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सुख-दुख

एचटी के आरई प्रांशु की माताजी और महिला अधिकारों की अग्रणी कार्यकर्ता आशा मिश्रा नहीं रहीं

वे सोने जैसे दिल वाली महिला थीं, जिन्हें जीवन ने मजबूती से तराशा था और जिनमें धैर्य की एक अनोखी चमक थी!

मुकेश बहादुर सिंह-

लखनऊ। हिंदुस्तान टाइम्स, लखनऊ के रेजिडेंट एडिटर प्रांशु मिश्रा की माता आशा मिश्रा का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। वह 78 वर्ष की थीं। अपने पीछे वह पति और दो पुत्रों को छोड़ गई हैं। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक समेत कई राजनीतिक नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

पेशे से शिक्षिका रहीं आशा मिश्रा का प्रगतिशील महिला आंदोलन से गहरा जुड़ाव था। वह नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वूमेन (एनएफआईडब्ल्यू) की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष थीं। शिक्षक संघ की सक्रिय सदस्य के रूप में उन्होंने गरीबों, वंचितों, महिलाओं और समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष किया।

उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, विधायक पंकज सिंह, कांग्रेस नेता वीरेंद्र मदान और अंशु अवस्थी, इंडो अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स के मुकेश बहादुर सिंह एवं रीना सिंह, जिलाधिकारी विशाख जी, लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. रूपरेखा वर्मा, एडवा की मधु गर्ग, इप्टा के राकेश, सामाजिक कार्यकर्ता कांती मिश्रा, नैश हसन, दीपक कबीर, ताहिरा हसन और सीमा राणा सहित अनेक लोगों ने दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि दी।

उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना, भाजपा प्रदेश महामंत्री (संगठन) धर्मपाल सिंह, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय, कांग्रेस महासचिव एवं उत्तर प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे तथा विधायक राजेश्वर सिंह ने भी आशा मिश्रा के निधन पर शोक व्यक्त किया।

वरिष्ठ संपादकों और पत्रकारों में सुनील द्विवेदी, प्रवीण कुमार, विजय त्रिपाठी, सुधीर मिश्रा, शरद प्रधान, रामदत्त त्रिपाठी, मुदित माथुर, शीतल पी सिंह, पूर्व सूचना आयुक्त राजकेश्वर सिंह, पूर्व डीजी (सीआरपीएफ) आनंद महेश्वरी समेत अनेक लोग मौजूद रहे, जब आशा मिश्रा का अंतिम संस्कार भैंसाकुंड विद्युत शवदाह गृह में किया गया।



आशा मिश्रा आंटी को श्रद्धांजलि

एडवोकेट मोहम्मद हैदर-

एक रोशनी जो कभी बुझी नहीं, वह आज हमसे विदा हो गई

हमने एक ऐसी रोशनी खो दी है जो कभी मद्धिम नहीं पड़ी, भले ही शरीर थकने लगा हो। मेरे प्रिय कॉलेज साथी और हिंदुस्तान टाइम्स लखनऊ के संपादक प्रांशु मिश्रा की माताजी, कॉमरेड आशा मिश्रा जी, लंबी बीमारी के बाद आज हमें छोड़ गईं। पर उन्हें भूतकाल में याद करना अजीब लगता है, क्योंकि उनकी आत्मा अभी भी हमारे साथ चलती है।

वे सोने जैसे दिल वाली महिला थीं, जिन्हें जीवन ने मजबूती से तराशा था और जिनमें धैर्य की एक अनोखी चमक थी। जीवन के हर मौसम में उन्होंने हमें ध्रुवतारे की तरह राह दिखाई और परिवारों को वित्तीय समझदारी की वह शांत बुद्धि सिखाई जो कम लोगों के पास होती है। वे जानती थीं कि कौन सी बीमा पॉलिसी एक नए जोड़े को सुरक्षा देगी, कौन सा निवेश किसी बच्चे को कॉलेज तक पहुंचाएगा। उनमें हमें कोई वित्तीय सलाहकार नहीं, बल्कि एक संरक्षक मिलती थी।

वे एक योद्धा थीं और जहां न्याय सबसे कम था, वहीं आप उन्हें पाते थे। प्रदर्शनों में उनकी आवाज भीड़ को चीरती थी, सत्ता की मनमानी और लापरवाही को ललकारती थी। वे महिलाओं और वंचितों के लिए उस साहस के साथ खड़ी होती थीं जो दूसरों को भी हिम्मत देता था। वे कद में छोटी थीं पर असर में उल्का के समान थीं।

बीमारी भी उनकी परवाह को नहीं रोक सकी। फोन की घंटी बजती और वे होती थीं, हमें प्रीमियम की तारीखें और फीस की समयसीमा याद दिलाती हुईं। वे हमारा ख्याल रखती रहीं जब हमें उनका रखना चाहिए था।

उनका जाना एक खालीपन नहीं है, यह वह आकाश है जहां से एक तारा टूटकर गिरा है। हम पूरी तरह असहाय से हैं, बस उनके सिखाए सबक हैं, रसीदें हैं, आंदोलन के पर्चे हैं और उनके संकल्प की गूंज है।

विश्राम करें आंटी। आपका काम, आपकी ऊष्मा और आपकी लड़ाई हममें जीती रहेगी।


एक और वह आवाज़ थम गई जो उम्मीद थी!

हफ़ीज़ अतीक किदवई-

लखनऊ की सड़कें आशा मिश्रा जी की गवाही देंगी । जनसरोकार का ऐसा कोई मुद्दा नही जिसमें उनकी उपस्थिति न होती हो । हम लोग जब स्टूडेंट थे,तब से जिन महिलाओं को सड़क पर देख रहे हैं, उनमें से थीं आशा मिश्रा जी । आज जब वह नही रहीं,भैसाकुण्ड में उनका अंतिम संस्कार हो गया ।

तब मैं पलट कर सोचता हूँ कि लखनऊ को उनके जाने से क्या नुकसान हुआ । लखनऊ, कुछ और लड़ने वालों से खाली हो गया । एक और वह आवाज़ थम गई जो उम्मीद थी । जब सब तरफ अंधेरा था,अच्छे अच्छे लोग बोलते घबराते,तब यह महिलाएं सड़क पर हिम्मत बनकर खड़ी होती । आशा जी हर मसले में अपनी पूरी टीम के साथ खड़ी मिलती ।

मुझे हज़रतगंज की सड़कें अगर खूबसूरत लगती हैं ।।तो उसमें वह मुक्त आवाज़ें दिखती हैं । जो बेनर लिए,हाथ उठाए और नारे लगाते निकलती थीं ।।यह आवाज़ें हजरतगंज चौराहा जिस वक़्त पार करती थीं,गाड़ियां ठहर जाती थी । खड़ी भीड़ उनके बैनर पढ़ती और सोचती की यह कौन औरतें हैं, जो उनके लिए लड़ती हैं । उनकी परेशानियों की बात करती हैं ।

यह तो बड़ी मज़ेदार ज़िन्दगी अपने घरों में बिता सकती थीं । यो तपती धूप,बरसते बादलों और कड़ाके की सर्दी के बीच क्यों सड़क पर निकल पड़ती हैं । यह देश और मानवता के मुद्दों के लिए सारी आराम भूलकर खड़ी होती ।

आज जब वह गुज़र गईं, तो मैं सोचता हूँ क्या शहर को इस बात की भनक भी है कि कौन चला गया । समाज को यह एहसास भी है कि उनकी एक ताक़त हमारे बीच से उठ गई । वह साड़ी पहने,बिंदी लगाए,सड़क पर नारे दोहराती चलती और हम लोग धीरेधीरे उनके पीछे यह सोचकर चल पड़ते की इनके रास्ते ही सही रास्ते हैं ।

अब जब आशा जी नही हैं । ऐसे बहुत से लोग लगातार घट रहे हैं, जिन्हें अपनी निजी ज़िन्दगी से ज़्यादा समाज की फिक्र थी । यह वह लोग थे जो सभ्य समाज के लैम्पोस्ट थे । खुद को जलाकर रोशनी पैदा करते रहे ताकि समाज बिना तक़लीफ़ के आगे बढ़ जाए ।

आशा मिश्रा जी आपके त्याग,कर्मयोग और बेपनाह मेहनत को हम नही भूलेंगे । आप हमारे जीवन में वैसे ही रहेंगी जैसे अपने जीवन में थी । हमारी लीडर,जिन्हें देखकर लखनऊ सर उठाकर चलता था । आप हम सबका गर्व थीं,आपको आख़री सलाम….

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