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फोटो खींचने के लिए दस से बीस किमी तक साइकिल से ही जाते थे किशनजी

: शून्य से शिखर की यात्रा तय की कृष्ण मुरारी किशन ने : कृष्ण मुरारी किशन नहीं रहे। सुन कर अवाक रह गया। अभी दस दिन पहले ही उनसे मुलाकात हुई थी। उनके बढते पेट के आकार को लेकर हंसी मजाक का दौर भी चला। खाते पीते घर की निशानी है पेट, कह कर उन्होंने ठठाकर हंसने को मजबूर कर दिया था। कौन जानता था कि इतनी जल्दी हम लोगों से विदा ले लेंगे। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि सन 70 के दशक में हमने पत्रकारिता आरंभ की तो उन्होंने छायाकारिता। टूटही बिना ब्रेक की सायकिल उखड़ी सीट पर मोटा सा तकिया और कंधे पर झोला। शुरुआती यही पहचान थी किशनजी की।

: शून्य से शिखर की यात्रा तय की कृष्ण मुरारी किशन ने : कृष्ण मुरारी किशन नहीं रहे। सुन कर अवाक रह गया। अभी दस दिन पहले ही उनसे मुलाकात हुई थी। उनके बढते पेट के आकार को लेकर हंसी मजाक का दौर भी चला। खाते पीते घर की निशानी है पेट, कह कर उन्होंने ठठाकर हंसने को मजबूर कर दिया था। कौन जानता था कि इतनी जल्दी हम लोगों से विदा ले लेंगे। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि सन 70 के दशक में हमने पत्रकारिता आरंभ की तो उन्होंने छायाकारिता। टूटही बिना ब्रेक की सायकिल उखड़ी सीट पर मोटा सा तकिया और कंधे पर झोला। शुरुआती यही पहचान थी किशनजी की।

10 से 20 किमी की दूरी तक फोटो लेना हो तो सायकिल ही उनकी सवारी थी। पटना की घनी आबादी वाले दरियापुर गोला में उनके पिताजी पंक्चर बनाते थे। बेटा किषन को यह रास नहीं आया और उसने पकड ली दूसरी राह। उस वक्त के ख्यातिनाम छायाकारों में बनारस फोटो गैलरी के मो इश्तियाक अहमद, सत्यनारायण, कृष्णानंदजी आदि थे। आर्यावर्त से अपने करियर को शुरू करने वाले किशन बड़े ही मिलनसार प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। मुझे याद है जब 1975 में पटना में बाढ़ आयी थी, पूरा पटना पानी में डूबा था। संचार के सारे साधन ठप। सभी अखबारों का प्रकाशन बंद। कमर भर पानी में हेल कर मैं उनके घर पहुंचा और बाढ़ की कुछ तस्वीरों की अपेक्षा की। जरा सोचिये। निगेटिव से फोटो बना कर चूल्हे पर उसे सुखाया और 10-12 तस्वीरें दीं जो वाराणसी से प्रकाशित ‘आज‘ में छपा।

उस वक्त ‘आज‘ का मैं पटना नगर से संवाददाता था। उत्तर भारत के किसी भी अखबार के लिए पहली रिपोर्ट थी जो पटना डेट लाइन से छपी। वाराणसी तक खबर लेकर मैं कैसे पहुंचा, इसकी एक अलग कहानी है। किशनजी पटना सिटी स्थित मेरी कुटिया पर बराबर आया करते थे। इस उम्मीद से कि गुरुद्वारा में मनाये जाने वाले गुरुपर्व को कवर करने का एक मौका मिल जाये। एक मौका का मतलब था उस समय का दो हजार रुपये का भुगतान। संयोग से पूज्य पिताश्री स्वर्गीय रामजी मिश्र मनोहरजी के जरिये उन्हें यह काम चार पांच बार मिला और उसके बाद उनकी गाड़ी पटरी पर आ गयी।

इसके बाद छिड़ा सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन में उनका महत्व और भी बढ़ा। सबसे बड़ी बात यह थी उनमें कि वे किसी का तिरस्कार नहीं करते थे। चाहे छोटा पत्रकार या नामचीन। राजनीतिज्ञों के बीच भी उनकी वैसी पैठ थी। पटना से बाहर भी कई स्टोरी के कवरेज के लिए उनके साथ जाने का मौका मिला था। ‘रविवार‘  पत्रिका के लिए अरूण रंजन और किशन की जोड़ी फेमस हो गयी थी। अरूणजी की बेबाक लेखनी और किशन भाई की तस्वीर। उस वक्त भी प्रतिस्पर्धा होती ही थी। सन अस्सी के दशक में छायाकारों का एक नया दल बना जिसके गुरु तो कृष्ण मुरारी ही थे लेकिन बाद में वह गुटीय आधार पर बंट गया।

इनके अनुज कृष्ण भान शर्मा और पुत्र अमृत जय किशन भी इसी पेशे में हैं। बहरहाल गंभीर बीमारी के दौरान पटना के अस्पताल में भर्ती किशन भाई को तुरंत दिल्ली के मेदांता अस्पताल तक पहुंचाने में बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता नंदकिशोर यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। पटना से बाहर कार्यक्रम में व्यस्त मुख्यमंत्री श्री जीतनराम मांझी से श्री यादव ने बातचीत की और उनके लिए एयर एंबुलेंस की व्यवस्था की। अपने संघर्ष के बल पर शून्य से शिखर तक पहुंचने वाले भाई कृष्णमुरारी किशन को मेरा शत शत नमन।

लेखक ज्ञानवर्द्धन मिश्र बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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