Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सियासत

यकूम मई : उम्मीद के मजदूर

एक मई की तारीख कितने लोगों को याद है? बस, उन चंद लोगों के स्मरण में एक मई शेष रह गया है जो आज भी इस उम्मीद में जी रहे हैं कि एक दिन तो हमारा भी आएगा. वे यह भी जानते हैं कि वह दिन कभी नहीं आएगा लेकिन उम्मीद का क्या करें?

एक मई की तारीख कितने लोगों को याद है? बस, उन चंद लोगों के स्मरण में एक मई शेष रह गया है जो आज भी इस उम्मीद में जी रहे हैं कि एक दिन तो हमारा भी आएगा. वे यह भी जानते हैं कि वह दिन कभी नहीं आएगा लेकिन उम्मीद का क्या करें?

उम्मीद है कि टूटती नहीं और हकीकत में उम्मीद कभी बदलती नहीं. एक वह दौर था जब सरकार की ज्यादती के खिलाफ, अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाने मजदूर सडक़ों पर चले आते थे. सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध करते हुये लाठी और गोली खाकर भी पीछे नहीं हटते लेकिन दुर्भाग्य देखिये. कैलेंडर पर जैसे-जैसे तारीख आगे बढ़ती गयी, मजदूर आंदोलन वैसे वैसे पीछे होता गया. अब तो मजदूर संगठनों की स्थिति निराशाजनक है. यह निराशा मजदूर संगठनों की सक्रियता की कमी की वजह से नहीं बल्कि कार्पोरेट कल्चर ने निराशाजनक स्थिति उत्पन्न की है.  मजदूर एकता जिंदाबाद के नारे सुने मुझे तो मुद्दत हो गये हैं. आपने शायद कभी सुना हो तो मुझेे खबर नहीं. भारत सहित समूचे विश्व के परिदृश्य को निहारें तो सहज ही ज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी कि मजदूर नाम का यह शख्स कहीं गुम हो गया है. 

कार्पोरेट सेक्टर के दौर में मजदूर यूनियन गुमशुदा हो गये हैं. एक के बाद एक संस्थानों का निजीकरण किया जा रहा है. निजी संस्थाओं को मजदूरों की जरूरत नहीं होती है. दस मजदूरों का काम एक मशीन करने लगी है. कार्पोरेट सेक्टर को मजदूर नहीं गुलाम चाहिये. मजदूर कभी गुलाम नहीं हो सकता है. मशीन गुलाम होती है और गुलाम का कर्तव्य होता है आदेश का पालन करना. मशीन कभी आवाज नहीं उठाती है.  लगातार बढ़ती यंत्र व्यवस्था ने समूचे सामाजिक जीवन का ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर दिया है. हमारी जरूरतों के उत्पादों के निर्माण में यंत्रों के उपयोग से समय की बचत हो रही है, गुणवत्ता भी शायद ज्यादा होगी लेकिन जीवंतता नदारद है. एक मजदूर के बुने गये कपड़ों में उसकी सांसों की गर्मी सहज रूप से महसूस की जा सकती है. उसके द्वारा बुने गये धागों में मजदूर की धडक़न को महसूस किया जा सकता है. एक मशीन के उत्पाद में कोई जीवंतता नहीं होती है. इन उत्पादों से मनुष्य की बाहरी आवश्यकताओं की पूर्ति तो हो रही है किन्तु मन के भीतर संतोष का अभाव महसूस किया जा सकता है. 

इस यंत्र व्यवस्था ने न केवल मजदूरों का हक छीना बल्कि लघु उद्योगों को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया है. हर तरफ यंत्र ने ऐसा कब्जा जमाया है कि आम आदमी स्वयं का गुलाम होकर रह गया है. रेल्वे स्टेशनों पर आपको कुलियों की फौज देखने को नहीं मिलेगी क्योंकि इस यांत्रिक व्यवस्था ने हर मुसाफिर को कुली बना दिया है. भारी-भरकम सूटकेस में लगे पहियों को खींचते हुये वह पैसा बचाने में लगा है. सूटकेस में लगे पहिये कुलियों को चिढ़ा रहे हैं और शायद कह रहे हैं ले, अब हो गई तेरी छुट्टी. छुट्टी कुली के रोजगार की ही नहीं हुई है बल्कि उसके चौके-चूल्हे की भी हो गई है. मजदूरी नहीं मिलेगी तो चूल्हा जलेगा कैसे? ऐसे कई काम-धंधे हैं जिन्होंने कामगारों के हाथों को बेकार और बेबस किया है.

सत्ता और शासकों की नींद उड़ा देने वाली आवाज आहिस्ता आहिस्ता मंद पडऩे लगी है. यंत्रों ने जैसे मजदूरों की शेर जैसी दहाड़ को अपने भीतर कैद कर लिया है. शायद यही कारण है कि मजदूर दिवस की ताप से अब समाज गर्माता नहीं है. सोशल मीडिया में भी मई दिवस की आवाज सुनाई नहीं देती है. अखबार के पन्नों पर कहीं कोई खबर बन जाये तो बड़ी बात, टेलीविजन के पर्दे पर भी मजदूर दिवस एक औपचारिक आयोजन की तरह होता है. हैरान नहीं होना चाहिये कि आपका बच्चा कहीं आपसे यह सवाल कभी कर बैठे-यह मजदूर क्या होता है? नयी पीढ़ी को तो यह भी नहीं पता कि एक मई क्या होता है?  इस विषम स्थिति के बावजूद मजदूर उम्मीद से है. उसे इस बात का इल्म है कि दुनिया बदल रही है. इस बदलती दुनिया में मजदूर की परिभाषा भी बदल गई है लेकिन मजदूर और किसान कभी नाउम्मीद नहीं होते. उनकी दुनिया बदल जाएगी, इस उम्मीद के साथ वे जीते हैं. वे मौका आने पर कह भी देते हैं कि – ‘हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे/इक गांव नहीं, इक खेत नहीं, सारी की सारी दुनिया मांगेंगे. उम्मीद से जीते मजदूर और मजदूर दिवस को मेरा लाल सलाम. 

लेखक मनोज कुमार ई-मेल संपर्क : [email protected]

Local News Community
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन