बिहार में दैनिक जागरण कर रहा अपने कर्मियों का शोषण, श्रम आयुक्त ने जांच के आदेश दिए

दैनिक जागरण, गया (बिहार) के पत्रकार पंकज कुमार ने श्रम आयुक्त बिहार गोपाल मीणा के यहाँ एक आवेदन दिनांक लगाया था. पिछले महीने 26 जुलाई को दिए गए इस आवेदन में पंकज ने आरोप लगाया था कि गया जिले सहित जागरण के बिहार के सभी चार प्रकाशन केंद्र में श्रम कानून के तहत मीडियाकर्मियों और गैर-मीडियाकर्मियों को कई किस्म का लाभ नहीं दिया जा रहा है. यहां 90 प्रतिशत से अधिक पत्रकार एवं गैर पत्रकारों का प्राविडेंट फंड, स्वास्थ्य बीमा, सर्विस बुक सहित कई सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है. साथ ही माननीय सर्वोच्च्य न्यायालय द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड के तहत सेलरी, पद और ग्रेड की जो घोषणा की जानी थी, उसे भी नहीं नहीं किया गया है.

‘नेशनल दुनिया’ अखबार के कर्मी न्याय के लिए आज भी भटक रहे, मालिक शलैंद्र भदौरिया पूरे तंत्र को मुंह चिढ़ा रहा

सेवा में,
उप श्रमायुक्त
श्रम विभाग
गौतमबुद्ध नगर, नोएडा
(उत्तर प्रदेश)

विषय- कर्मचारियों को एसबी मीडिया प्रा. लि. प्रबंधन द्वारा श्रमिकों के प्रति अनियमितताएं एवं वेतन भुगतान न होने के संबंध में ज्ञापन

महोदय,

डीएलसी बरेली ने हिंदुस्तान प्रबंधन से कहा- ”सुप्रीम कोर्ट से बढ़कर कोई नहीं”

बरेली में मजीठिया वेज बोर्ड के वेतनमान के अनुसार एरियर के दाखिल क्लेम (हिंदुस्तान समाचार पत्र के सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा के 33,35,623 रुपये, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला के 32,51,135 रुपये, चीफ रिपोर्टर डॉ. पंकज मिश्रा के 25,64,976 रुपये) पर शुक्रवार को सुनवाई के दौरान उप श्रमायुक्त बरेली रोशन लाल ने हिंदुस्तान प्रबंधन की ओर से मौजूद बरेली के एचआर हेड व विधि सलाहकार को चेताया कि सुप्रीम कोर्ट से बढ़कर कोई नहीं है।

श्रम अफसरों के धमकाने के मामले से नई दुनिया प्रबंधन के होश उड़े

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित प्रसिद्ध अखबार नई दुनिया में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतन हासिल करने के लिए यहां कार्यरत सभी पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मचारी लामबंद हो गए हैं। इसके लिए वे न्यायपालिका से लेकर सरकारी तंत्र के हर उस पुर्जे को आजमाने में मशगूल हैं जो उनकी इस मांग को पूरा कराने में निर्णायक सहायता कर सके। या कहें कि उन्हें मजीठिया दिलवा सके। इस जीवनदायी महान काम के लिए कर्मचारियों ने श्रम विभाग का भी दरवाजा खटखटाया है। खुशी की बात यह है कि श्रम महकमा खुलकर उनकी मदद में उतर आया है।

दिल्ली राज्य में मीडिया मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर पड़ने लगा श्रम विभाग का चांटा

दिल्ली राज्य में कार्यरत मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड न दिए जाने को लेकर श्रम विभाग ने मीडिया हाउसों को धड़ाधड़ चांटे मारना शुरू कर दिया है. ऐसा दिल्ली की केजरीवाल सरकार की सख्ती के कारण हो रहा है. सूत्रों का कहना है कि अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने श्रम विभाग के अफसरों को साफ-साफ कह दिया है कि किसी का मुंह न देखें, कानूनन जो सही है, वही कदम उठाएं. इस प्रकार सरकार से पूरी तरह छूट मिल जाने के बाद दिल्ली राज्य के श्रम विभाग के अधिकारी फुल फार्म में आ चुके हैं. शोभना भरतिया समेत कई मीडिया मालिकों के खिलाफ क्रिमिनल प्रासीक्यूशन शुरू किया जा चुका है.

सहारा प्रबंधन से आए लोग सुनवाई से पहले ही श्रमायुक्त कार्यालय देहरादून को कागजात रिसीव कराकर रफूचक्कर हुए (देखें दस्तावेज)

देहरादून में राष्ट्रीय सहारा अखबार के कर्मियों ने प्रबंधन के खिलाफ मुकदमा कर रखा है। यह मुकदमा श्रमायुक्त आफिस में किया गया है। सुनवाई के दिन सहारा प्रबंधन की तरफ से कोई नहीं आ रहा है। हां, आश्वासन के कागजात जरूर सौंप जाते हैं। सहारा प्रबंधन के लोग इस बार भी सुनवाई के दौरान सहायक श्रम आयुक्त देहरादून के कार्यालय में नहीं पहुंचे। इसके पहले भी 18 अगस्त 2015 को जब वेतन संबंधी मामले की पहली सुनवाई थी तब भी प्रबंधन पक्ष के लोग तय समय तक नहीं पहुंचे थे।

मजीठिया वेज बोर्ड इंप्लीमेंटेशन रिपार्ट पर दिल्ली के श्रम मंत्री गोपाल राय नाराज, श्रम विभाग के अफसरों पर गिरेगी गाज

नई दिल्ली : सु्प्रीम कोर्ट द्वारा सभी राज्यों से मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने की मांगी गई रिपोर्ट पर दिल्ली में बवाल मच गया है। सूत्रों का कहना है कि श्रम विभाग ने अपनी मनमानी की रिपार्ट बिना मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और श्रम मंत्री को दिखाए यहां तक कि बिना बताए ही सुप्रीम कोर्ट में जमा कर दी है। इस बिना सिर-पैर और मालिकों व प्रबंधन के बयानों पर आधारित 23 पेज की रिपार्ट पर श्रम मंत्री गोपाल राय काफी नाराज बताए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में श्रम विभाग द्वारा अपनी तरफ से रिपोर्ट पेश कर दिए जाने की खबर से खुद श्रम मंत्री हैरान थे।

रोहन जगदाले हाजिर हों…

जिया नामक चैनल और मैग्जीन लांच करने वाले रोहन जगदाले लापता हैं. तभी तो वो मीडियाकर्मियों के बकाये को लेकर लेबर आफिस में चल रही लड़ाई में उपस्थित नहीं हो पा रहे हैं. मीडियाकर्मियों ने उदारता दिखाते हुए उन्हें खुद मेल और पत्र के जरिए सूचित किया है कि वे अगली तारीख पर नोएडा लेबर …

मजीठिया वेतनमान : चंडीगढ़ का श्रम विभाग नहीं रखता मीडिया कर्मियों का कोई लेखा-जोखा

मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के क्रियान्वयन की जांच-पड़ताल के लिए नोडल अफसरों/इंस्पेक्टरों की नियुक्ति/तैनाती/मनोनयन/नामजदगी की खातिर निर्धारित अवधि पूरी होने में करीब डेढ़ हफ्ता रह गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इस काम के लिए 28 अप्रैल 2015 से चार हफ्ते का समय दिया था। यह आदेश राज्य सरकारों को जारी किया गया था जो अपने मुख्य सचिवों के मार्फत काम-कार्यवाही करती हैं। कुछ या कई राज्य सरकारें इस आदेश पर अमल की दिशा में सक्रिय हो गई हैं। मसलन, हरियाणा के मुख्य सचिव ने श्रम विभाग के आला अधिकारियों के साथ बैठक, विचार-विमर्श शुरू कर दिया है।

मजीठिया : चुस्ती से रखें इंस्पेक्टरों और अफसरों के सामने अपना पक्ष

मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के अनुसार वेतन एवं सुविधाएं पाने-लेने-हासिल करने के लिए संघर्षरत साथियों और असंघर्षरत, सुस्त, सुप्त, निश्चल, शिथिल, निष्क्रिय, लुंज-पुंज, बाटजोहू, लालायित, लार टपकाऊ मित्रों सुप्रीम कोर्ट ने आपके सामने एक ऐसा अवसर उपलब्ध कराया कि यदि इसे चूक गए तो पछतावा भी आपको झटक देगा, हाथ नहीं लगाने देगा। मतलब यह कि संघर्ष कर रहे और इसके विपरीत आचरण-व्यवहार-बर्ताव में लीन लेकिन अंदरखाते मजीठिया की ललक से लबरेज सभी मीडिया कर्मचारियों के लिए उन इंस्पेक्टरों-अधिकारियों को अपनी पीड़ा-परेशानी बयां करनी-बतानी है जिनकी नियुक्ति-तैनाती राज्य सरकार के मुख्य सचिव की देख-रेख में की जा रही है। 

यकूम मई : उम्मीद के मजदूर

एक मई की तारीख कितने लोगों को याद है? बस, उन चंद लोगों के स्मरण में एक मई शेष रह गया है जो आज भी इस उम्मीद में जी रहे हैं कि एक दिन तो हमारा भी आएगा. वे यह भी जानते हैं कि वह दिन कभी नहीं आएगा लेकिन उम्मीद का क्या करें?

होशियार ! मजीठिया मामले पर मीडिया हाउसों और लेबर डिपॉर्टमेंट के बीच दलाल हरकतें तेज, चार लाख की घूसखोरी !!

लखनऊ : ताजा सूचना है कि यहां से प्रकाशित एक अखबार के अधिकारी ने लेबर डिपार्टमेंट के एक दलाल को चार लाख रुपए दिए हैं। इसी दलाल ने कुछ दिन पहले मजीठिया मामले से संबंधित आरटीआई के जवाब में गोल-मटोल कर फाइल को लौटा दिया था।  

जागरण के पत्रकार ने नोएडा के उप श्रमायुक्त की श्रम सचिव और श्रमायुक्त से की लिखित शिकायत

मजीठिया मामले में अपने को पूरी तरह से घ‍िरा पाकर दैनिक जागरण प्रबंधन इतना बौखला गया है कि अब वह हमला कराने, घूसखोरी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने पर उतर आया है। इस बात के संकेत उस जांच रिपोर्ट से मिल रहे हैं, जिसके लिए जागरण के पत्रकार श्रीकांत सिंह ने उप श्रम आयुक्त को प्रार्थना पत्र दिया था। जांच के लिए पिछले 21 फरवरी 2015 को श्रम प्रवर्तन अध‍िकारी राधे श्याम सिंह भेजे गए थे। यह अफसर इतना घूसखोर निकला कि उसने पूरी जांच रिपोर्ट ही फर्जी तथ्यों के आधार पर बना दी। उसने जांच रिपोर्ट में बतौर गवाह जिन लोगों के नाम शामिल किए हैं, उनमें से कोई भी घटना के मौके पर मौजूद नहीं था।

बंद हो चुके ‘भास्कर न्यूज’ चैनल के मालिकों-संपादकों में घमासान, लेबर डिपार्टमेंट ने आरसी जारी की

‘भास्कर न्यूज’ चैनल के शीर्षस्थ लोगों में घमासान शुरू हो चुका है. खबर है कि राहुल मित्तल ने हेमलता अग्रवाल व समीर अब्बास के खिलाफ नोएडा के किसी थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया है. उधर, हेमलता अग्रवाल और समीर अब्बास ने भी राहुल मित्तल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने हेतु थाने में तहरीर पहले से दे रखा है. सूत्रों के मुताबिक चैनल के फेल होने के बाद इसका ठीकरा एक दूसरे पर फोड़े जाने की कवायद शुरू हो गई है.

पी7 के 450 में से सिर्फ 153 कर्मियों को ही फुल एंड फाइनल पेमेंट मिलेगा

पिछले दिनों ये खबर आई थी कि आन्दोलनकारी पत्रकारों के जिद और जुनून के आगे पी7 प्रबंधन झुक गया और उन्हें नवम्बर तक की सैलरी दे दी गयी. साथ ही 15 जनवरी तक तीन महीने का कम्पनसेशन भी दे दिया जाएगा. इस खबर को सुनकर पी7 के सभी कर्मचारी/श्रमिक ख़ुशी से झूम उठे, लेकिन इनकी ख़ुशी में तब विराम लग गया जब इन्हें पता चला कि पी7 के सभी कर्मचारियों को नहीं बल्कि केवल 450 में से केवल 153 (लगभग) लोगों को ही ये सुविधा मिलेगी. इसके बाद, दूसरे ही दिन अन्य कर्मचारियों ने तत्काल बैठक बुलाई और सब एकत्रित हो कर दुबारा बड़ी संख्या में लेबर कमिश्नर के पास नयी कंप्लेन दायर कर आये.

मजीठिया की लड़ाई : श्रम विभाग अवैध कमाई का सबसे बड़ा जरिया, सीधे कोर्ट जाएं

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मजीठिया न देना दैनिक भास्कर, जागरण के मालिकों के लिए गले का फंस बन सकता है। इन दोनों अखबारों के मालिक अपने अपने अखबारों के कारण ही खुद को देश का मसीहा समझते हैं। देश का कानून ये तोड़ मरोड़ देते हैं। प्रदेश व देश की सरकारें इनके आगे जी हजूरी करती हैं। लेकिन अब देखना होगा कि अखबार का दम इनका कब तक रक्षा कवच बना रहता है क्योंकि जनवरी में मानहानि के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है। कारपोरेट को मानहानि के मामले में सिर्फ जेल होती है। अब देखना होगा कि सहाराश्री के समान क्या अग्रवाल व गुप्ता श्री का भी हाल होता है या फिर मोदी सरकार अखबार वालों को कानून से खेलने की छूट देकर चुप्पी साध लेती है। मोदी सरकार पत्रकारों को मजीठिया दिलवाने के मामले में बेहद कमजोर सरकार साबित हुई है। मालिकों को सिर्फ नोटिस दिलवाने से आगे कुछ नहीं कर पाई।

मजीठिया वेतन बोर्ड : भूलकर भी लेबर आफिस के चक्कर में ना पड़ें क्योंकि लेबर आफिस अंत में कोर्ट ही जाता है

मजीठिया वेतन बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी संस्थानों की सूची मांगी है जो मजीठिया वेतन नहीं दे रहे है। ऐसे में अब पत्रकारों का दायित्व बनता है कि अंतिम समय में और सक्रिय होकर अपने हक की लड़ाई लड़े। वास्तविक स्थिति आज भी यह है कि कई वरिष्ठ पत्रकार यह नहीं जानते कि मजीठिया वेतन बोर्ड है क्या? लड़ाई किस बात को लेकर हो रही है, वेतन तो सभी को मिल रहे है। फिर उन्हें साफ शब्दों में समझाना पड़ता है कि मजीठिया वेतन बोर्ड मतलब कम से कम 30 हजार वेतन।