बिहार में दैनिक जागरण कर रहा अपने कर्मियों का शोषण, श्रम आयुक्त ने जांच के आदेश दिए

दैनिक जागरण, गया (बिहार) के पत्रकार पंकज कुमार ने श्रम आयुक्त बिहार गोपाल मीणा के यहाँ एक आवेदन दिनांक लगाया था. पिछले महीने 26 जुलाई को दिए गए इस आवेदन में पंकज ने आरोप लगाया था कि गया जिले सहित जागरण के बिहार के सभी चार प्रकाशन केंद्र में श्रम कानून के तहत मीडियाकर्मियों और गैर-मीडियाकर्मियों को कई किस्म का लाभ नहीं दिया जा रहा है. यहां 90 प्रतिशत से अधिक पत्रकार एवं गैर पत्रकारों का प्राविडेंट फंड, स्वास्थ्य बीमा, सर्विस बुक सहित कई सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है. साथ ही माननीय सर्वोच्च्य न्यायालय द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड के तहत सेलरी, पद और ग्रेड की जो घोषणा की जानी थी, उसे भी नहीं नहीं किया गया है.

श्रम आयुक्त गोपाल मीणा ने इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए एक आदेश (3 / डी-96 / 2015 श्र० स० 4142 दिनांक 04-08-17) जारी कर दिया है. आदेश के माध्यम से कहा गया है कि दैनिक जागरण में कार्य के माहौल, श्रम नियमों और मजीठिया वेज बोर्ड आदि के अनुपालन की नियमानुकूल आवश्यक जांच की जाए तथा कृत कार्रवाई से संबंधित प्रतिवेदन विभाग को तुरंत उपलब्ध कराया जाए. ये आदेश मगध प्रमंडल के उप श्रमायुक्त को दिया गया है.

पंकज कुमार ने इसके पूर्व माननीय उच्चतम न्यायालय में अवमानना वाद दायर किया था. पंकज का गया से जम्मू विद्वेष के कारण तबादला कर दिया गया था. इस तबादला को स्टे करने तथा मजीठिया वेज बोर्ड की अनुसंशा के आलोक में वेतन सहित अन्य सुविधा देने की मांग पंकज ने की थी. माननीय उच्चतम न्यायालय ने सभी आवेदकों को श्रम आयुक्त के पास इंडस्ट्रियल डिस्पुट एक्ट के तहत आवेदन दायर करने का आदेश दिया है. पंकज कुमार द्वारा दायर अवमानना वाद की खबर भड़ास ने प्रमुखता से एक मई को प्रकाशित किया था. श्रम आयुक्त गोपाल मीणा के ताजे आदेश का लाभ हजारों मीडियाकर्मियों और गैर-मीडियाकर्मियों को मिलेगा जो दैनिक जागरण सहित अन्य प्रकाशन संस्थानों में काम कर रहे हैं.

गया से जाने माने वकील और पत्रकार मदन तिवारी की रिपोर्ट. संपर्क : 8797006594

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‘नेशनल दुनिया’ अखबार के कर्मी न्याय के लिए आज भी भटक रहे, मालिक शलैंद्र भदौरिया पूरे तंत्र को मुंह चिढ़ा रहा

सेवा में,
उप श्रमायुक्त
श्रम विभाग
गौतमबुद्ध नगर, नोएडा
(उत्तर प्रदेश)

विषय- कर्मचारियों को एसबी मीडिया प्रा. लि. प्रबंधन द्वारा श्रमिकों के प्रति अनियमितताएं एवं वेतन भुगतान न होने के संबंध में ज्ञापन

महोदय,

आपके ध्यानार्थ निवेदन है कि अधोलिखित कर्मचारी डब्ल्यू-23 सेक्टर-11 स्थित एसबी मीडिया प्रा. लि. द्वारा संचालित नेशनल दुनिया सामाचार पत्र में कार्यरत रहे हैं। अप्रैल 2012 से संस्थान द्वारा बकायादा नौकरी पर रखे गए। ये सभी लोग गैर पत्रकार एवं पत्रकार कर्मचारियों का लगातार कार्य करते रहे। हम सभी लोगों के साथ घोर अनियमितताएं की गईं। हम लोग निरंतर दैनिक रूप से हाजिरी रजिस्टर में उपस्थिति दर्ज कराते रहे। हालांकि शुरू में इलेक्ट्रानिक माध्यम से उपस्थिति दर्ज होती थी, तब बायो मैट्रिक विधि थी। हम लोग नियमित रूप से दैनिक समाचार पत्र नेशनल दुनिया के प्रत्येक विभाग के कार्य को संपादित करते रहे।

लेकिन बिना किसी पूर्व सूचना के कार्यालय में ताला लगा दिया गया। हम सभी लोगों को मासिक सैलरी का पिछले 15 महीनों से भुगतान नहीं किया गया। कर्मचारियों का विगत चार वर्षोंं से लगातार प्रोविडेंट फंड काटा जाता रहा लेकिन संबंधित कार्यालय में जमा नहीं कराया गया। इनकम टैक्स काटा गया लेकिन फार्म 16 आदि नहीं दिया गया। तरह-तरह से मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

कई निकाले गए लोगों के फुल एंड फाइनल का चेक दिया गया जो बैंक में बाउंस हो गया। कुछ लोगों ने इस्तीफा दिया उनका भी बकाया नहीं दिया गया है। इसको लेकर कई बार निदेशक श्री शैलेंद्र भदौरिया तथा श्रीमति सुरभि भदौरिया के साथ बैठकों व अन्य उच्च अधिकारियों से मिलने के बाद भी आश्वासन दिया गया लेकिन कार्यान्वन नहीं किया गया। यही नहीं समय-समय पर कंपनी से निकालने, कंपनी बंद करा देने, मरवा देने आदि प्रकार की धमकियां दी गईं। हमारे पास आज न तो रोजगार है और न ही आमदनी का कोई सोत्र। ऐसे में परिवार को चला पाना बेहद मुश्किल है। आपसे विनम्र निवेदन है कि आप हमारी समस्या समझते हुए बकाया वेतन, प्रोविडेंट फंड, टैक्स सर्टिफिकेट, निकाले गए कर्मचारियों का फुल एंड फाइनल दिलाने का कष्ट करें। साथ ही मार्गदर्शन करें।

धन्यवाद सहित

भवदीय (सभी प्रार्थी और प्रताड़ित कर्मचारी)

-श्री चंद्र कुमार (श्री चंद्र)
-प्रभात कुमार मिश्रा
-धीरेंद्र कुमार मिश्रा
-गणपत सिंह चौहान
-रंजीत सिंह
-बसंत जोशी
-दीपांकर जैन
-त्रिलोक रावत
-राकेश शर्मा
-नंदन उप्रेती
-अनूप पांडे
-ज्योति दुबे
-ओंकार सिंह
-अनिल शर्मा
-जगदीश चंद्रा
-अनिल पांडे
-अरूण कुमार
-अमलेंदू भूषण
-प्रकाश सिंह
-सुरेश
-मनोजअग्रवाल
-संगीता काला

प्रतिलिपि :
प्रधानमंत्री कार्यालय
मुख्यमंत्री कार्यालय
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय
मानव संसाधन मंत्रालय
एसएसपी (गौतमबुद्ध नगर)
जिला अधिकारी (गौतमबुद्ध नगर)
निकट थाना अध्यक्ष,

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डीएलसी बरेली ने हिंदुस्तान प्रबंधन से कहा- ”सुप्रीम कोर्ट से बढ़कर कोई नहीं”

बरेली में मजीठिया वेज बोर्ड के वेतनमान के अनुसार एरियर के दाखिल क्लेम (हिंदुस्तान समाचार पत्र के सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा के 33,35,623 रुपये, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला के 32,51,135 रुपये, चीफ रिपोर्टर डॉ. पंकज मिश्रा के 25,64,976 रुपये) पर शुक्रवार को सुनवाई के दौरान उप श्रमायुक्त बरेली रोशन लाल ने हिंदुस्तान प्रबंधन की ओर से मौजूद बरेली के एचआर हेड व विधि सलाहकार को चेताया कि सुप्रीम कोर्ट से बढ़कर कोई नहीं है।

उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान प्रबंधन क्लेमकर्ता तीनों कर्मचारियों से सौहार्दपूर्ण वार्ता करे और क्लेम का किश्तों में भुगतान लेने के लिए राजी कर लें। उधर, क्लेमकर्ता निर्मल कान्त शुक्ला ने बहस करते हुए डीएलसी के सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि इस मामले में न तो कोई सबूत रखने, न कोई बहस करने और न ही किसी तर्क-वितर्क की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के क्रम में श्रम विभाग को कोर्ट से मिले आदेश के तहत उनके बकाया एरियर क्लेम को दिलाने के लिए बरेली हिंदुस्तान प्रबंधन की आरसी काटी जाए क्योंकि 22 फरवरी को दाखिल क्लेम को देने पर आज जब दस दिन बाद भी हिंदुस्तान बरेली के प्रबंधन ने कोई विचार नहीं किया है तो प्रबंधन दस साल में भी कोई निर्णय नहीं लेगा। लिहाजा इस मामले में प्रबंधन को कोई और मौका देने की आवश्यकता नहीं है। उनके प्रार्थनापत्र के क्रम में हिंदुस्तान बरेली प्रबंधन के विरुद्ध आरसी जारी की जाय।

उपश्रमायुक्त बरेली ने 17 मार्च की तिथि अगली सुनवाई के लिए नियत की है। यूपी के श्रमायुक्त से मजीठिया के अनुसार वेतन न मिलने की बरेली हिंदुस्तान से चीफ कॉपी एडिटर सुनील कुमार मिश्रा, सीनियर सब एडिटर रवि श्रीवास्तव, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला, चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा, पेजिनेटर अजय कौशिक ने शिकायत भेजी थी। श्रमायुक्त ने बरेली डीएलसी को प्रकरण निस्तारित करने का आदेश दिया, जिस पर डीएलसी बरेली सुनवाई कर रहे हैं।

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श्रम अफसरों के धमकाने के मामले से नई दुनिया प्रबंधन के होश उड़े

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित प्रसिद्ध अखबार नई दुनिया में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतन हासिल करने के लिए यहां कार्यरत सभी पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मचारी लामबंद हो गए हैं। इसके लिए वे न्यायपालिका से लेकर सरकारी तंत्र के हर उस पुर्जे को आजमाने में मशगूल हैं जो उनकी इस मांग को पूरा कराने में निर्णायक सहायता कर सके। या कहें कि उन्हें मजीठिया दिलवा सके। इस जीवनदायी महान काम के लिए कर्मचारियों ने श्रम विभाग का भी दरवाजा खटखटाया है। खुशी की बात यह है कि श्रम महकमा खुलकर उनकी मदद में उतर आया है।

वीरवार एक अक्टूबर को नई दुनिया रायपुर के ऑफिस में श्रम अधिकारियों का दल आ धमका। मजीठिया को लेकर अधिकारियों ने प्रबंधन से अनेक सवाल पूछे। उन्होंने जानना चाहा कि नई दुनिया मालिकान ने कर्मचारियों को मजीठिया वेज की बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतन एवं सुविधाएं देने के लिए अब तक क्या और कितने कदम उठाए हैं? उठाए हैं तो कितने? नहीं उठाए हैं तो क्यों नहीं? मतलब यह कि श्रम अफसरों ने मजीठिया की बाबत प्रबंधन से हर तरह की जानकारी मांगी। उन्होंने प्रबंधन से कर्मचारियों के नाम, पद, उन्हें मिलने वाले वेतन, भत्ते एवं अन्य सुविधाओं का पूरा ब्योरा देने का निर्देश दिया है।

साथ ही अखबार की सालाना आय-कमाई का भी ब्योरा कंपनी से उपलब्ध कराने को कहा है। जाहिर है श्रम अफसरों की इस एक तरह की आकस्मिक कार्रवाई से नई दुनिया प्रबंधन के होश उड़ गए हैं। उन्हें कम से कम श्रम विभाग (जिसे मालिकान-प्रबंधन अपना पालतू ही समझता है या समझता रहा है) से ऐसी उम्मीद नहीं थी। लेकिन उनकी इस उम्मीद पर तुषारापात करते हुए श्रम विभाग ने अपना असली-वास्तविक रंग दिखा दिया है। इस रंग ने मालिकान-प्रबंधन को बदरंग-बेहाल-बेचैन-व्याकुल कर दिया है। नींद उड़ा दी है। उसे समझ ही नहीं आ रहा है कि ये हो क्या गया, हो क्या रहा है?

बहरहाल, श्रम विभाग की यह कार्रवाई कर्मचारियों को थोड़ी राहत देने वाली है। अनवरत बढ़ रही महंगाई के घटाटोप में अल्प वेतन-मजदूरी पाने वाले कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड ने काफी उम्मीद जगाई है। उन्हें लगता है कि नया वेतनमान मिलने लगे तो जिंदगी की गाड़ी थोड़ी पटरी पर आ जाए। जीवन में थोड़ी खुशियों का संचार हो जाए। लगे कि अखबार में दीन-दुनिया का दुख-दर्द शब्दों में ढाल कर परोसने वाले उन जैसे मुलाजिमों के  जीवन के किसी कोने में सुख-सुविधा, शांति, निश्चिंतता भी बसती है।

बता दें कि नई दुनिया का मालिकाना हक भी उस दैनिक जागरण के पास है जिसके कर्मचारी बेहद कम पगार में गुजारा करते हैं या कर रहे हैं। लेकिन मजीठिया वेज बोर्ड की अधिसूचना के बाद उसे पाने के लिए इस वक्त सबसे मजबूत-सशक्त लड़ाई में जुटे हुए हैं। शुक्रवार दो अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर विशाल धरना-प्रदर्शन करके उन्होंने अपनी लड़ाई को व्यापक आयाम-विस्तार दे दिया है। इस आयोजन को पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मचारियों के हर तबके, हर क्षेत्र का खुला समर्थन मिला है। आंदोलन को इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट, इंडियन एक्सप्रेस कर्मचारी यूनियन, दिल्ली एवं अन्य जगहों के पत्रकार संगठनों का जमकर समर्थन-सहयोग मिला है।

चंडीगढ़ से पत्रकार भूपेंद्र प्रतिबद्ध की रिपोर्ट. संपर्क bhupendra1001@gmail.com

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दिल्ली राज्य में मीडिया मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर पड़ने लगा श्रम विभाग का चांटा

दिल्ली राज्य में कार्यरत मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड न दिए जाने को लेकर श्रम विभाग ने मीडिया हाउसों को धड़ाधड़ चांटे मारना शुरू कर दिया है. ऐसा दिल्ली की केजरीवाल सरकार की सख्ती के कारण हो रहा है. सूत्रों का कहना है कि अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने श्रम विभाग के अफसरों को साफ-साफ कह दिया है कि किसी का मुंह न देखें, कानूनन जो सही है, वही कदम उठाएं. इस प्रकार सरकार से पूरी तरह छूट मिल जाने के बाद दिल्ली राज्य के श्रम विभाग के अधिकारी फुल फार्म में आ चुके हैं. शोभना भरतिया समेत कई मीडिया मालिकों के खिलाफ क्रिमिनल प्रासीक्यूशन शुरू किया जा चुका है.

इस बारे में भड़ास4मीडिया को सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के वकील व मजीठिया वेज बोर्ड मामलों के विशेषज्ञ उमेश शर्मा ने बताया कि दिल्ली राज्य में मीडियाकर्मियों को जिस तरह फटाफट न्याय मिलने लगा है, वह बाकी राज्यों के लिए नजीर है. उमेश शर्मा के मुताबिक वे खुद दिल्ली के उन कई मीडियाकर्मियों को उनका बकाया पाने में मदद दिला रहे हैं जो मजीठिया के हिसाब से अपना बकाया तैयार लिखित में तैयार करके और इस बाबत अप्लीकेशन बनाकर ला रहे हैं. ऐसे लोगों के प्रकरण को वे श्रम विभाग ले जा रहे हैं और वहां से तुरंत संबंधित मीडिया हाउस के मालिक के खिलाफ क्रिमिनल प्रासीक्यूशन शुरू हो जा रहा है.

दिल्ली राज्य के अगर अन्य मीडियाकर्मी भी इस बारे में मदद चाहते हैं तो वकील उमेश शर्मा से संपर्क उनके मोबाइल नंबर 9868235388 के जरिए किया जा सकता है. अगर आप अपना खुद का मजीठिया के हिसाब से बकाया नहीं बना रहे तो बेहद मामूली फीस लेकर एडवोकेश उमेश शर्मा के एकाउंट विभाग की टीम समस्त कागजात तैयार कर श्रम विभाग में आगे की कार्यवाही के लिए दाखिल करा देगी. नीचे वो लिस्ट है, जिनके खिलाफ दिल्ली राज्य में श्रम विभाग ने क्रिमिनल प्रासीक्यूशन शुरू करने का आदेश जारी कर दिया है….

  1. Sobhna Bharatia & 11 other Directors/officer of HT Media Ltd (Case No. 32/1/15.
  2. Statesman Ltd (Case No. 33/1/15)
  3. Living Media (Case No. 34/1/15)
  4. DLA Media (Case No. 35/1/15)
  5. Punjab Kesri (Case No. 36/1/15)
  6. Sahara (Case No. 37/1/15)
  7. Good Morning India (Case No. 38/1/15)
  8. HT Media India Ltd (Case No. 39/1/15)
  9. Patrakar Prakashan Ltd ( Case No. 40/1/15)
  10. Amar Ujala, Rajni Maheshwari, Tanmay Maheshwari ( Case No. 41/1/15)
  11. UNI (Case No. 30/1/15)
  12. Pariwartan Bharti (Case No. 31/1/15)

एडवोकेट उमेश शर्मा का कहना है कि दिल्ली में श्रम विभाग की कार्यवाही नजीर बन जाएगी और इसका उदाहरण देकर, उल्लेख कर के दूसरे राज्यों के मीडियाकर्मी अपना हक पाने लग जाएंगे. उमेश शर्मा का मानना है कि एक बार क्रिमिनल प्रासीक्यूशन शुरू हो जाता है तो फिर मीडिया मालिकों को हर हाल में संबंधित कर्मी को वेज बोर्ड देना पड़ेगा अन्यथा मुकदमा हारकर जेल में जाना पड़ेगा या उसे चल-अचल संपत्ति की जब्ती का सामना करना पड़ सकता है. इस प्रकरण को विस्तार से जानने समझने के लिए नीचे दिए गए अंग्रेजी के अंंश को भी ध्यान से पढ़ें, जिसकी काफी कुछ बातें उपर हिंदी में दी जा चुकी हैं….

Non implementation of the recommendations of Majithia Wage Board order is going to cost very bitter to all newspapers in Delhi. Before submitting the reports of  implementation before Supreme Court of India; labour department has filed number of criminal challans against all defaulting newspaper establishments. The court of Chief  Metropolitan Magistrate, New Delhi District, Patiala House has already taken cognizance of the offense against all of them vide his order dated 21/8/2015 and issued summons  against all big names of newspaper industry. The summons have been sent to the police station for service on the accused persons and if they fail to appear before the court  after summon, bail able and non bail able warrants will be issued against them and they may be sent to Tihar. All such cases are listed on 24/9/2015 before the Court of  ACMM-II, Sh Ajay Garg, Room No. 32, Patiala House Courts, New Delhi. The details of the newspaper establishments against whom criminal prosecution has been launched are as under:

  1. Sobhna Bharatia & 11 other Directors/officer of HT Media Ltd (Case No. 32/1/15.
  2. Statesman Ltd (Case No. 33/1/15)
  3. Living Media (Case No. 34/1/15)
  4. DLA Media (Case No. 35/1/15)
  5. Punjab Kesri (Case No. 36/1/15)
  6. Sahara (Case No. 37/1/15)
  7. Good Morning India (Case No. 38/1/15)
  8. HT Media India Ltd (Case No. 39/1/15)
  9. Patrakar Prakashan Ltd ( Case No. 40/1/15)
  10. Amar Ujala, Rajni Maheshwari, Tanmay Maheshwari ( Case No. 41/1/15)
  11. UNI (Case No. 30/1/15)
  12. Pariwartan Bharti (Case No. 31/1/15)

The challans have been filed under Section 18 of the Working Journalista Act as the managements have not implemented the  orders dated 7/2/2014 passed by Supreme  Court of India in Writ Petition No. 246/20-11 whereunder the court has issued diections for granting all the benefits of Majithia Wage Board to the employees of the  newspaper with their arrears w.e.f. 11/11/11. All newspaper establishments have defaulted in complying with this order of the court which was taken very seriously by the  Supreme Court and vide its orders dated 28/4/2015, in bunch of Contempt of Court petitions, the court has issued directions to all the state governments to file affidavits  regarding the status report of implementation of the Majithia benefits. The newspaper employees of Delhi have created a brave front under the banner of Bhadash and  followed up with Delhi Government vigorously which has resulted into the filing of prosecution proceedings against all defaulting newspapers.

Its time that all claimant employees who are on the rolls of the newspaper establishments, resigned from the services, retired from the services or LRs of the employees who  died after 11/11/2011 can put up their claim U/s 17 (1)  of the Working Journalists Act immediately giving details of their entire dues. They should claim their interests on the  amount due also.  Its time all the employees show their solidarity and assemble at the court No. 32, Patiala House Courts on 24/9/2015 so that bail is not granted to the Directors, CEOs of the  said companies by the court unless they pay or deposit the dues of the employees.  All affected employees may also institute Caveat before High Court on the criminal side so that in the event of any of the accused persons approaches the High Court,  advance notice of the same is received by them and the court grants them an opportunity of hearing.

Lawyer Mr Umesh Sharma, Advocate is already pursuing the matter before Delhi Government is committed to take up the matters on nominal costs. He has constituted a team to take up the matter on behalf of all employees who are scattered and unable to get united and put up their claims. Services of Accountants have been requisitioned who will prepare the entire dues of each and every employee on very nominal costs. Contact number of Advo Umesh Sharma : 9868235388

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

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सहारा प्रबंधन से आए लोग सुनवाई से पहले ही श्रमायुक्त कार्यालय देहरादून को कागजात रिसीव कराकर रफूचक्कर हुए (देखें दस्तावेज)

देहरादून में राष्ट्रीय सहारा अखबार के कर्मियों ने प्रबंधन के खिलाफ मुकदमा कर रखा है। यह मुकदमा श्रमायुक्त आफिस में किया गया है। सुनवाई के दिन सहारा प्रबंधन की तरफ से कोई नहीं आ रहा है। हां, आश्वासन के कागजात जरूर सौंप जाते हैं। सहारा प्रबंधन के लोग इस बार भी सुनवाई के दौरान सहायक श्रम आयुक्त देहरादून के कार्यालय में नहीं पहुंचे। इसके पहले भी 18 अगस्त 2015 को जब वेतन संबंधी मामले की पहली सुनवाई थी तब भी प्रबंधन पक्ष के लोग तय समय तक नहीं पहुंचे थे।

इस बार प्रबंधन के लोग मामले की सुनवाई से पूर्व कार्यालय में कागजात रिसीव कराकर रफू चक्कर हो गए। सहायक श्रम आयुक्त ने 15 सितंबर 2015 की तारीख कर्मचारियों को दी है। अगली तारीख पर न आने की दशा में मामले को लेबर कोर्ट में सौंपे जाने के आश्वासन के साथ अगली तिथि मुकर्रर की है। प्रबंधन ने २५ दिन का समय मांगा था। गौरतलब है कि 18 अगस्त 2015 को एचआर के अखिल कीर्ति ने अगस्त की पूरी सेलरी सितंबर माह में देने, अक्टूबर से धीरे धीरे बकाया देने और मजीठिया वेज का नियमानुसार पालन करने, काम के घंटे छह करने और पद के अनुसार काम लेने सहित सभी संस्तुतियां व परिलाभ देने की बात कही थी।

राष्ट्रीय सहारा देहरादून ने खुद को किस कैटगरी में रखा है, यह तो सहायक श्रम आयुक्त को दिये गए प्रपत्र से साफ नहीं हो रहा है। लेकिन सौंपे गए दस्तावेज के अनुसार ये अपने सब एडिटर को 12000 से 21700 रुपये, सीनियर सब एडिटर को 13000 से 23500 रुपये और चीफ सब एडिटर को 14000 से 25300 रुपये का पे स्केल देने के कागजात पेश किये हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि एक कर्मचारी की तरह आठ घंटे काम करने वालों को प्रबंधन ने अपना कर्मचारी नहीं माना है जबकि मजीठिया वेजबोर्ड ने एक साल की नियमित सेवा वाले को भी कर्मचारी का दर्जा देने की बात कही है। दुखद स्थिति यह है कि संविदा पर चार साल से काम करने वाले चीफ सब एडिटर का पे स्केल सब एडिटर से काफी कम रखा गया है। 1992 से सेवा देने वाले और 2007 से नौकरी शुरू करने वालों को एक पद दिया गया है। देहरादून संस्करण को शुरू हुए सात साल हो गए। कुछ कर्मचारियों को इस अवधि में एक दो प्रमोशन दे दिये गए तो कुछ को 12-15 साल से प्रमोशन नहीं मिला।


अपडेट…  कर्मचारियों की लिस्ट में अपना नाम न पाकर राष्ट्रीय सहारा देहरादून के संवादसूत्र भड़के


दस्तावेज देखने के लिए नीचे लिखे Next पर क्लिक करें>>

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मजीठिया वेज बोर्ड इंप्लीमेंटेशन रिपार्ट पर दिल्ली के श्रम मंत्री गोपाल राय नाराज, श्रम विभाग के अफसरों पर गिरेगी गाज

नई दिल्ली : सु्प्रीम कोर्ट द्वारा सभी राज्यों से मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने की मांगी गई रिपोर्ट पर दिल्ली में बवाल मच गया है। सूत्रों का कहना है कि श्रम विभाग ने अपनी मनमानी की रिपार्ट बिना मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और श्रम मंत्री को दिखाए यहां तक कि बिना बताए ही सुप्रीम कोर्ट में जमा कर दी है। इस बिना सिर-पैर और मालिकों व प्रबंधन के बयानों पर आधारित 23 पेज की रिपार्ट पर श्रम मंत्री गोपाल राय काफी नाराज बताए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में श्रम विभाग द्वारा अपनी तरफ से रिपोर्ट पेश कर दिए जाने की खबर से खुद श्रम मंत्री हैरान थे।

बताया जा रहा है कि उन्होंने तुरंत नव नियुक्त श्रमायुक्त को तलब किया और रिपोर्ट फिर से तैयार करने को कहा। हो सकता है दिल्‍ली सरकार अतिरिक्‍त रिपोर्ट भी पेश करे। समझा जा रहा है कि उन्होंने इस तरह की रिपार्ट और श्रम विभाग के अधिकारियों की लापरवाही के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं। ऐसे में तय है कि जल्दी ही श्रम विभाग के कई अधिकारियों पर गाज गिरने वाली है।

एक और सूत्र ने खबर दी है कि रिपोर्ट तैयार करने से पहले अल्पकालीन तत्कालीन श्रमायुक्तस मधु तेवतिया को इस बारे में सरकार की संवदेनशीलता के बारे में बताया गया था। लेकिन इसके बावजूद विभाग ने इस तरह की रिपार्ट पेश की। यह भी कहा जा रहा है कि तत्कालीन संयुक्त श्रमायुक्त कपिल सिंह द्वारा तैयार प्रोफारमा के अनुसार भी यह रिपार्ट तैयार नहीं की गई है। इस बारे में कहा जा रहा कि सरकारी वकील ने अधिकारियों को मौजूदा रूप में रिपार्ट बनाने की सलाह दी थी।

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रोहन जगदाले हाजिर हों…

जिया नामक चैनल और मैग्जीन लांच करने वाले रोहन जगदाले लापता हैं. तभी तो वो मीडियाकर्मियों के बकाये को लेकर लेबर आफिस में चल रही लड़ाई में उपस्थित नहीं हो पा रहे हैं. मीडियाकर्मियों ने उदारता दिखाते हुए उन्हें खुद मेल और पत्र के जरिए सूचित किया है कि वे अगली तारीख पर नोएडा लेबर आफिस आ जाएं अन्यथा उनकी गैरमौजूदगी में एकपक्षीय फैसला सुनाया जा सकता है… देखें पत्र….


मीडिया को लेकर आपके पास भी कोई खबर सूचना जानकारी हो तो उसे भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं. 

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मजीठिया वेतनमान : चंडीगढ़ का श्रम विभाग नहीं रखता मीडिया कर्मियों का कोई लेखा-जोखा

मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के क्रियान्वयन की जांच-पड़ताल के लिए नोडल अफसरों/इंस्पेक्टरों की नियुक्ति/तैनाती/मनोनयन/नामजदगी की खातिर निर्धारित अवधि पूरी होने में करीब डेढ़ हफ्ता रह गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इस काम के लिए 28 अप्रैल 2015 से चार हफ्ते का समय दिया था। यह आदेश राज्य सरकारों को जारी किया गया था जो अपने मुख्य सचिवों के मार्फत काम-कार्यवाही करती हैं। कुछ या कई राज्य सरकारें इस आदेश पर अमल की दिशा में सक्रिय हो गई हैं। मसलन, हरियाणा के मुख्य सचिव ने श्रम विभाग के आला अधिकारियों के साथ बैठक, विचार-विमर्श शुरू कर दिया है।

दिल्ली श्रम विभाग द्वारा इंडियन एक्सप्रेस को प्रेषित नोटिस की तीन फोटो प्रतिलिपियां – 

 

केंद्र शासित राज्य चंडीगढ़ की प्रशासनिक सरकार क्या कर रही है? यह जानने की जिज्ञासा-उत्सुकता-बेचैनी चंडीगढ़ के प्रिंट मीडिया के कर्मियों में होना स्वाभाविक है। इसी के तहत जब हमने जानने की कोशिश की, छानबीन की तो, जो पता चला वह हैरान करने, चौंकाने, होश उड़ाने वाला रहा। पता चला कि चंडीगढ़ श्रम विभाग के असिस्टेंट लेबर कमिश्नर के वहां केवल एक अखबार -द ट्रिब्यून- का ही रजिस्ट्रेशन है। फैक्टरी एक्ट के तहत महज यही अखबार रजिस्टर्ड है। दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, इंडियन एक्सप्रेस, अमर उजाला, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, पंजाब केसरी आदि दूसरे अखबारों का इस एक्ट के अंतर्गत यहां पंजीकरण मौजूद नहीं है। 

यह पूछने पर कि ये सारे अखबार तो चंडीगढ़ से ही निकलते हैं। इनका तकरीबन सारा संपादकीय, प्रशासनिक, विज्ञापन,एकाउंट्स, सर्कुलेशन आदि का काम-काज चंडीगढ़ से ही होता है। तो फिर इन अखबारों का रजिस्ट्रेशन यहां क्यों नहीं हुआ है, या क्यों नहीं कराया गया है, या क्यों उपलब्ध नहीं है? जवाब मिला कि इन अखबारों की प्रिंटिंग चूंकि यहां नहीं, कहीं और होती है, इसलिए इनका रजिस्ट्रेशन यहां नहीं है। यह पूछने पर कि -चलिए ठीक है, माना कि इन अखबारों का फैक्टरी एक्ट के तहत पंजीकरण नहीं है लेकिन कर्मचारियों का लेखा-जोखा, हिसाब-किताब, उनकी कार्य स्थिति, उनको मिलने वाली सेलरी व अन्य सुविधाओं की बाबत जानकारी तो इस विभाग के पास होनी चाहिए? जवाब मिला- नहीं, हमारे पास तो केवल द ट्रिब्यून के नौ सौ कर्मचारियों का लेखा-जोखा है। हां, कभी इंडियन एक्सप्रेस का बही-खाता हम रखते थे, लेकिन उसका प्रेस एवं ऑफिस जब से पंचकूला शिफ्ट हो गया है, हम उसकी स्थिति से नावाकिफ हैं। 

यह बताने-ध्यान खींचने पर कि दैनिक भास्कर का चंडीगढ़ सेक्टर 25 में विशाल प्लाट-बिल्डिंग है, उसके बेसमेंट में प्रिंटिंग की अत्याधुनिक मशीनरी स्थापित है, उसके संपादकीय, विज्ञापन, एकाउंट्स, प्रोडक्शन, आईटी, प्रशासन, ह्यूमन रिसोर्स (एचआर), विज्ञापन अनुवाद आदि के अनेक विभाग एवं आफिसेज हैं। उसकी लाइब्रेरी है। उसके सीपीएच यानी चंडीगढ़, पंजाब एवं हरियाणा के हर विभाग के मुखियों का इसी बिल्डिंग में ऑफिस है। चंडीगढ़-पंजाब के स्टेट संपादक, जिनका नाम प्रिंट लाइन में छपता है, यहीं विराजते हैं। इन तीनों राज्यों के समस्त भास्कर कर्मचारियों की सेलरी यहीं बनती है। उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरतों की जानकारी, पूछताछ, उन्हें पूरा करने के तौर-तरीकों का रिकॉर्ड यहीं रखा जाता है। तो फिर लेबर डिपार्टमेंट के पास उनके बारे में जानकारी क्यों नहीं है? यही नहीं, द वर्किंग जर्नलिस्ट्स एंड अदर न्यूजपेपर इंप्लाईज (कंडीशन ऑफ सर्विस एंड मिस्लेनियस प्रॉविजन्स) एक्ट, 1955 और द वर्किंग जर्नलिस्ट्स (फिक्सेशन ऑफ रेट्स ऑफ वेजेज) एक्ट 1958 के प्रावधानों को सटीक-ठीक ढंग से अखबारों में लागू कराने की जिम्मेदारी भी श्रम विभाग की है। इस दायित्य को क्या वह पूरा कर रहा है? यदि नहीं, तो क्यों? ऐसा क्यों है कि वह इस अनिवार्य कार्य को पूरा करने में विफल है, शिथिल है, लाचार है, असमर्थ है? 

इन सवालों की अनदेखी-उपेक्षा करके हमें केवल यह बताया गया कि दैनिक भास्कर का जब तक (शायद 2005 तक) रजिस्ट्रेशन था, हमारे पास क्वार्टरली रिपोर्ट आती रहती थी। उसके कर्मचारियों के वेज आदि की जानकारी रहती थी। जब से पंजाब के सरहिंद में उसका प्रिंटिंग प्रेस लग गया है, उसका रजिस्ट्रेशन खत्म हो गया है। 

मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के क्रियान्वयन की तहकीकात करने के लिए नोडल अफसरों/इंस्पेक्टरों की नियुक्ति की बाबत पूछे जाने पर इस महकमे के हर ओहदेदार ने अनभिज्ञता का इजहार किया। सुप्रीम कोर्ट का आदेश तो एक संबंधित जिम्मेदार ओहदेदार को मुझे पढक़र सुनाना पड़ा। तब उनकी प्रतिक्रिया थोड़ी सकारात्मक हुई। फिर भी उन्होंने यही कहा-ऊपर से जो निर्देश मिलेगा, उसके अनुसार इसे अमल में लाया जाएगा। उन्होंने यह जरूर बताया कि ट्रिब्यून ने मजीठिया वेज बोर्ड लागू कर दिया है। 

चंडीगढ़ दैनिक भास्कर से जुड़ी एक अहम जानकारी, जो इस संदर्भ में ज्यादा प्रासंगिक है कि इस कथित सबसे बड़े मीडिया ग्रुप ने भले ही अपना प्रिंटिंग प्रेस सरहिंद में लगाया हुआ है, पर चंडीगढ़ का प्लाट जो प्रिंटिंग प्रेस लगाने के लिए ही लिया था, इसे बचाए रखने के लिए उसने प्रोडक्शन के 15-16 कर्मचारियों को यहां तैनात कर रखा है। यही नहीं, जैसा कि जानकार बताते हैं कि भास्कर मैनेजमेंट ने श्रम विभाग के अफसरों-इंस्पेक्टरों को पटाकर फर्जी-झूठा-नकली दस्तावेज बना-तैयार करवा रखा है कि दैनिक भास्कर चंडीगढ़ में ही छपता है। इससे जुड़ी कोई फीस-धनराशि चंडीगढ़ ट्रेजरी में नियमित तौर पर जमा कराई जाती है। मैनेजमेंट के कुछ खास गुर्गों को छोड़ कर किसी को नहीं मालूम कि कर्मचारियों के बारे में पूरी जानकारी आखिर श्रम विभाग के किस-कहां के ऑफिस में दी जाती-पेश की जाती-रखी जाती है। 

दिल्ली श्रम विभाग ने पेश की नजीर

बहरहाल, चर्चा हो रही है मजीठिया क्रियान्वयन की तफतीश करने, उसकी जानकारी सुप्रीम कोर्ट को देने, तो इस बारे में दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने बाजी मारते हुए अन्य सारी राज्य सरकारों के लिए एक नजीर पेश कर दी है। इस सरकार ने दिल्ली के सभी प्रिंट मीडिया संस्थानों को नोटिस ही नहीं, उसका रिमाइंडर भी भेज दिया है। मैनेजमेंट से स्पष्ट तौर पर कह दिया है कि इस नोटिस का जवाब निर्धारित समय में दें, अन्यथा कानून अपना काम करेगा।  इसी तरह का एक नोटिस इंडियन एक्सप्रेस को भी भेजा गया है जिसकी प्रतिलिपि इस आलेख के साथ संलग्न है। इसका अवलोकन करना और इसमें दी गई सूचनाओं-जानकारियों के मुताबिक मजीठिया के लिए अपनी डिमांड रखना-उसे हासिल करना लाजिमी है। 

साथियो! नोडल अफसरों/इंस्पेक्टरों को अपने वेज व संबंधित मीडिया संस्थान से प्राप्त सुविधाओं-असुविधाओं को विस्तार से बताएं। और कोशिश करें कि इस नोटिस में उल्लिखित जानकारी के अलावा कोई जानकारी-सूचना छूट रही है तो उसे भी इसमें संबद्ध कर लें, जोड़ लें। 

भूपेंद्र प्रतिबद्ध, चंडीगढ़ से संपर्क : 9417556066

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मजीठिया : चुस्ती से रखें इंस्पेक्टरों और अफसरों के सामने अपना पक्ष

मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के अनुसार वेतन एवं सुविधाएं पाने-लेने-हासिल करने के लिए संघर्षरत साथियों और असंघर्षरत, सुस्त, सुप्त, निश्चल, शिथिल, निष्क्रिय, लुंज-पुंज, बाटजोहू, लालायित, लार टपकाऊ मित्रों सुप्रीम कोर्ट ने आपके सामने एक ऐसा अवसर उपलब्ध कराया कि यदि इसे चूक गए तो पछतावा भी आपको झटक देगा, हाथ नहीं लगाने देगा। मतलब यह कि संघर्ष कर रहे और इसके विपरीत आचरण-व्यवहार-बर्ताव में लीन लेकिन अंदरखाते मजीठिया की ललक से लबरेज सभी मीडिया कर्मचारियों के लिए उन इंस्पेक्टरों-अधिकारियों को अपनी पीड़ा-परेशानी बयां करनी-बतानी है जिनकी नियुक्ति-तैनाती राज्य सरकार के मुख्य सचिव की देख-रेख में की जा रही है। 

इसके लिए सबसे पहले सेलरी स्लिप, नियुक्ति के सारे कागजात, यदि कोई प्रमोशन हुई है तो उससे संबंधित दस्तावेज एवं उससे संबद्ध वेतनवृद्धि के डाक्यूमेंट आदि संजो लें। साथ ही मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से आपकी जो सेलरी बनती है उसका भी अनुमानित खाका तैयार कर लें। साथ ही मौजूदा सेलरी एवं मजीठिया के हिसाब से बनने वाली सेलरी के बीच का अंतर ठीक से तैयार कर लें। और 11 नवंबर 2011 से बनने वाले एरियर को ठीक से समझ लें।  फिर जब इंस्पेक्टर-अधिकारी जांच-पड़ताल, जानकारी लेने के लिए आपसे संपर्क करें या आपको बुलाए तो उन्हें पूरी जानकारी बेझिझक-खुलकर दें-बताएं। निश्चित ही यह सारा काम लिखित में होगा, ऐसे में संभव हो तो उन इंस्पेक्टर-अधिकारी महोदय से रिसीविंग ले लें। ऐसा करके आपको तसल्ली रहेगी कि आप द्वारा प्रदत्त किसी भी दस्तावेज-डाक्यूमेंट-कागजात में कोई हेरा-फेरी नहीं होगी। और उसी के मुताबिक रिपोर्ट लेबर कमिश्नर के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगी। 

हां, लेबर कमिश्नर की चर्चा से याद आया कि लेबर डिपार्टमेंट का रुख-रवैया-कामकाज-कारनामा-करतूत हमेशा ही श्रम विरोधी, मजदूर-कामगार-कर्मचारी विरोधी रहा है और है। आगे, खासकर मजीठिया के मामले में उसका रवैया कैसा रहेगा, भूमिका कैसी रहेगी, इसे लेकर संदेह का घटाटोप बेहद गहरा है। हमारे-आपके-इनके-उनके सबके अनुभव-तजुर्बे तो यही कहते-बयां करते हैं। सारे अनुभव एक ही निष्कर्ष बोलते हैं कि लेबर इंस्पेक्टर, लेबर अफसर, यहां तक सारा लेबर डिपार्टमेंट केवल और केवल मालिकों की चाकरी करता है और उसके टुकड़ों पर ललचाई नजरें गड़ाए रहता है। टुकड़ा-बख्शीश मिलते ही दुम दबाकर सरक लेता है। और कंपनियों-संस्थाओं-कारखानों-मिलों-व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के मालिक-नियोक्ता श्रम कानूनों को रद्दी की टोकरयिों में डालते हुए कर्मचारियों के शोषण, उनके उत्पीडऩ, उन्हें तरह-तरह से परेशान करने का खुला तांडव करते हैं। कर्मचारियों की पीड़ा-परेशानी-दोहन-शोषण से अपनी तिजोरियों को बेतहाशा भरते चले जाते हैं। कभी-कभार जब कर्मचारी इस दोहन-उत्पीडऩ के तांडव का विरोध करने के लिए मुखर होकर सामने आ जाते हैं तो इन शोषकों के होश उड़ जाते हैं। बावजूद इसके वे कर्मचारियों के हित में रत्ती भर कुछ करें, उल्टे बेकायदगी का सहारा लेकर वे कर्मचारियों को परेशान करने के नए हथकंडे अपनाने लगते हैं। उनके इन अमानवीय-शैतानी-राक्षसी कृत्य में श्रम कानून और इसका कथित रखवाला श्रम विभाग मालिकों को परोक्ष-अपरोक्ष हर तरह की मदद करने को तत्पर हो जाता है, रहता है। 

यही डर, यही भय, यही आशंका आज हम मीडिया कर्मियों को खाए जा रही है- हो न हो सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार नियुक्त इंस्पेक्टर, अफसर अपनी जांच-पड़ताल में मीडिया मालिकों-मैनेजमेंट से मिलकर केवल उन्हीं का पक्ष जानें, महज उन्हीं से जानकारी लें, उन्हीं के बनाए-परोसे दस्तावेजों पर ध्यान दें, सही मानें। कर्मचारियों से मिलने, उनका पक्ष जानने, उनकी परेशानियों-दिक्कतों-संकटों-मुसीबतों को साझा करने का जहमत ही न उठाएं। इसी खौफ-डर-शंका के वशीभूत कर्मचारियों के एक बड़े हिस्से ने सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा आदेश को मालिकों के हित-पक्ष वाला करार दिया था, बताने लगा था। इसे हवा भी देने वाले अनगिनत लोग हो गए थे, और हैं भी। पर ऐसा है नहीं। ठीक है, लंबा अनुभव हमें इसे मानने से रोकता है। लेकिन यह आदेश सर्वोच्च न्यायालय का है, कंटेप्ट खुला हुआ है। अब आप ही सोचिए यदि इन अफसरों-इंस्पेक्टरों ने गलत, भटकाने वाली, तुड़ी-मुड़ी रिपोर्ट पेश की और सबसे बड़ी अदालत को इसका भान हो गया तो अंजाम क्या होगा! क्या अपने आदेश के प्रतिकूल जाने पर माननीय अदालत उन्हें बख्श देगी? नहीं साथियों, इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। 

इसलिए जरूरी है कि हम पूरी तरह सतर्क-सावधान-सजग रहें। ऐेसी हर गतिविधि पर नजर रखें जो मजीठिया पाने की राह में अवरोध-गतिरोध-बाधक-रोड़ा बनती लगती हो। इसके लिए हमें बहुत सक्रिय होना पड़ेगा। हाथ पर हाथ धरे रखने का वक्त अतीत की गोद में दुबक गया है। इस क्रम में हमें लेबर डिपार्टमेंट के दफ्तर, लेबर कमिश्नर के ऑफिस और इससे संबद्ध सभी दफ्तरों में आना-जाना, वहां जानकारी का आदान-प्रदान करना, अपनी बात को पुरजोर ढंग से रखना, संभव हो तो अपना पक्ष लिखित रूप से रखने में जुट जाना चाहिए। हमारे लिए यह एक अनिवार्य कार्य-उपक्रम है, जिसमें मुस्तैदी से संलग्न होना लाजिमी है। यानी कि लेबर डिपार्टमेंट एवं संबद्ध अनुभागों पर अपनी सक्रियता से दबाव बनाना, अपने पक्ष में एक अनुकूल माहौल बनाना बहुत जरूरी है। तभी आशंकित गड़बडिय़ों-बदमाशियों-साजिशों पर रोक लगेगी। 

भई, सुप्रीम कोर्ट की अपनी अलग से कोई मशीनरी तो है नहीं, जो सीधे उसकी निगरानी, उसके संरक्षण में काम करेगी! उसे रिपोर्ट तो इसी तंत्र के माध्यम से लेनी है। सो वह ले लेगी। हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह लोक का तंत्र है। बेशक यह तंत्र बहुत खराब है, हो गया है, लेकिन लोक तो हमीं हैं अगर हम सजग-सतर्क हो जाएं, रहे, तो इसमें सुधार होने से कोई नहीं रोक सकता। मेरे एक साइंसदां मित्र ने एक बार एक सच्ची लेकिन हैरान करने वाली बात बताई। उन्होंने कहा,- हमारा पर्यावरण बेहद विषैला हो गया है, सांस लेने तक में दिक्कत आम हो गई है। लेकिन आक्सीजन तो हमें इसी प्रदूषित पर्यावरण की पर्तों से ही मिल रही है! 

लेखक भूपेंद्र प्रतिबद्ध से संपर्क : 9417556066

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यकूम मई : उम्मीद के मजदूर

एक मई की तारीख कितने लोगों को याद है? बस, उन चंद लोगों के स्मरण में एक मई शेष रह गया है जो आज भी इस उम्मीद में जी रहे हैं कि एक दिन तो हमारा भी आएगा. वे यह भी जानते हैं कि वह दिन कभी नहीं आएगा लेकिन उम्मीद का क्या करें?

उम्मीद है कि टूटती नहीं और हकीकत में उम्मीद कभी बदलती नहीं. एक वह दौर था जब सरकार की ज्यादती के खिलाफ, अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाने मजदूर सडक़ों पर चले आते थे. सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध करते हुये लाठी और गोली खाकर भी पीछे नहीं हटते लेकिन दुर्भाग्य देखिये. कैलेंडर पर जैसे-जैसे तारीख आगे बढ़ती गयी, मजदूर आंदोलन वैसे वैसे पीछे होता गया. अब तो मजदूर संगठनों की स्थिति निराशाजनक है. यह निराशा मजदूर संगठनों की सक्रियता की कमी की वजह से नहीं बल्कि कार्पोरेट कल्चर ने निराशाजनक स्थिति उत्पन्न की है.  मजदूर एकता जिंदाबाद के नारे सुने मुझे तो मुद्दत हो गये हैं. आपने शायद कभी सुना हो तो मुझेे खबर नहीं. भारत सहित समूचे विश्व के परिदृश्य को निहारें तो सहज ही ज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी कि मजदूर नाम का यह शख्स कहीं गुम हो गया है. 

कार्पोरेट सेक्टर के दौर में मजदूर यूनियन गुमशुदा हो गये हैं. एक के बाद एक संस्थानों का निजीकरण किया जा रहा है. निजी संस्थाओं को मजदूरों की जरूरत नहीं होती है. दस मजदूरों का काम एक मशीन करने लगी है. कार्पोरेट सेक्टर को मजदूर नहीं गुलाम चाहिये. मजदूर कभी गुलाम नहीं हो सकता है. मशीन गुलाम होती है और गुलाम का कर्तव्य होता है आदेश का पालन करना. मशीन कभी आवाज नहीं उठाती है.  लगातार बढ़ती यंत्र व्यवस्था ने समूचे सामाजिक जीवन का ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर दिया है. हमारी जरूरतों के उत्पादों के निर्माण में यंत्रों के उपयोग से समय की बचत हो रही है, गुणवत्ता भी शायद ज्यादा होगी लेकिन जीवंतता नदारद है. एक मजदूर के बुने गये कपड़ों में उसकी सांसों की गर्मी सहज रूप से महसूस की जा सकती है. उसके द्वारा बुने गये धागों में मजदूर की धडक़न को महसूस किया जा सकता है. एक मशीन के उत्पाद में कोई जीवंतता नहीं होती है. इन उत्पादों से मनुष्य की बाहरी आवश्यकताओं की पूर्ति तो हो रही है किन्तु मन के भीतर संतोष का अभाव महसूस किया जा सकता है. 

इस यंत्र व्यवस्था ने न केवल मजदूरों का हक छीना बल्कि लघु उद्योगों को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया है. हर तरफ यंत्र ने ऐसा कब्जा जमाया है कि आम आदमी स्वयं का गुलाम होकर रह गया है. रेल्वे स्टेशनों पर आपको कुलियों की फौज देखने को नहीं मिलेगी क्योंकि इस यांत्रिक व्यवस्था ने हर मुसाफिर को कुली बना दिया है. भारी-भरकम सूटकेस में लगे पहियों को खींचते हुये वह पैसा बचाने में लगा है. सूटकेस में लगे पहिये कुलियों को चिढ़ा रहे हैं और शायद कह रहे हैं ले, अब हो गई तेरी छुट्टी. छुट्टी कुली के रोजगार की ही नहीं हुई है बल्कि उसके चौके-चूल्हे की भी हो गई है. मजदूरी नहीं मिलेगी तो चूल्हा जलेगा कैसे? ऐसे कई काम-धंधे हैं जिन्होंने कामगारों के हाथों को बेकार और बेबस किया है.

सत्ता और शासकों की नींद उड़ा देने वाली आवाज आहिस्ता आहिस्ता मंद पडऩे लगी है. यंत्रों ने जैसे मजदूरों की शेर जैसी दहाड़ को अपने भीतर कैद कर लिया है. शायद यही कारण है कि मजदूर दिवस की ताप से अब समाज गर्माता नहीं है. सोशल मीडिया में भी मई दिवस की आवाज सुनाई नहीं देती है. अखबार के पन्नों पर कहीं कोई खबर बन जाये तो बड़ी बात, टेलीविजन के पर्दे पर भी मजदूर दिवस एक औपचारिक आयोजन की तरह होता है. हैरान नहीं होना चाहिये कि आपका बच्चा कहीं आपसे यह सवाल कभी कर बैठे-यह मजदूर क्या होता है? नयी पीढ़ी को तो यह भी नहीं पता कि एक मई क्या होता है?  इस विषम स्थिति के बावजूद मजदूर उम्मीद से है. उसे इस बात का इल्म है कि दुनिया बदल रही है. इस बदलती दुनिया में मजदूर की परिभाषा भी बदल गई है लेकिन मजदूर और किसान कभी नाउम्मीद नहीं होते. उनकी दुनिया बदल जाएगी, इस उम्मीद के साथ वे जीते हैं. वे मौका आने पर कह भी देते हैं कि – ‘हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे/इक गांव नहीं, इक खेत नहीं, सारी की सारी दुनिया मांगेंगे. उम्मीद से जीते मजदूर और मजदूर दिवस को मेरा लाल सलाम. 

लेखक मनोज कुमार ई-मेल संपर्क : k.manojnews@gmail.com

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होशियार ! मजीठिया मामले पर मीडिया हाउसों और लेबर डिपॉर्टमेंट के बीच दलाल हरकतें तेज, चार लाख की घूसखोरी !!

लखनऊ : ताजा सूचना है कि यहां से प्रकाशित एक अखबार के अधिकारी ने लेबर डिपार्टमेंट के एक दलाल को चार लाख रुपए दिए हैं। इसी दलाल ने कुछ दिन पहले मजीठिया मामले से संबंधित आरटीआई के जवाब में गोल-मटोल कर फाइल को लौटा दिया था।  

एक वरिष्ठ न्यूज रिपोर्टर ने बताया कि आज लेबर डिपार्टमेंट के अधिकारी वाट्सेप्प पर ऑल इंडियाल लेवल पर मजीठिया से संबंधित मैटर को दबाने के लिए घूसखोरी का मोलतोल कर रहे हैं। उससे संबंधित मैसेज एक दूसरे को पास कर रहे हैं। लेबर डिपार्टमेंट के पास पूरी पॉवर है, मजीठिया लागू करवाने और आरोपियों को जेल भेजवाने तक की, लेकिन वे कानून के मुताबिक काम नहीं करते हैं। 

रिपोर्टर ने बताया कि उसने मजीठिया के संबंध में जब लेबर डिपार्टमेंट के एक अफसर से कुछ जानना चाहा तो उसने उसके मीडिया मैनेजमेंट को बता दिया कि अब रिपोर्टर भी मजीठिया मैटर का अपडेट पूछ रहे हैं। लेबर डिपार्टमेंट के अफसर कहते हैं कि रोज प्रेस के मैटर को ही देखेंगे तो कैसे काम होगा। उनको पूरे स्टेट के फैक्ट्री-कारखानों को देखना पड़ता है। कहीं कोई लेबर प्रॉब्लम तो नहीं है। मीडिया के लोग तो बहुत पॉवरफुल हैं। बड़े वेतनभोगी हैं। सभी मीडियाकर्मी एक स्टैंडर मेंटेन करते हैं। वे पर्याप्त वेतन मिलने से खुश और संतुष्ट हैं। कोई कर्मचारी असंतुष्ट है तो शिकायत करे।

अब बात ये बनती है कि क्यों नहीं सेंट्रल या स्टेट लेबर ऑफिस के स्तर पर इन गतिविधियों की पड़ताल कराई जाए कि 2011 के बाद इन लोगों ने कितने पैसे का खेल किया है। इस समय मजीठिया मामले को सुप्रीम कोर्ट में असफल करने के लिए मीडिया प्रबंधन हर स्तर पर सक्रिय है। उसे देखते हुए मीडियाकर्मियों को भी इस समय पूरी तरह चौकन्ना रहना होगा। मीडिया कर्मियों को अपने स्थानीय श्रम कार्यालयों की गतिविधियों पर भी निगाह रखकर चलना होगा। 

मजीठिया मंच फेसबुक वॉल से

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जागरण के पत्रकार ने नोएडा के उप श्रमायुक्त की श्रम सचिव और श्रमायुक्त से की लिखित शिकायत

मजीठिया मामले में अपने को पूरी तरह से घ‍िरा पाकर दैनिक जागरण प्रबंधन इतना बौखला गया है कि अब वह हमला कराने, घूसखोरी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने पर उतर आया है। इस बात के संकेत उस जांच रिपोर्ट से मिल रहे हैं, जिसके लिए जागरण के पत्रकार श्रीकांत सिंह ने उप श्रम आयुक्त को प्रार्थना पत्र दिया था। जांच के लिए पिछले 21 फरवरी 2015 को श्रम प्रवर्तन अध‍िकारी राधे श्याम सिंह भेजे गए थे। यह अफसर इतना घूसखोर निकला कि उसने पूरी जांच रिपोर्ट ही फर्जी तथ्यों के आधार पर बना दी। उसने जांच रिपोर्ट में बतौर गवाह जिन लोगों के नाम शामिल किए हैं, उनमें से कोई भी घटना के मौके पर मौजूद नहीं था।

इस बात के पुख्ता प्रमाण श्रीकांत सिंह के पास हैं, क्योंकि उन्होंने मौके की फोटोग्राफी भी अपने स्मार्ट फोन से कर ली थी। इन गवाहों में दो लोग तो घटना के दिन बरेली में थे और एक सहयोगी अवकाश पर थे। नोएडा के उप श्रम आयुक्त कार्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार से लोगों में रोष व्याप्त है क्योंकि इसी विभाग पर सताए जा रहे श्रमिकों को राहत पहुंचाने की जिम्मेवारी होती है। यह जानकारी सीबीआई को भी दे दी गई है। अब देखना यह है कि इन भ्रष्ट अफसरों पर कब और कहां से कार्रवाई होती है। श्रम आयुक्त से जो श‍िकायत की गई है, वह मूल रूप में नीचे दी जा रही है। श्रम प्रवर्तन अध‍िकारी की जांच रिपोर्ट आप खुद देखें, सच का पता अपने आप चल जाएगा। 

सेवा में,
श्रम आयुक्त महोदय
विषय : दैनिक जागरण प्रबंधन के इशारे पर मुझे नौकरी से निकाले जाने की साजिश की गलत जांच रिपोर्ट देने के बारे में
मान्यवर,

निवेदन है कि मैं पिछले 20 वर्षों से दैनिक जागरण की नोएडा यूनिट में कार्य कर रहा हूं और इस समय मुख्य उपसंपादक के पद पर कार्यरत हूं। मजीठिया वेतन आयोग के अनुसार वेतन देने से बचने और इस संदर्भ में माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का खुला उल्लंघन करने के लिए दैनिक जागरण प्रबंधन मुझे नौकरी से निकालने की साजिश रच रहा है। इस संदर्भ में मैंने जब नोएडा के उप श्रम आयुक्त कार्यालय में अर्जी दी तो उसकी गलत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। जब मैंने जांच रिपोर्ट पर एतराज जताया तो मुझे उप श्रम आयुक्त कार्यालय में अपमानित किया गया। इसलिए मजबूर होकर मुझे आपको आवेदन देना पड़ रहा है। आशा है मेरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की अनुकंपा करेंगे। मामला इस प्रकार है-

1-28 दिसंबर 2013 को मेरा तबादला जम्मू कर दिया गया, लेकिन मेरे तबादले की कोई सूचना अथवा डाटा जम्मू नहीं भेजा गया और उसके लिए मुझे अप्रैल 2014 तक परेशान किया गया। इस दौरान मुझे कोई वेतन नहीं दिया गया, जिससे मेरी माली हालत बहुत खराब हो गई। परिवार और सामान के साथ जम्मू जाने के लिए मुझे न तो कोई खर्च दिया गया और न ही कोई पदोन्नति अथवा वेतन बढ़ोतरी दी गई। ऐसी हालत में परिवार के साथ जम्मू स्थानांतरित होना संभव नहीं था। मुझे इस समय मात्र 25 हजार रुपये वेतन दिया जा रहा है, जिसमें जम्मू का 10 हजार रुपये खर्च और बढ़ गया। मुझे इस आश्वासन के साथ जम्मू भेजा गया कि मेरी माली हालत सुधारने के लिए क्षतिपूर्ति की जाएगी, जिस पर आज तक कोई विचार नहीं किया गया।

2-नोएडा कार्यालय के इशारे पर मुझे जम्मू कार्यालय में उठवा लेने की धमकी दी गई और मुझे अशुद्ध पानी पीने के लिए मजबूर किया गया। मेरी तबीयत खराब होने लगी तो मैंने पानी की शुद्धता पर सवाल उठाया। इस पर वहां के महाप्रबंधक ने मुझे धमकाया और पानी के मामले में माफीनामा लिखवा लिया। यह बात मैंने नोएडा कार्यालय को बताई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस बात की जांच जम्मू कार्यालय के कर्मचारियों और मेरी मेडिकल जांच रिपोर्ट से की जा सकती है।

3-इसी बीच 7 फरवरी 2015 को जागरण प्रबंधन की प्रताड़ना के विरोध में नोएडा कार्यालय के कर्मचारियों ने काम बंद हड़ताल कर दी। हड़ताल वापस लेने के लिए दैनिक जागरण प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच समझौता हुआ। समझौते के तहत प्रताडि़त करने के लिए हाल में किए गए तबादले वापस लिए जाने थे। उसी के तहत मुझे 10 फरवरी 2015 को बातचीत के लिए बुलाया गया था। जब मैं कार्यालय में प्रवेश करने लगा तो गार्डों से मुझ पर हमला करा दिया गया और मेरी जेब से 36 हजार रुपये निकाल लिए गए। मैंने मौके पर पुलिस पीसीआर वैन बुला ली, लेकिन गार्डों ने कार्यालय का गेट अंदर से बंद कर लिया और पुलिस को जांच में कोई सहयोग नहीं दिया गया।

4-मेरे आवेदन पर उप श्रम आयुक्त कार्यालय, नोएडा से 21 फरवरी 2015 को श्रम प्रवर्तन अफसर राधे श्याम सिंह को जांच के लिए भेजा गया, लेकिन उन्होंने ठीक से पूछताछ किए बगैर दैनिक जागरण प्रबंधन को क्लीन चिट दे दी और मेरी समस्या पर कोई विचार नहीं किया। मैंने दैनिक जागरण, नोएडा के महाप्रबंधक श्री नीतेंद्र श्रीवास्तव और कार्मिक प्रबंधक श्री रमेश कुमार कुमावत को मेल भेज कर अपने पक्ष से अवगत कराया, लेकिन मुझे न तो मेल का कोई जवाब दिया गया और न ही मुझे कार्यालय में प्रवेश करने दिया जा रहा है। इस प्रकार मुझे गैरहाजिर दिखा कर और वेतन से वंचित रखकर दैनिक जागरण प्रबंधन मुझे नौकरी से निकालने की साजिश रच रहा है।

भवदीय
श्रीकांत सिंह
मुख्य उपसंपादक
संपादकीय विभाग, दैनिक जागरण  
नोएडा

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बंद हो चुके ‘भास्कर न्यूज’ चैनल के मालिकों-संपादकों में घमासान, लेबर डिपार्टमेंट ने आरसी जारी की

‘भास्कर न्यूज’ चैनल के शीर्षस्थ लोगों में घमासान शुरू हो चुका है. खबर है कि राहुल मित्तल ने हेमलता अग्रवाल व समीर अब्बास के खिलाफ नोएडा के किसी थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया है. उधर, हेमलता अग्रवाल और समीर अब्बास ने भी राहुल मित्तल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने हेतु थाने में तहरीर पहले से दे रखा है. सूत्रों के मुताबिक चैनल के फेल होने के बाद इसका ठीकरा एक दूसरे पर फोड़े जाने की कवायद शुरू हो गई है.

उधर, चैनल के कर्मचारियों को जो चेक दिए गए वो बाउंस हो गए हैं. ये पीड़ित कर्मचारी अब कोर्ट में हेमलता अग्रवाल को घसीटने की तैयारी कर रहे हैं. दर्जनों कर्मचारियों ने पहले से ही लेबर डिपार्टमेंट में कई महीने की सेलरी और फुल एंड फाइनल सेटलमेंट न देने को लेकर चैनल के मालकिन के खिलाफ केस डाल रखा है. श्रम विभाग ने चैनल के मालिकों को कई बार नोटिस भेज कर सेटलमेंट करने को कहा लेकिन हर बार चैनल प्रबंधन फेल हुआ. अंततः अब श्रम विभाग ने चैनल संचालकों के खिलाफ आरसी जारी कर दी है. रिकवरी की नोटिस जारी होने से चैनल संचालकों में हड़कंप मच गया है.

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पी7 के 450 में से सिर्फ 153 कर्मियों को ही फुल एंड फाइनल पेमेंट मिलेगा

पिछले दिनों ये खबर आई थी कि आन्दोलनकारी पत्रकारों के जिद और जुनून के आगे पी7 प्रबंधन झुक गया और उन्हें नवम्बर तक की सैलरी दे दी गयी. साथ ही 15 जनवरी तक तीन महीने का कम्पनसेशन भी दे दिया जाएगा. इस खबर को सुनकर पी7 के सभी कर्मचारी/श्रमिक ख़ुशी से झूम उठे, लेकिन इनकी ख़ुशी में तब विराम लग गया जब इन्हें पता चला कि पी7 के सभी कर्मचारियों को नहीं बल्कि केवल 450 में से केवल 153 (लगभग) लोगों को ही ये सुविधा मिलेगी. इसके बाद, दूसरे ही दिन अन्य कर्मचारियों ने तत्काल बैठक बुलाई और सब एकत्रित हो कर दुबारा बड़ी संख्या में लेबर कमिश्नर के पास नयी कंप्लेन दायर कर आये.

इस बार इन कर्मचारियों का कहना है कि हम कोई गुटबाजी में नहीं फसेंगे और पी7 के हर एक कर्मचारी/श्रमिक को उसका अधिकार नहीं मिलेगा तब तक हम लड़ते रहेंगे. उनके साथ ऐसे भी लोग खड़े हैं जिनकी सलेरी आठ से बारह हज़ार के बीच है. लेबर कमिश्नर के यहाँ कंप्लेन देते ही वहां से पी7 के निदेशक केसर सिंह, शरद दत्त और एच आर हेड विदु शेखर के खिलाफ नोटिस इशू कर दिया गया है. सिटी मजिस्ट्रेट से भी इन्हें पूर्ण सहयोग का आश्वासन मिला है. इसके साथ ये राज्य सरकार और केंद्र सरकार के सम्बंधित मंत्रालयों को भी पत्र के माध्यम से चैनल की हरकतों की सूचना देते हुए कारवाई की मांग की है. कानूनी कारवाई के साथ-साथ ये धरना की भी तैयारी कर रहे हैं. इस बार ये सिर्फ पी7 के ऑफिस में ही नहीं बल्कि कंपनी के नॉएडा सेक्टर 19 के ऑफिस और निदेशक केसर सिंह के घर के बाहर भी एक साथ धरना पर बैठेंगे.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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मजीठिया की लड़ाई : श्रम विभाग अवैध कमाई का सबसे बड़ा जरिया, सीधे कोर्ट जाएं

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मजीठिया न देना दैनिक भास्कर, जागरण के मालिकों के लिए गले का फंस बन सकता है। इन दोनों अखबारों के मालिक अपने अपने अखबारों के कारण ही खुद को देश का मसीहा समझते हैं। देश का कानून ये तोड़ मरोड़ देते हैं। प्रदेश व देश की सरकारें इनके आगे जी हजूरी करती हैं। लेकिन अब देखना होगा कि अखबार का दम इनका कब तक रक्षा कवच बना रहता है क्योंकि जनवरी में मानहानि के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है। कारपोरेट को मानहानि के मामले में सिर्फ जेल होती है। अब देखना होगा कि सहाराश्री के समान क्या अग्रवाल व गुप्ता श्री का भी हाल होता है या फिर मोदी सरकार अखबार वालों को कानून से खेलने की छूट देकर चुप्पी साध लेती है। मोदी सरकार पत्रकारों को मजीठिया दिलवाने के मामले में बेहद कमजोर सरकार साबित हुई है। मालिकों को सिर्फ नोटिस दिलवाने से आगे कुछ नहीं कर पाई।

आश्चर्य तो तब होता है जब श्रम विभाग वाले अखबारों को मजीठिया वेज बोर्ड देने की नोटिस भेजता है तो अखबार प्रबंधन दो टूक लिखकर दे देता है कि यहां सभी को मजीठिया दिया जा रहा है, जो शिकायतें मिल रही हैं, वो झूठी हैं। श्रम विभाग इसके बाद समाचार पत्र संस्थानों से दोबारा यह पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाता कि किनको किनको मजीठिया मिल रहा है, कृप्या उनके नाम और एकांउट नंबर दें। पिछले माह किसे कितना मिला, किसका क्या पद था, ये बताएं। ये सब श्रम विभाग वाले नहीं पूछते। कई बार श्रम विभाग वाले पूछते कुछ हैं और जवाब कुछ और मिलता है। उधर, समाचार पत्र के मालिक यह भी कह देते है कि यहां कोई मजीठिया वेतनमान लेना ही नहीं चाहता। कल को ये लोग लिखकर दे देंगे कि उनके यहां कोई पत्रकार सेलरी ही नहीं लेना चाहता। मजदूर मजदूरी के लिए ही काम करता है। पर ये मालिक ऐसे ऐसे कुतर्क गढ़ देते हैं कि हंसी आती है। श्रम विभाग को इनके खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए।

दरअसल श्रम विभाग अवैध कमाई का सबसे बड़ा जरिया है। कोई भी निजी संस्थान श्रम कानूनों का पूरी तरह पालन नहीं कर पाता। इसलिए हर महीने इनका बड़ी कंपनियां, छोटी कंपनियां और दुकानों से वसूली बंधी होती है। इस वसूली पर प्रेस की नजर ना पड़े, इसलिए उनसे दूरी बनाकर रखते हैं। एक कपड़े के व्यापारी ने बताया कि लेबर इंस्पेक्टर पहली बार आया तो 50 गलती निकाला। जैसे किस दिन संस्थान बंद रहता है, दीवाल पर यह नहीं लिखा है। 14 साल से कम वाले बाल मजदूर संस्थान में एक भी नहीं है, इसकी घोषणा नहीं है। दीवार का रंग अलग नहीं है, श्रमिकों का रजिस्टर मेंटेन नहीं है आदि-आदि। अंत में बात यह तय हुई कि हर तीन महीने में एक-एक हजार आकर लेते जाना और कुछ मत पूछना, ना ही केस कोर्ट में लगाना। बस यही हाल हर संस्थान में है। और श्रम विभाग में यह पैसा नीचे से लेकर ऊपर तक बंटता है इसलिए शिकायत पर कोई सुनवाई नहीं करता। नौकरी से निकालने की कोई शिकायत लेबर आफिस में किया तो शिकायतकर्ता की परेशानी और आफिस की बल्ले-बल्ले होती है। शिकायत के बाद अधिकारी कंपनी के महाप्रबंधक को फोन लगाकर इस बात की बोली लगाता है कि आप पैसा दे दो, मैं शिकायत को ठंडे बस्ते में डाल दूंगा या हल्का केस बनाऊंगा। फिर पेशी पर पेशी। अंत में श्रमिक नहीं माना तो बोल देते हैं कि हमने शासन को भेज दिया है। अब ऊपर स्तर से निर्णय होगा कि कोर्ट लगाएंगे या कुछ और करेंगे। इसलिए बेहतर होता है कि हर विवाद स्वयं कोर्ट में जाकर लड़ें। महज कुछ पैसों के चक्कर में लेबर आफिस के भ्रष्ट अधिकारी जिंदगी भर चक्कर लगवा देते हैं। हां वेतन भुगतान के मामले में जल्द कार्यवाही जरूर करते है। वह भी पैसा वसूली के कारण।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. पत्र लेखक ने अपना नाम न प्रकाशित करने का अनुरोध किया है.

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मजीठिया वेतन बोर्ड : भूलकर भी लेबर आफिस के चक्कर में ना पड़ें क्योंकि लेबर आफिस अंत में कोर्ट ही जाता है

मजीठिया वेतन बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी संस्थानों की सूची मांगी है जो मजीठिया वेतन नहीं दे रहे है। ऐसे में अब पत्रकारों का दायित्व बनता है कि अंतिम समय में और सक्रिय होकर अपने हक की लड़ाई लड़े। वास्तविक स्थिति आज भी यह है कि कई वरिष्ठ पत्रकार यह नहीं जानते कि मजीठिया वेतन बोर्ड है क्या? लड़ाई किस बात को लेकर हो रही है, वेतन तो सभी को मिल रहे है। फिर उन्हें साफ शब्दों में समझाना पड़ता है कि मजीठिया वेतन बोर्ड मतलब कम से कम 30 हजार वेतन।

सुप्रीम कोर्ट उन संस्थानों की सूची मांगा है जो मजीठिया नहीं दे रहे है। ऐसे में केन्द्रीय श्रम मंत्रालय व राज्य सरकार के श्रम विभाग सामने यह धर्म संकट उत्पन्न होगा कि किन-किन संस्थानों की जांच करें, किनकी सूची दें। ऐसे में प्रेस संस्थानों से ही सूची मांगेगा, तो संस्थान चुनिंदे अपने 2-4 चम्मचों के नाम भेज देगा। ऐसे में आप जहां काम कर रहे है उस संस्थान की रिपोर्ट स्वयं सुप्रीम कोर्ट, केन्द्रीय श्रम मंत्रालय व राज्य श्रम मंत्रालय को भेजे। जिसमें संस्थान का नाम कितने कर्मचारी काम कर रहे है, किन्हें क्या वेतन मिल रहा है। संस्थान का वार्षिक कारोबार, पता आदि की जानकारी दें। हो सकें तो यह भी जानकारी दे कि वर्तमान में मजीठिया वेतनमान कितना होना चाहिए। उक्त जानकारी भरकर इसे रजिस्टर्ड डाक से उक्त संस्थानों को गुमनाम से भेज दें। जो ऐसा ना कर पाए तो कम से कम ई-मेल उक्त विभागों को कर दें। कोर्ट को भेजे पत्र में ऊपर पते के साथ केस नंबर भी दर्ज करें।

चूंकि जिन संस्थानों के नाम से अवमानना लगी है उन्हें मजीठिया देना मजबूरी है। ऐसे में संस्थान यह कर सकता है आधे-अधूरों को मजीठिया देकर मामला रफा-दफा कराने का प्रयास करे। या पत्रकारों की छंटनी करें, ऐसे में पत्रकार तैयार रहें। छंटनी क्यों कर रहे है, संस्थान को एक माह पहले बताना पड़ता है और पहले आओ, अंत में जाओ क्रम का पालन करना पड़ता है लेकिन संस्थान किसी को भी निकाल देता है। जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 15 के तहत किसी कर्मचारी को वेतन बोर्ड के कारण नहीं निकाला जा सकता। यदि 240 दिन की कर्मचारी कार्य अवधि पूर्ण कर लिया हो तो लेबर कोर्ट में औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 25 एफ के तहत परिवाद लग सकता है। जिसमें केस अवधि तक कोर्ट से कंपनसेशन की मांग की जाती है। मांग में केस अवधि तक पुनः नौकरी में रखने या गुजारा भत्ता देने की मांग की जाती है। लेकिन भूलकर भी लेबर आफिस के चक्कर में ना पड़ें। क्योंकि लेबर आफिस अंत में कोर्ट ही जाता है और संस्थान के प्रमुख से शिकायत के बदले राशि की मांग कर मामला रफा-दफा या ढीला करने का प्रयास करता है।

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