
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में ऐसी कोई खबर नहीं है जो यह बताये कि दिल्ली के मुख्यमंत्री का चुनाव कब तक हो जायेगा या दिल्ली के लिए नई चुनी गई भाजपा की सरकार कबसे काम करने लगेगी। महाराष्ट्र में आपने सरकार बनाने की जल्दबाजी देखी है तो अब दिल्ली में निश्चिंतता देखिये। भाजपा की कार्यशैली में यह अंतर भले खास बात न हो, अखबारों के लिए खबर भी नहीं है। कल दि एशियन एज में छपी खबर के आधार पर मैंने बताया था कि दिल्ली में चुनाव नतीजों के बाद सरकार कब बनेगी या जानने-बताने की चिन्ता दिल्ली के अखबारों (मेरे आठ) में सिर्फ दि एशियन एज को थी। इसके अनुसार, “भाजपा दिल्ली मंत्रिमंडल और मुख्यमंत्री का चुनाव रविवार को करेगी। उपशीर्षक है, मोदी के लौटने पर होगी प्रमुख बैठक। जाहिर है, प्रधानमंत्री के नहीं होने के कारण निर्णय नहीं हो रहा है और हो भी कैसे? भाजपा के पास पूर्णकालिक अध्यक्ष भी तो नहीं है। जो भी हो, भाजपा, सरकार और उसके काम-काज से संबंधित मामले सामने नहीं आते हैं क्योंकि मीडिया बताता नहीं है। सरकार नहीं बताती है सो अलग। फिर भी उसकी कोई शिकायत या आलोचना नहीं है। आज यह सब तो छोडिये पहले पन्ने पर चर्चा भी नहीं है।” मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगने की खबर को प्रमुखता देकर दिल्ली के मामले को दबा दिया गया है ताकि पाठकों को नहीं लगे कि उनकी लोकप्रिय सरकार कोई काम नहीं कर रही है या प्रधानमंत्री के विदेश में होने से दो मुख्यमंत्रियों से संबंधित फैसले अटके हुए हैं।
मणिपुर का मामला यह है कि संसद का सत्र मार्च तक के लिए स्थगित होने के कुछ घंटे बाद और प्रधान नरेन्द्र मोदी के अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से मिलने के मौके पर (संभवतः कुछ पहले) राष्ट्रपति शासन लग गया। निश्चित रूप से यह नये मुख्यमंत्री का चुनाव करने के लिए भाजपा को समय देगा और हेडलाइन मैनेजमेंट का हिस्सा है। द टेलीग्राफ ने यही खबर दी है। आप देखिये आपके अखबार में यह खबर कैसे लिखी गई है और क्या बताया गया है। द टेलीग्राफ का मुख्य शीर्षक है, मणिपुर में केंद्रीय शासन। फ्लैग शीर्षक है, आम सहमति न बन पाने के कारण भाजपा ने मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार चुनने के लिए कुछ समय प्राप्त किया। गुवाहाटी डेटलाइन से उमानंद जायसवाल की खबर इस प्रकार है, केंद्र ने गुरुवार को संघर्ष प्रभावित मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया, क्योंकि एन बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद से चार दिनों तक भाजपा द्वारा सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री चुनने के प्रयास विफल रहे। जिस तरह जातीय संघर्ष से निपटने में विफल रहने के बावजूद बीरेन सिंह को हटाने में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को 21 महीने लग गए, उसी तरह राष्ट्रपति शासन लागू होने में 260 लोगों की मौत और 60,000 लोगों के विस्थापन का समय लग गया। (इस दौरान सैकड़ों चर्च जला दिये गये हैं।)
पर्यवेक्षकों ने संकेत दिया कि केंद्र सरकार ने संसद के अवकाश पर जाने का इंतजार किया। आप जानते हैं कि बजट सत्र का पहला चरण गुरुवार को समाप्त हुआ केंद्र की भाजपा सरकार को अब अपने इस निर्णय पर संसद में कोई बयान नहीं देना पड़ेगा या सदन में सवालों का सामना नहीं करना पड़ेगा। अखबारों में कोई सवाल होता नहीं है। सरकार जनता को कुछ बताती नहीं है। सूत्रों ने कहा कि केंद्रीय शासन लागू होने के साथ ही भाजपा और उसके सहयोगियों को अब सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री चुनने के लिए कुछ और समय मिल जाएगा। अब केंद्र और राज्य दोनों में सरकारों का नेतृत्व भाजपा कर रही है। केंद्रीय शासन की घोषणा करने वाली केंद्रीय गृह मंत्रालय की अधिसूचना में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हवाले से कहा गया है कि उन्हें मणिपुर के राज्यपाल अजय कुमार भल्ला से एक रिपोर्ट मिली है। अधिसूचना में मुर्मू के हवाले से कहा गया है, “…और मुझे मिली रिपोर्ट और अन्य सूचनाओं पर विचार करने के बाद, मैं संतुष्ट हूं कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें उस राज्य की सरकार भारत के संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चल सकती।”
“अब, इसलिए, संविधान के अनुच्छेद 356 द्वारा प्रदत्त शक्तियों और उस संबंध में मुझे सक्षम बनाने वाली सभी अन्य शक्तियों का प्रयोग करते हुए, मैं घोषणा करती हूं कि मैं – (ए) भारत के राष्ट्रपति के रूप में मणिपुर राज्य सरकार के सभी कार्यों और उस राज्य के राज्यपाल में निहित या उनके द्वारा प्रयोग की जाने वाली सभी शक्तियों को अपने ऊपर लेती हूं।” बाद में रात में, राजभवन के एक बयान में कहा गया कि विधानसभा को निलंबित कर दिया गया है, जिसका अर्थ है कि इसे पुनर्जीवित किया जा सकता है।” दिल्ली के मामले में ऐसा नहीं किया जा सकता है या ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं है इसलिए जो चुनाव बजट से पहले करा लिये जाने चाहिये थे, मतदान के दौरान प्रधानमंत्री को आस्था की डुबकी नहीं लगानी चाहिये थी और लग रहा था तो उसकी खबर (प्रचार) नहीं होनी चाहिये थी वह सब करके और किसी भी तरह चुनाव जीतने को आतुर भाजपा को जीतने के बाद अब सरकार बनाने की कोई जल्दी नहीं है (क्योंकि राज्यपाल के जरिये वह पहले भी चला ही रही थी) और मीडिया में कोई सवाल नहीं है।
आज के अखबारों की लीड और सेकेंड लीड की बात करूं तो ज्यादातर में प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा, ट्रम्प से मुलाकात और उससे पहले-बाद की खबरें लीड हैं और मणिपुर में केंद्रीय शासन सेकेंड लीड है। मुझे लगता है कि दोनों ही खबरें (ज्यादातर में शीर्षक के साथ) सरकार के पक्ष और प्रचार में हैं तथा आम लोगों को सारी सूचनाएं टेलीविजन से मिल गई होंगी (कई टेलीविजन चैनल और बड़े प्रचारक है) ऐसे में प्रिंट मीडिया अलग होने के लिए या अपने अस्तित्व के लिए भी कुछ अलग खबर दे सकता था। इससे मीडिया सरकार के खिलाफ संतुलित लगता और अपनी खबरों के लिए एक नया पाठक वर्ग बना सकता था। अमेरिका की खबर लीड तब बनती जब प्रधानमंत्री भारतीयों को बेड़ियों में सेना के मालवाहक विमान से भेजने पर कुछ बोलते तो देश को अच्छा लगता पर विदेश मंत्री पहले ही कह चुके हैं कि यह सामान्य था। ऐसे में आज जो खबरें छपी हैं वे समर्थकों को भले खुश करें, आम भारतीयों को निराश करेंगी। जो भी हो, कुछ अलग होने और दिखने की बात है तो आज अमर उजाला की लीड (छह कॉलम) का शीर्षक है, हंगामे के बीच वक्फ पर जेपीसी रिपोर्ट पेश। मणिपुर में केंद्रीय शासन की खबर टॉप पर छह कॉलम में है और अमेरिका यात्रा की खबर दोनों के नीचे चार कॉलम में – रक्षा, तकनीक पर सहयोग बढ़ायेंगे भारत – अमेरिका।
कहने की जरूरत नहीं है कि संसद में जेपीसी की रिपोर्ट पेश किये जाने का मामला पर्याप्त गंभीर है और अमर उजाला ने इसे उसी रूप में छापा है। दूसरे अखबारों जैसे नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, हंगामे के बीच वक्फ जेपीसी की रिपोर्ट पेश। उपशीर्षक है, लोकसभा, राज्यसभा के पटल पर रखी गई रिपोर्ट। इस मामले में जो स्थिति है वह जनता को मालूम होनी चाहिये और अखबारों का काम था कि सरकार का प्रचार करने की बजाय इसे विस्तार से और समझा कर बताते। मैं समझता हूं कि अमर उजाला की खबर के उपशीर्षक और दूसरे हाईलाइट किये अंश से मामला मोटे तौर पर समझ में आ जायेगा। खबर के अनुसार, 655 पन्नों की रिपोर्ट के बारे में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने उच्च सदन में आरोप लगाया : रिपोर्ट से असहमति वाले नोट हटाये गये…. रिजिजू बोले – सारे सुझाव और असहमतियां शामिल हैं। जाहिर है खरगे और रिजिजू में कोई एक झूठ बोल रहा है पर झूठ शब्द असंसदीय है। एक दूसरे मामले में कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी को उपसभापति हरिवंश ने बताया कि झूठ रिकार्ड में नहीं जायेगा तो उन्होंने मिथ्या शब्द का प्रयोग किया पता नहीं वह रिकार्ड में है कि नहीं। यहां मामला यह है कि अमर उजाला की खबर के अनुसार, लोकसभा में अमित शाह ने कहा कि विपक्ष की असहमतियों को बिना संशोधन शामिल करने पर भाजपा को कोई आपत्ति नहीं। इसके साथ एक खबर अमित शाह के हवाले से है, आपत्तियां जोड़ सकते हैं। अगर लोकसभा में अमित शाह कह रहे हैं कि आपत्तियां जोड़ सकते हैं तो रिजिजू किन सुझावों और असहमितयों के शामिल होने की बात कर रहे हैं मैं नहीं समझ पाया।
वह इसलिए भी कि टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार, “विरोध के बाद जेपीसी की वक्फ रिपोर्ट में डिसेंट नोट जोड़े गये।” मुझे लगता है कि खबर स्पष्ट नहीं है क्योंकि ऐसी ही बातें बोली गई हैं। अखबारों का काम सिर्फ रिपोर्ट करना नहीं है जो रिपोर्ट करें उसे पाठकों को समझ में भी आना चाहिये। लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी की आलोचना नहीं करनी हो, संसदीय मर्यादाओं का ख्याल रखना हो तो कुछ मजबूरियां हो सकती हैं। इमरजेंसी में मीडिया ने इन मजबूरियों का विरोध किया था अब इनका समर्थन कर रहा है। मुझे नहीं लगता कि समर्थ और मजबूत मीडिया यह सब करता पर कर रहा है तो मजबूत हुआ है या कमजोर आप तय कीजिये और इसमें सबका साथ सबका विकास कहां है वह भी मुद्दा है। समर्थ, सक्षम और स्वतंत्र मीडिया के बिना लोकतंत्र का क्या होगा यह चिन्ता 1975 के बाद खत्म हो गई लगती है और यही राजनीति है। आज की दूसरी महत्वपूर्ण खबरों में एक खबर दि एशियन एज में है। इसके अनुसार भाजपा दिल्ली का मुख्यमंत्री भले नहीं तय कर पा रही है संभावना है कि दिल्ली में दो उप मुख्यमंत्री होंगे। आप जानते हैं कि जब दावेदार ज्यादा होते हैं तो इस तरह सबको समायोजित किया जाता है और जब येन-केन प्रकारेण सभी दलों के जीतने वालों को पार्टी में शामिल कर लिया जाये या गठजोड़ वाली सरकार बनानी हो तो ऐसा करना पड़ता है। हालांकि, खबर के अनुसार ऐसा राष्ट्रीय राजधानी को मिनी इंडिया दिखाने के लिए किया जा रहा है और ऐसा करने से पार्टी को भिन्न जाति, समुदाय और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि के लोगों को शामिल करने का मौका मिलेगा।
यहां मुझे एक पुराना मामला याद आता है जिसका वर्णन पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरामन ने अपनी पुस्तक जब मैं राष्ट्रपति था (1994) में किया है। प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का शपथ ग्रहण समारोह 2 दिसम्बर, 1989 को होना तय था। दिन में 10 बजे के करीब मुझे बताया गया कि उसी समय देवीलाल भी उप प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। मैंने अपने सचिव से कहा कि वीपी सिंह को बता दिया जाए कि देवीलाल को सिर्फ मंत्री पद की शपथ दिलाई जाएगी और उन्हें बाद में उप प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है। पर कुछ फैसला हो पाता, उसने पहले ही समारोह शुरू हो गया और वीपी सिंह को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दो गई। फिर देवीलाल आए और जब मैंने उन्हें ‘मंत्री’ के रूप में शपथ दिलाई तो उन्होंने उप प्रधानमंत्री पढ़ा। मैंने उन्हें फिर मंत्री’ कहकर दुरुस्त किया, पर उन्होंने दुबारा भी उप प्रधानमंत्री पढ़ा। यह शपथ ग्रहण समारोह के सीधे प्रसारण में ताफ-साफ दिखा। मैं नहीं चाहता था कि अशोभनीय स्थिति पैदा करूँ, इसलिए देवीलाल जैसे पढ़ना चाहते थे, पढ़ने दिया। ‘मंत्री’ की जगह ‘उप प्रधानमंत्री पाने के लिए प्रेस में देवीलाल की काफी निंदा हुई। समारोह के बाद चाय-पान के समय मैंने पत्रकारों से कहा कि देश में सरदार पटेल, मोरारजी देसाई, चरणसिंह और जगजीवन राम पहले भी उप प्रधानमंत्री हुए हैं। पर इन सभी को मंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई थी और बाद में उप प्रधानमंत्री बनाया गया था। पत्रकारों ने देखा था कि जब देवीलाल ने शपथ के मूल पाठ को गलत पढ़ा तो मैंने उन्हें सही किया या। इन लोगों ने देवीलाल की कार्रवाई को अनुपयुक्त माना। मैं उनकी टिप्पणी पर बस हँसकर रह गया। (पृष्ठ 264)
आज हिन्दुस्तान टाइम्स में एक दिलचस्प खबर है जो बताती है कि मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाने से पहले जो सब हुआ उसका केंद्र राजधानी का होटल इंफाल था और संवैधानिक संकट टालने के लिए भाजपा नेतृत्व ने संबित पात्रा को नियुक्त किया था जो वहां विधायकों से मिल रहे थे। यहीं पहली मंजिल पर राज्य में हुई हिंसा की जांच के लिए बने आयोग का कार्यालय है। और छह महीने पहले तक यहां भूतल पर सीबीआई का स्वागत कक्ष होता था। खबर के अनुसार मई 2023 में जातीय हिंसा के बाद से राज्य में पर्यटक बहुत कम हैं लेकिन होटाल इंफाल में अतिथियों की कोई कमी नहीं है। आप जानते हैं कि हिंसा शुरू होने के बाद ही बीरेन सिंह को हटाने की मांग शुरू हो गई थी और भाजपा ने ना उन्हें हटाया ना इस्तीफा लिया। अब जब इस्तीफा हो गया है तो विकल्प नहीं है और इस तरह मणिपुर में अमृतकाल चल रहा है जहां सबका साथ और सबका विकास हो रहा होगा।
नवोदय टाइम्स में आज चार कॉलम के बॉटम की (फ्लैग) शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को लगाई फटकार, पीएमएलए पर उठाये सवाल। मुख्य शीर्षक है, 498ए की तरह पीएमएलए का भी दुरुपयोग हो रहा है। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस में आज एक खबर है जो बताती है कि सुप्रीम कोर्ट ने ईडी के मामलों में जमानत के नियम आसान किये थे पर एक नये आदेश ने वापस पुरानी स्थिति बहाल कर दी है। यही खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में भी है। इसके अनुसार मनी लांडरिंग (का आरोप) एक गंभीर अपराध है, हल्के ढंग से जमानत नहीं दी जा सकती है। दो दिन पहले खबर थी, सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को लगाई फटकार, दहेज विरोधी कानून से की धन शोधन निवारण अधिनियम की तुलना। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने बुधवार को छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी अधिकारी अरुण पति त्रिपाठी को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि अगर शिकायत पर संज्ञान लेने वाले अदालती आदेश को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की तरफ से रद्द कर दिया गया था, तो आरोपी को हिरासत में कैसे रखा गया। पीठ ने पूछा, ‘पीएमएलए (धन शोधन निवारण अधिनियम) की अवधारणा यह नहीं हो सकती कि व्यक्ति को जेल में रहना चाहिए। यदि संज्ञान रद्द होने के बाद भी व्यक्ति को जेल में रखने की प्रवृत्ति है, तो क्या कहा जा सकता है? देखिए 498ए मामलों में क्या हुआ, पीएमएलए का भी इसी तरह दुरुपयोग किया जा रहा है?’ कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार पीएमएलए कानून का दुरुपयोग कर रही है और सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दिये जाने के के बावजूद सरकारी प्रयासों से इस मामले में सुनवाई नहीं हो पाई तथा यह अभी तक चल रहा है। इससे कोई तो इसके सख्त प्रावधानों को मान लेता और कोई नहीं मानने योग्य मानकर भी मजबूर होता है।


