चाहिये जो अभी का मीडिया नहीं करेगा। इसके तहत सभी केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों से स्व-प्रमाणन का प्रावधान करने और कानून द्वारा अनिवार्य न होने वाले हलफनामों को समाप्त करने का अनुरोध किया गया था। कानून द्वारा अनिवार्य मामलों का हश्र हम देखते रहे हैं पर वह अलग मुद्दा है। विज्ञप्ति के अनुसार नागरिक-हितैषी पहल के तहत, केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों और विभागों, तथा सभी राज्य सरकारों से हलफनामों के स्थान पर दस्तावेजों के स्व-प्रमाणन का प्रावधान करने का अनुरोध किया गया है। स्व-प्रमाणन पद्धति के तहत, अंतिम चरण में मूल दस्तावेज प्रस्तुत करना आवश्यक है। पर नरेन्द्र मोदी जैसे प्रधानमंत्री के लिए वह अंतिम चरण कभी नहीं आयेगा। दिल्ली हाईकोर्ट के कल के आदेश के आलोक में ऐसा कहा जा सकता है।
इससे लगता है कि विरोधियों को सफलतापूर्वक कुचलने, वोट चोरी से चुनाव जीतने के बाद ताजा विधेयक से सरकार भविष्य में सत्ता में बने रहने की पुख्ता व्यवस्था करना चाहती है। आरटीआई कानून समेत जो मामले उसे परेशान करते रहे हैं उससे स्थायी तौर पर निपटने की कोशिश भी चलती रही है। अमर उजाला में आज हाईकोर्ट के आदेश की खबर पहले पन्ने पर तीन कॉलम में है। अखबार ने बताया है कि, सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की हर निजी जानकारी साझा नहीं की जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की डिग्री नहीं होगी सार्वजनिक। अकेले नवोदय टाइम्स में खबर पहले पन्ने पर नहीं है। देशबन्धु में यह खबर शीर्षक समेत 14 लाइन में सिंगल कॉलम की है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह दो कॉलम की खबर है। शीर्षक यही है, हाईकोर्ट ने मोदी की डिग्री का खुलासा करने के आदेश खरिज किया। इंडियन एक्सप्रेस ने भी बताया है कि हाईकोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री की डिग्री निजी सूचना है, दिल्ली विश्वविद्यालय को खुलासा करने की जरूरत नहीं है। द हिन्दू में यह खबर चार कॉलम में है। यहां सूचना है, मोदी की डिग्री का विवाद : दिल्ली हाईकोर्ट दिल्ली विश्वविद्यालय के रिकार्ड देखने की सीआईसी की अनुमति को खारिज किया। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह दो कॉलम की खबर है। शीर्षक है, हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री की डीयू की डिग्री का खुलासा करने के सीआईसी के आदेश को खारिज किया। द टेलीग्राफ में यह खबर अंदर के पन्ने पर होने की छोटी सी सूचना पहले पन्ने पर है।
कुल मिलाकर, जो स्थितियां हैं उससे लगता है कि व्यवस्था के लिए कानून के उपयोग, दुरुपयोग और उससे डर का मामला ज्यादा है। मैं कानून का जानकार नहीं हूं पर एक जागरूक नागरिक के रूप में कानून, उसके उपयोग-दुरुपयोग और समाज पर उसके प्रभाव को गंभीरता से देख रहा हूं। उद्योग व्यवसाय के लिए अगर तथाकथित लाल फीता शाही को खत्म करना जरूरी है तो एक अच्छे समाज के लिए मनुष्य के जीवन में कानून का दखल और दखल की संभावना या गुंजाइश भी न्यूनतम होनी चाहिये। दुर्भाग्य से उलटा हो रहा है। आम आदमी पार्टी के नेताओं के साथ जो किया गया और अब जो नया विधेयक पेश किया गया है उसमें एक खास विचारधारा के लोगों के अलावा कोई राजनीति में आयेगा ही नहीं। जब पूर्व राष्ट्रपति के गायब होने की चिन्ता सर्वोपरि होनी चाहिये तो आज इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के अनुसार, उनकी पत्नी पारिवारिक संपत्ति का काम देख रही है और पिछले दिनों परिवार के लिए खरीदी गई नई कार से जयपुर गई आई हैं। आश्चर्यजनक रूप से यह मीडिया की चिन्ता नहीं है और सरकार के प्रचार की कई खबरें हैं। आज दि एशियन एज (और दूसरे अखबारों में भी) प्रधानमंत्री का कहा प्रमुखता से छपा है, टैरिफ को लेकर भारत में दबाव बढ़ सकता है, उसे झेलने के लिए तैयार हूं। सरकार जब तमाम काम ढंग से नहीं कर रही है, मीडिया का पक्षपात साफ दिख रहा है तब द हिन्दू की लीड है, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह सोशल मीडिया पर आचरण के नियमन के लिए दिशानिर्देश तय करे। स्थिति यह है कि सरकार सोशल मीडिया की आजादी से परेशान है। जो खबरें अखबारों में नहीं छपती हैं वो सोशल मीडिया के जरिये लोगों तक पहुंच जाती है तो सरकार उसे नियंत्रित करने के लिए व्याकुल है। आज कुछ सोशल मीडिया इनफ्लूएंसर से संबंधित खबर छपी है। इसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है कि समय रैना औऱ दूसरे इनफ्लूएंसर दिव्यांगों से माफी मांगें। इससे पहले एक कार्टूनिस्ट को भी माफी मांगनी पड़ी है। मुझे लगता है कि अगर इन लोगों ने अपराध किया है तो सजा दी जानी चाहिये। माफी मांगने के लिए कहना या जुर्माना लगाना सजा सार्वजनिक करना और आसान बताना है। इससे अपराध नहीं रुकने वाला है। खासकर तब जब कानूनी कार्रवाई ही सजा है। मुझे लगता है कि अदालत का काम समय पर न्याय करना है। लेकिन हाल में अदालत ने राहुल गांधी से कहा था कि वे सच्चे भारतीय होते तो ऐसा नहीं करते। इसकी आलोचना भी हुई थी। आज भी खबर है कि कमर्शियल सामग्री में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। मैं नहीं जानता कि मामला क्या और अखबारों की प्रस्तुति से अब यह स्पष्ट भी नहीं होता है। वैसे भी मैं अदालत के फैसलों पर नहीं, खबरों पर टिप्पणी करता हूं। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के साथ हाईलाइट किया हुआ अंश है, “…जब हम दूसरों पर हँसने लगते हैं, तो यह संवेदनशीलता का उल्लंघन बन जाता है। भारत एक विविधतापूर्ण देश है जिसमें अनेक समुदाय हैं। जब आप साधारण रंगभेद के आधार पर हास्य उत्पन्न करते हैं, तो यह एक समस्या बन जाती है” और “कोई नीति किसी विशेष घटना की प्रतिक्रिया नहीं हो सकती। [सरकार] को भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखना होगा। इसे व्यापक आधार पर होना चाहिए और नीति बनाते समय मामले के सभी पहलुओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए।” मुझे लगता है कि इस तरह हाईलाइट करके और प्रधानमंत्री द्वारा भाषणों में उपयोग करके भी, इन टिप्पणियों का उपयोग माहौल बनाने या बड़े स्तर पर हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए किया जाता है। जहां तक सरकार के नीति बनाने की बात है, यह अंधाधुंध और मनमाना नहीं हो सकता है। संवैधानिक चो होना ही चाहिये लेकिन पीएमएलए कानून की संवैधानिकता पर विचार ही नहीं हो पाया है और उसका उपयोग या दुरुपयोग हो रहा है। हाल के विधेयक से यह स्पष्ट है। सामाजिक व्यस्था बनाने का काम कानून से नहीं जागरूकता से होगा। सवाल करने वालों को रोककर उसका रास्ता बंद कर दिया गया है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


