आरटीआई से खुलासा: अखबार मालिकों को सरकार द्वारा दी गयी जमीन के कागजात हुए आग के हवाले

पत्रकारों और गैर पत्रकारों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देने में सुप्रीमकोर्ट के आदेश को भी ठेंगा दिखा रहे महाराष्ट्र के अखबार मालिकों के बारे में सरकारी लापरवाही की एक और दास्ताँ सामने आई है। महाराष्ट में पूर्व की सरकार ने अखबार मालिकों को लाभ देने के तहत कौड़ियों के दाम पर बेशकीमती जमीन आवंटित की थी। इन सरकारी जमीनों को सस्ते दर पर पाकर अखबार मालिकों ने मुंबई से सटे नयी मुम्बई में अपने प्रेस तक बैठा लिए। मगर सरकार के पास इन जमीनों के आवंटन का कोई विवरण नहीं है।वजह बताई गयी है ये कागजात आग के हवाले हो गए हैं।

मुम्बई के निर्भीक पत्रकार और आर टी आई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह ने  4 जुलाई 2016 को आर टी आई के जरिये महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कार्यालय से जानकारी माँगी थी कि महाराष्ट्र के किस किस समाचार पत्र प्रतिष्ठानों को सरकारी जमीन आवंटित की गयी है और किस दर से और कितनी जमीन आवंटित की गयी।इस पत्र को इस विभाग से उस विभाग घुमाया गया।शशिकांत सिंह ने सुचना न मिलने पर अपील दायर किया जिसके बाद महाराष्ट्र सरकार के

राजस्व एवं वन विभाग के अपर सचिव श्रीकृष्ण पवार ने 12 सितंबर 2016 को भेजे गए पत्र में शशिकांत सिंह को चौकाने वाली जानकारी दी है।श्री पवार ने बताया है कि 21 जून 2012 को महाराष्ट्र के मंत्रालय इमारत के कुछ हिस्सों में आग लग गयी जिसमे इस कार्यालय से जुड़े सभी अभिलेख नष्ट हो गए।जिसके कारण 21 जून 2012 से पहले का कोई भी रिकार्ड हमारे पास उपलब्ध नहीं है। और 21 जून 2012 के बाद किसी भी समाचार पत्र प्रतिष्ठान को कोई भी जमीन आवंटित नहीं की गयी है

अब सवाल ये उठता है कि क्या महाराष्ट्र सरकार के पास इन रिकार्डो का बैकअप नहीं था।अगर नहीं तो ये किसकी लापरवाही थी।अगर सरकार के पास बैकअप नहीं है तो जिलाधिकारी कार्यालय से भी ये जानकारी मंगाई जा सकती थी।जिलाधिकारी के पास तो पक्का रिकार्ड होगा।दूसरा सवाल ये उठता है कि अगर सरकारी रिकार्ड जल गए और इन अखबार मालिकों ने दुबारा सरकारी जमीन के लिए आवेदन किया तो सरकार के पास बचने का क्या उपाय होगा। वो तो उन्हें दुबारा कौड़ियों के भाव जमीन दे देगी ।
फिलहाल सरकार की इस घोर  लापरवाही की हर तरफ  निंदा होगी।इसके लिए सरकार को तैयार होना होगा।

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