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अयातुल्ला खामेनेई की मौत की ख़बर पढ़ते-पढ़ते एंकर रो पड़ी! देखें वीडियो

पुष्य मित्र-

उल्टी दिशा में दुनिया…..अयतुल्लाह ख़मेनाई बुरे शासक हो सकते हैं, मगर उन्हें सत्ता से हटाना ईरान की जनता का काम था. अमेरिका का नहीं. यह ठीक उसी तरह है कि ट्रम्प या मोदी बुरे शासक हो सकते हैं, मगर उन्हें हटाना अमेरिका या भारत के नागरिकों की जिम्मेदारी है.

भारत में पीएम मोदी के विरोधी बड़ी संख्या में हैं, मगर किसी रोज अमेरिका किसी वजह से पीएम मोदी से नाराज हो जाये तो इसका मतलब यह नहीं कि वह मोदी विरोधियों का नाम लेकर भारत पर हमला करे और उनकी हत्या करने की कोशिश करे.

पहले मध्ययुगीन बर्बरता और फिर यूरोप की औद्योगिक क्रांति के उपनिवेशवाद दोनों को मात देते हुए दुनिया ने बहुत लंबी लड़ाई लड़कर लोकतंत्र, मानवाधिकार और विश्व बंधुत्व के सिद्धांतों को सार्वजनिक मान्यता दी है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह विचार मजबूती से स्थापित हुआ और इस बेहतर होती दुनिया में कमजोर मनुष्य ही नहीं कमजोर देशों के लिए भी अमन-चैन स्थापित हुआ. वैश्विक समाज ने यह सुनिश्चित किया कि कोई मजबूत ताकत किसी कमजोर देश को बेवजह दबाने की कोशिश नहीं करेगा.

मगर जिस तरह से कल अमेरिका ने ईरान पर हमला कर उसके सुप्रीम लीडर अयतुल्ला ख़मेनाई और उसके परिवार की हत्या की है, वह दरअसल समता और विश्व बंधुत्व की उस सर्वमान्य विचार की हत्या है, जो इस असंतुलित दुनिया में शांति की गारंटी की तरह था.

और अगर वैश्विक बिरादरी इस घटना की तीखी निंदा कर अमेरिका को कटघड़े में खड़ा नहीं करता है, तो समझना चाहिए कि दुनिया उल्टी दिशा में चलने लगी है. और इस उल्टी दिशा में चल रही दुनिया में कोई निश्चिंत नहीं होगा, चाहे वह कितने भी मिसाइल और परमाणु हथियार क्यों न जुटा ले. कोई सरफिरा शासक किसी दिन इसी तरह दुनिया की शांति की वाट लगा सकता है.

इस दुनिया में शांति एक बुनियादी जरूरत है, क्योंकि शांति की छाव में ही समानता स्थापित हो सकती है और समानता से ही सबकी उन्नति मुमकिन है. और शांति के लिए सद्भाव सबसे अधिक जरूरी है. ताकत बस एक भ्रम है. कभी ब्रिटेऩ इस दुनिया का सिरमौर था, आज अमेरिका है, तो कल चीन हो सकता है.

मगर दुनिया ताकतवर मुल्कों की मनमानी के बीच आगे नहीं बढ़ सकती. इस दुनिया में एक नैतिक-सामाजिक दबाव जरूरी है. हम उसे गंवा कर सिर्फ पछताएंगे. जो हुआ अच्छा नहीं हुआ.


खुमैनी की न्यूज पढ़ते पढ़ते एंकर रो पड़ी। घोषणा की अयातुल्ला अली खामेनेई नहीं रहे। और फिर चेतावनी—
“बदला आएगा… बहुत जल्द आएगा…” दुनिया सांस रोके देख रही है। -अपूर्व भारद्वाज


अमित चतुर्वेदी-

अयातुल्ला ख़ामेनेई, एक ‘थियोक्रेसी’ के अंत का आगाज़…अयातुल्ला अली ख़ामेनेई की मृत्यु केवल एक नेता का जाना नहीं, बल्कि उस ‘इस्लामिक रिवोल्यूशन’ के सबसे लंबे अध्याय का समापन है, जिसने 35 वर्षों तक ईरान और पूरे मध्य-पूर्व की दिशा तय की। 1989 में सत्ता संभालने वाले ख़ामेनेई ने ‘विलायत-ए-फ़क़ीह’ (धार्मिक न्यायविद का शासन) के ज़रिए धर्म और राज्य को एक ऐसे कट्टर सांचे में ढाला जहाँ असहमति सीधे ‘ईश-निंदा’ बन गई।

ख़ामेनेई का शासन महज़ राजनीतिक नहीं, बल्कि एक ‘वैचारिक प्रोजेक्ट’ था। IRGC और नैतिक पुलिस के ज़रिए राज्य ने नागरिकों के निजी जीवन और लिबास तक पर नियंत्रण किया। ईरान, जो कभी बौद्धिक खुलापन रखता था, एक ऐसे ढांचे में सिमट गया जहाँ ‘अल्लाह के खिलाफ युद्ध’ जैसे आरोपों का इस्तेमाल विपक्ष को कुचलने के लिए हुआ।

ईरान की घरेलू खुशहाली की कीमत पर ख़ामेनेई ने अपनी ‘वैचारिक सीमाओं’ का विस्तार किया। हिज़्बुल्लाह, हूती और हमास जैसे समूहों को समर्थन देकर उन्होंने ‘शिया क्रेसेंट’ बनाने की कोशिश की, लेकिन बदले में ईरान को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और आर्थिक बदहाली की गहरी खाई में धकेल दिया।

आज सड़कों पर, विशेषकर महिलाओं द्वारा जो जश्न देखा जा रहा है, वह दशकों की घुटन भरी खामोशी का विस्फोट है। ‘महिला, जीवन, स्वतंत्रता’ जैसे आंदोलनों ने पहले ही इस नींव को हिला दिया था। यह दृश्य इस तानाशाही मिथक को तोड़ते हैं कि ‘सख्त नियंत्रण ही स्थिरता की गारंटी है’।

ख़ामेनेई का अंत महज़ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि उस सोच की विफलता का क्षण है जिसने मज़हब को दमन का हथियार बनाया। उम्मीद है कि ईरान अब केवल अपना ‘चेहरा’ नहीं, बल्कि अपना ‘चरित्र’ बदलेगा, ताकि सत्ता का बोझ उठाने वाली जनता को खुली हवा मिल सके।

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