
द टेलीग्राफ ने सुप्रीम कोर्ट परिसर में इस खाये-पीये-अघाये दिखने वाले आवारा कुत्ते की फोटो के साथ बताया है कि अंदर एक खबर है, किसका जीवन मायने रखता है। गौर तलब है कि कुत्तों को हटाने का आदेश तो बदल गया पर कुत्ता काटने वाली दवा आसानी से उपलब्ध हो, मुफ्त लगे जैसी बातें जरूरत या मांग से संबंधित खबरें नहीं हैं। होंगी तो मुझे नहीं दिखी।
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में कुत्तों को राहत मिलने की खबर के साथ बिहार में मतदाता सूची से बाहर किये गये लोगों को फिर से शामिल करने में चुनाव आयोग की मदद करने के लिए राजनीतिक दलों को आदेश की खबर है। इसके साथ द टेलीग्राफ ने पश्चिम बंगाल में आईआईटी की संयुक्त दाखिला परीक्षा (जेईई) के नतीजों पर बंधन खत्म किये जाने की खबर भी दी है। इसी आधार पर अखबार ने कल के दिन को दबे, कुचले उपेक्षितों का दिन कहा है। आज खबर यह भी है कि केंद्र की भाजपा सरकार और उसके तहत चल रही व्यवस्था के शिकार और सरकार से परेशान लोगों के लिए राहत की कोई खबर नहीं है। उदाहरण के लिए, आवारा कुत्तों को बहुत जल्दी राहत मिल गई। टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर छपी खबर के अनुसार, दिल्ली नगर निगम ने कहा है कि 11 अगस्त के आदेश के बाद पकड़े गये कुत्तों को छोड़ना शुरू कर दिया गया है। गिरफ्तार या मुश्किल में फंसे मनुष्यों को छोड़ने की कोई खबर नहीं है। न ही यूएपीए अथवा पीएमएलए या किसी अन्य मामले में ईडी-सीबीआई के शिकार निर्दोष-निरपराध लोगों या राजनीतिज्ञों के साथ किसी तरह की राहत की उम्मीद है। और तो और प्रधानमंत्री अपने पीएम-सीएम वाले विधेयक का प्रचार और उसकी जरूरत बता रहे हैं। अखबारों ने उसे महत्व दिया है, प्रचार भी किया है। लेकिन मनीष सिसोदिया की इस सलाह की कोई चर्चा नहीं है कि पीएम, सीएम और मंत्री वाले हाल के विधेयक में यह व्यवस्था होनी चाहिये कि झूठे आरोप में जेल भेजने वाले को (अधिकारी / एजेंसी / सरकार के मुखिया को उस अपराध की सजा हो। मनीष जी ने नहीं कहा है पर मुझे लगता है कि यह शर्त आम आदमी के खिलाफ कार्रवाई में भी होना चाहिये।
आश्चर्य की बात है कि देश की आबादी का जो वर्ग कुत्तों के लिए परेशान हो गया, सुप्रीम कोर्ट से आदेश बदलवा लिया वह हाल के डॉक्टर कफील खान, पत्रकार सिद्दीक कप्पन और उमर खालिद के मामले में शांत रहा। नेताओं का मामला तो चलिये राजनीतिक था और गैर राजनीतिकों से क्या उम्मीद की जाये। पहले वाले दोनों को जमानत मिल गई है इसलिए उमर खालिद के मामले का जिक्र बनता है। ताज्जुब है कि जनता को, सुप्रीम कोर्ट को भी कुत्तों के लिए समय मिल गया पर उमर खालिद अभी भी जेल में है। जो नहीं जानते उन्हें बता दूं कि उमर खालिद का मामला फरवरी 2020 में दिल्ली के उत्तर-पूर्वी हिस्से में हुए दंगों से जुड़ा है। दिल्ली पुलिस ने उन पर यूएपीए के तहत आरोप लगाए हैं। इनमें 1) दंगे भड़काने की साज़िश रचना 2) लोगों को इकट्ठा करना और भड़काऊ भाषण देना 3) दो समुदायों के बीच नफ़रत फैलाना और 4) सरकारी संपत्ति पर हमला करना। इसके तहत उमर खालिद को एक संगठित साजिशकर्ता बताया गया है। उन्हें 14 सितंबर 2020 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गिरफ्तार किया था। तब से वे तिहाड़ जेल में हैं और कई अदालतों में उनकी जमानत याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं। उदाहरण के लिए कड़कड़डूमा कोर्ट ने मार्च 2022 में जमानत नहीं दी, दिल्ली हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2022 में जमानत याचिका खारिज की, सुप्रीम कोर्ट में भी उनकी याचिका लंबित रही। कई बार सुनवाई टलने की शिकायत है। प्रचारक पत्रकार अर्नब गोस्वामी को हफ्ते भर में जमानत मिल जाने के रिकार्ड है और भाजपा शासन में लगाये जाने वाले कई आरोप साबित नहीं होने का उदाहरण है, तब भी उमर खालिद को जमानत नहीं मिली है और कुत्तों के लिए परेशान होने वाले लोग एक प्रतिभाशाली छात्र के लिए परेशान नहीं हैं।
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस ने जुलाई 2025 में, उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं का विरोध करते हुए यह दावा किया था कि दंगों की योजना वैश्विक स्तर पर भारत की छवि खराब करने की साज़िश थी। अगर ऐसा हो भी तो क्या जांच और पुष्टि होने तक अभियुक्त जेल में रहेगा? तथ्य है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने 9 जुलाई 2025 से दोनों की जमानत याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा हुआ है। भ्रष्टाचार मिटाने, स्विस बैंक में रखा काला धन वापस लाने के वादे पर सत्ता में आई (केंद्र / मोदी) सरकार ने जो किया और नहीं किया के बाद अब सत्ता में बने रहने के उपाय करती नजर आ रही है। जबरन जेल भेजे जाने वाले विरोधियों और विपक्षियों की कुर्सी, पद और राजनीति को लेकर उसकी चिन्ता तो दिख रही है, विरोधियों के वर्तमान और भविष्य के प्रति सरकार ही नहीं, हमारा समाज भी लापरवाह है। वही समाज कुत्तों की तकलीफ नहीं देख पाता। यह सिर्फ समाज के आम लोगों की स्थिति नहीं है, अखबारों की भी है। इसलिए समझा जा सकता है कि व्यवस्था ऐसी क्यों है। वोट चोरी पर चुप है, एसआईआर तमाम गड़बड़ियो के बावजूद जारी है। रोकने संबंधी याचिका का क्या हुआ, अखबार नहीं बताते हैं। या यह नहीं पूछते-बताते कि एसआईआर में अगर इतनी गड़बड़िया हैं तो उसे चलने क्यों दिया जा रहा है रोका क्यों नहीं जा रहा है। आज एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भी खबर है। कई अखबारों में लीड है। मुझे अपने सभी नौ अखबारों की लीड और पहले पन्ने की खबरें अजीब लगीं। ज्यादातर सरकारी प्रचार करते लगे। जनहित के मामले नहीं होते हैं, आज भी नहीं हैं। एसआईआर की खबर अपने भिन्न शीर्षक से लीड या पहले पन्ने पर है और अखबारों ने यह नहीं बताया है कि एसआईआर को रोकने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐसा क्यों है।
बहुचर्चित, महत्वाकांक्षी और लगभग मनमाने एसआईआर के तहत चुनाव आयोग ने अगर 65 लाख लोगों को गलत हटाया है तो उन्हें फिर से शामिल करने के लिए फॉर्म भरने की जरूरत क्यों होनी चाहिये? जैसे हटाये गये वैसे शामिल किये जायें, गलती सुधारी जाये। जो सही हटाये गये हैं उन्हें रहने दिया जाये। कुल मिलाकर, चुनाव आयोग अपना काम करे और ठीक से करे। लेकिन नाम गलत हटाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं, कोई पूछताछ नहीं, ठीक करने का भार दूसरों पर – सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश समान्य है तो कैसे और खास है तो क्यों – अखबारों में कुछ नहीं है। आज मैं अपने सभी अखबारों के पहले पन्ने की प्रमुख खबरों के शीर्षक लिख रहा हूं। आप देखिये कि अखबारों का तेवर कैसा है और ज्यादातर में मुद्दा सिरे से गायब है। बिहार में राहुल गांधी की अधिकार यात्रा, उसमें वोट चोर गद्दी छोड़ के नारे नहीं हैं, वोट चोरी के आरोप पर सरकार, चुनाव आयोग, भाजपा ने कुछ कहा हो तो नहीं है और प्रधानमंत्री जो बोल रहे हैं उसे प्रमुखता मिली है। सरकार और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी वोट चोरी के आरोपों से कैसे निपट रही है या उसका सामना कैसे कर रही है इसपर भी कुछ नहीं है जबकि पूछा और बताया तो जाना ही चाहिये। चुनाव आयोग क्या कर रहा है, बचाव में उनके तर्कों का मजाक उड़ा उसके बाद क्या सब होना चाहिये इसपर भी अखबार शांत हैं।
अखबारों में और सोशल मीडिया में भी इस बात को बहुत महत्व दिया गया कि सीएसडीएस के संजय कुमार ने अपने ट्वीट डिलीट कर दिये, गलत जानकारी देने के लिए माफी मांगी, उनसे पूछताछ और एफआईआर हुई आदि। लेकिन इसका महादेवपुरा से संबंधित आरोपों से कोई संबंध नहीं है और अगर दो चुनाव क्षेत्र से संबंधित रिपोर्ट गलत थी तो बाकी सब को भी गलत बताने की कोशिश की गई जबकि ऐसा हो नहीं सकता है। तमाम नये मामले सामने आये हैं और द हिन्दू अखबार समूह की अंग्रेजी पाक्षिक पत्रिका फ्रंटलाइन ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 से पहले पनवेल में मतदाता सूची में 85 हज़ार डुप्लीकेट वोटरों का बड़ा खुलासा किया है। आज अखबारों में यह खबर वैसे नहीं छपी है जैसे सीएसडीएस या संजय कुमार वाली छपती रही है। फ्रंटलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र की जिस सीट को लेकर बवाल है वह मुंबई महाननगर क्षेत्र का हिस्सा पनवेल है। इस लोकसभा सीट पर 85211 डुप्लीकेट वोटर मिले हैं। चुनाव आयोग ने कहा था कि समय पर शिकायत नहीं की गई, अभी तक शिकायत नहीं की गई है लेकिन इस खबर के अनुसार, पूरे मामले की शिकायत लेकर बलराम पाटील रिटर्निंग अफसर के पास गए थे कोई जवाब नहीं मिला। फिर 26 सितंबर 2024 को बलराम पाटील बॉम्बे हाईकोर्ट पहुँचे। 18 अक्टूबर 2024 को कोर्ट ने तर्क दिया कि चुनाव की घोषणा हो चुकी है, इसलिए अब वोटर लिस्ट में बदलाव संभव नहीं है। यही तर्क मुंबई हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने एक अन्य शिकायतकर्तचा चंद्रकांत पाटील को दिया और शिकायत खारिज कर दी जबकि पहले रिटर्निंग अफसर से कहा गया था, ‘दो हफ्ते में कार्रवाई करें’। इस तरह चुनाव उसी वोटर लिस्ट के आधार पर हुआ, जिसमें हजारों डुप्लीकेट नाम मौजूद होने की शिकायत की गई थी। पर चुनाव आयोग यह कहता रहा है कि समय रहते शिकायत नहीं की गई।
इस तरह या ऐसी मतदाता सूची से चुनाव जीते नरेन्द्र मोदी अब यह दावा कर रहे हैं कि, (नवोदय टाइम्स) घुसपैठियों को हर हाल में बाहर किया जायेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि 10 साल से ज्यादा से नरेन्द्र मोदी खुद प्रधानमंत्री हैं, बिहार में ज्यादातर समय उनकी पार्टी के सहयोग से ही सरकार चलती रही है, पश्चिम बंगाल में सीमा पार से आने वाले घुसपैठियों को रोकने वाला सीमा सुरक्षा बल केंद्र सरकार के नियंत्रण में है फिर भी (हर चुनाव के मौके पर) वे घुसपैठियों की बात कर रहे हैं और नवोदय टाइम्स ने इस समस्या की गंभीरता जताने वाली खबर, रोहिंग्या, बांग्लादेशियों के लिए फर्जी आधार बनाता था गिरोह, 8 गिरफ्तार को पहले पन्ने पर जगह दी है। इसी तरह, अमर उजाला में एक विशालकाय शीर्षक है, 1.6 लाख बूथ एजेंट….एसआईआर पर सिर्फ दो आपत्तियां, सुप्रीम कोर्ट हैरान। चैट जीपीटी से मैने पूछा, क्या ऐसी कोई खबर है कि शिकायत की गई थी उसकी रिपोर्ट नहीं है या शिकायतों की पावती नहीं दी गई या शिकायत सुनी ही नहीं गई। जवाब में मुझे यह जानकारी मिली:
1. नागरिकों को पावती नहीं मिली
- नालंदा जिले (बिहारशरीफ सहित कई प्रखंडों) में विशेष पुनरीक्षण अभियान (एसआईआर) के दौरान मतदाताओं ने कहा कि उन्होंने बीएलओ को दस्तावेज दिए पर पावती नहीं दी गई। इस कारण वे चिंतित थे कि उनका फॉर्म सुरक्षित रखा गया या नहीं। लगभग प्रत्येक प्रखंड में रोज़ 50 से अधिक शिकायतें टोल-फ्री नंबर पर दर्ज की जा रही थीं। (प्रभात खबर)
- सीवान जिले में रिपोर्ट हुई कि कई मतदाताओं को रसीद (पावती) नहीं मिली। लोग असमंजस में थे कि आखिर फॉर्म जमा हुआ या नहीं। (प्रभात खबर)
- कटिहार क्षेत्र में भी कई जगह फॉर्म बिना पावती जमा होते रहे, इससे मतदाताओं में नाराज़गी और असमंजस पैदा हुआ। (दैनिक भास्कर)
- पूर्णिया (बायसी प्रखंड) में पूर्व मंत्री ने कहा कि नियम के अनुसार दो फॉर्म देने चाहिए – एक जमा करने के लिए, दूसरा पावती के लिए। लेकिन बीएलओ केवल एक ही फॉर्म ले जाते हैं और कोई पावती नहीं दी जा रही। (दैनिक भास्कर)
2. शिकायतें दर्ज होने पर भी कार्रवाई या आवेदन की पावती नहीं मिली
- रजिस्ट्रेशन ऑफ ऑब्जेक्शन्स / क्लेम्स की प्रक्रिया में बिहार में एसआईआर के दौरान कई मतदाताओं ने आपत्तियाँ दर्ज कराईं लेकिन इनपर उचित निपटारा या पुष्टि नहीं मिली। (नवभारत टाइम्स, एबीपी न्यूज)
3. नीतिगत और राजनीतिक स्तर पर आपत्ति दर्ज न होने का सिलसिला
- राजनीतिक दलों द्वारा कोई आपत्ति दर्ज न कराए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने निराशा जताई है कि 1.6 लाख बूथ‑एजेंट्स में केवल 2 आपत्तियाँ दर्ज की गईं। लेकिन आम लोगों ने कई शिकायतें कीं, जिन्हें सुनने या पुष्टि करने में ज़रूरत से कम पारदर्शिता दिखी। (नवभारत टाइम्स)
- विपक्ष के नेताओं और संगठनों ने भी आरोप लगाया कि मतदाताओं को आपत्ति फॉर्म जमा करने की पावती नहीं दी जा रही, जिससे उनके दावे का कोई प्रमाण नहीं बनता। (टाइम्स ऑफ इंडिया)
इसके बाद मैंने चैट जीपीटी से पूछा, एसआईआर के तहत प्रारूप मतदाता सूची से नाम हटाये जाने की शिकायत कम्युनिस्ट पार्टी ने दी है, पावती भी है लेकिन चुनाव आयोग कह रहा है कि शिकायत नहीं मिली। जवाब मिला, हाँ, ऐसी ख़बरें हैं जहाँ सीपीआई(एमएल) यानी कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी–लेनिनवादी) ने शिकायत दर्ज कराने का दावा किया है। उनके पास पावती भी है, लेकिन चुनाव आयोग ने कहा है कि उन्हें कोई शिकायत मिली ही नहीं। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, सीपीआई (एमएल) ने आरोप लगाया है कि शिकायत नहीं मिली कहकर चुनाव आयोग देश को भ्रमित कर रहा है। द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, एक बूथ एजेंट, चंदन कुमार ने बताया कि उनके बूथ से लगभग 174 मतदाताओं के नाम सूची से गायब थे। उन्होंने 8 अगस्त को चुनाव आयोग को पत्र भेजकर इसकी शिकायत की, लेकिन अब तक आयोग की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। कई समाचार स्रोतों के अनुसार, सीपीआई (एमएल) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने चुनाव आयोग की इस दलील की आलोचना की है कि सीधे मतदाताओं से सिर्फ 3000 शिकायतें मिली हैं। उनका कहना है कि पार्टी की शिकायत को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने बूथ-स्तर का डेटा सार्वजनिक करने की मांग की है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किस सूची से नाम हटाए गए और क्यों। कुल मिलाकर, आयोग का कहना है कि 1 अगस्त से 14 दिनों तक किसी राजनीतिक दल ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई — लेकिन सीपीआई (एमएल) इस दावे को चुनौती दे रहा है।
1. अमर उजाला
आक्रामक कुत्ते ही आश्रय स्थल में रहेंगे शेष नसबंदी, टीकाकरण कर छोड़े जाएंगे
सत्ता के भूखे भ्रष्टाचार करेंगे, जेल जाने पर भी कुर्सी से चिपके रहेंगे…. अब ऐसा नहीं चलेगा
1.6 लाख बूथ एजेंट…. एसआईआर पर सिर्फ दो आपत्तियां, सुप्रीम कोर्ट हैरान
2. देशबन्धु
11 दस्तावेज संग आधार भी करें मान्य
आजाद होंगे आवारा कुत्ते
लाल आतंक से जकड़ा हुआ था बिहार
(नीतिश कुमार 10 साल से ज्यादा से लगातार मुख्यमंत्री हैं। पहले भी मुख्यमंत्री रहे हैं पर प्रधानमंत्री ने लालटेन राज की चर्चा की)
3. नवोदय टाइम्स
कुत्तों को टीकाकरण के बाद छोड़ने के आदेश
सीएम रेखा गुप्ता की सुरक्षा में फिर सेंध
आधार के साथ दावा कर सकते हैं वोटर लिस्ट से बाहर हुए लोग
घुसपैठियों को हर हाल में बाहर किया जाएगा : मोदी
4. हिन्दुस्तान टाइम्स
सुप्रीम कोर्ट ने सख्त आदेश को बदला, आवारा कुत्तों की रिहाई की अनुमति दी
‘दागी’ मंत्रियों से संबंधित विधेयक को लेकर मोदी ने विपक्ष पर निशाना साधा
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाताओं के नाम हटाने पर पार्टियों की निष्क्रियता की आलोचना की
5. इंडियन एक्सप्रेस
- बिहार की मतदाता सूची पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, नाम शामिल करने के दावे के लिए आधार, 11 दस्तावेजों में से किसी का उपयोग करें
- सुप्रीम कोर्ट ने सख्त आदेश को संशोधित किया, कहा नसबंदी के बाद आवारा कुत्ते रिहा किया जायें
- गिरफ्तार मंत्रियों के खिलाफ विधेयक पर प्रधानमंत्री ने कहा, देखा कि कैसे जेल से फाइलों पर दस्तखत किये जाते थे।
6. दि एशियन एज
- सभी घुसपैठियों को खदेड़ दूंगा, नौकरी नहीं करने दूंगा : प्रधानमंत्री
- आवारा कुत्तों की नसबंदी कर सड़कों पर वापस भेज दें : सुप्रीम कोर्ट
7. द हिन्दू
- सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों से कहा कि बिहार में मतदाता सूची से बाहर रह गये लोगों को वापस शामिल करने में चुनाव आयोग का सहयोग कहें
- शीर्ष अदालत ने सख्त आदेश को संशोधित किया, आवारा कुत्तों को रिहा करने की अनुमति दी
8. द टेलीग्राफ
- दबे, कुचले, उपेक्षितों का दिन (मुख्य शीर्षक है)
- सुप्रीम कोर्ट ने (एसआईआर मामले में) जांच के लिए राजनीतिक दलों को जोड़ा, आधार पर जोर दिया
- नसबंदी के बाद कुत्ते आवारा छोड़े जा सकते हैं
- अदालत ने इंजीनियरिंग की संयुक्त दाखिला परीक्षा के नतीजों पर बंधन खत्म किया
9. द टाइम्स ऑफ इंडिया
- सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों से कहा, आवारा कुत्तों का टीकाकरण कर आजाद छोड़ दें,
- मतदाता सूची से निकाले गये वोटर आधार के साथ दावा कर सकते हैं सुप्रीम कोर्ट ने कहा
कुल मिलाकर, हेडलाइन मैनेजमेंट और चुनाव आयोग का झूठ साबित करने वाली खबरों की भरमार है। इस दौर में खबर कुछ है, सुर्खियां कुछ और।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


