Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

सुनील शाह और अमर उजाला : दोनों मेड फॉर ईच अदर थे…

यकीन नहीं हो रहा है कि सुनील शाह नहीं रहे। मैं 20 से 24 अप्रैल तक दिल्ली में नहीं था। लौटकर आया तो पता चला कि जनसत्ता में मित्र रहे सुनील शाह जो इस समय अमर उजाला, हलद्वानी में संपादक थे – एक कार दुर्घटना में घायल हो गए हैं और बेहतर इलाज के लिए दिल्ली लाया गया। फोन पर उनकी पत्नी से बात हुई तो पता चला वे सर गंगा राम हॉस्पीटल में दाखिल हैं। अस्पताल जाकर पता चला कि हलद्वानी में कार दुर्घटना बहुत मामूली थी और उनकी कलाई की हड्डी टूट गई थी। इसके लिए ऑपरेशन कर कलाई में प्लेट लगाई गई थी जो कोई खास चोट नहीं कही जाएगी।

सुनील शाह और संजय कुमार सिंह : पुराने दिनों की याद दिलाती एक तस्वीर

यकीन नहीं हो रहा है कि सुनील शाह नहीं रहे। मैं 20 से 24 अप्रैल तक दिल्ली में नहीं था। लौटकर आया तो पता चला कि जनसत्ता में मित्र रहे सुनील शाह जो इस समय अमर उजाला, हलद्वानी में संपादक थे – एक कार दुर्घटना में घायल हो गए हैं और बेहतर इलाज के लिए दिल्ली लाया गया। फोन पर उनकी पत्नी से बात हुई तो पता चला वे सर गंगा राम हॉस्पीटल में दाखिल हैं। अस्पताल जाकर पता चला कि हलद्वानी में कार दुर्घटना बहुत मामूली थी और उनकी कलाई की हड्डी टूट गई थी। इसके लिए ऑपरेशन कर कलाई में प्लेट लगाई गई थी जो कोई खास चोट नहीं कही जाएगी।

सुनील शाह और संजय कुमार सिंह : पुराने दिनों की याद दिलाती एक तस्वीर

अपने-अपने परिवार के साथ सुनील शाह और संजय कुमार सिंह : याद आए बीते दिन

 

सुनील शाह के पैतृक घर के सामने खड़े होकर तस्वीर खिंचाते संजय कुमार सिंह : पुराने दिनों की सुनहरी यादें

बाद में उन्हें लंग इंफेक्शन (फेफड़े का संक्रमण) हो गया और इसीलिए दिल्ली लाया गया था। इतवार को डॉक्टरों ने कहा था कि हालत गंभीर है पर न जाने क्यों मुझे लग रहा था कि ऐसा क्या संक्रमण होगा जो इतने बड़े अस्पताल में ठीक नहीं होगा। हालांकि उसी दिन सुबह उन्हें वेंटीलेटर पर रखा गया था। शाम को डायलिसिस भी करनी पड़ी। छह यूनिट खून की जरूरत थी। अगले दिन यानी सोमवार को मुझे सुबह पहुंचना था पर मैं दोपहर बाद पहुंच पाया और शाम को वापस आया। कह कर आया था कि सुबह फिर आउंगा। उससे पहले ही पता चला कि रात में दिल का भयंकर दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

पहली सूचना मिलने के बाद मैं इंतजार करता रहा कि किसी तरह यह गलत साबित हो। पर दूसरी फिर तीसरी सूचना के बाद मानना पड़ा कि सुनील शाह नहीं रहे। मेरी हिम्मत नहीं हुई कि भाभी जी से बात करूं। सुनील से मेरी खूब बनती थी। मैं फिल्में नहीं देखता और वो अंग्रेजी फिल्मों के खूब शौकीन थे। चाणक्य में मैंने उनके साथ कई फिल्में देखी हैं। हालांकि अंग्रेजी फिल्में मुझे कभी समझ में नहीं आई और चाणक्य का उस समय का एयरकंडीशनर मुझे अच्छी नीन्द में सुला देता था। मैं फिल्म के दौरान ज्यादातर सोता रहता था। फिर भी सुनील मुझे अपने साथ ले जाते। उनके पास मोटर साइकिल थी और हम लोगों ने कई फिल्में देखीं। हालांकि, मुझे एक का भी नाम याद नहीं है।

सुनील शाह ठेठ नैनीताल के रहने वाले थे और आय्यारपाटा में उनके पिताजी का शानदार बंगला, कार और पुराने शाही फर्नीचर सब देखने लायक थे। सुनील को जब पता चला कि मैं नैनीताल या पहाड़ पर कभी नहीं गया तो एक बार गर्मी की छुट्टी में मुझे उन्होंने अपने साथ चलने की पेशकश की। मैं उनके साथ गया और चार पांच दिन रहकर वापस आया। सुनील शाह के साथ स्कूटर पर नैनीताल घूमने का आनंद ही कुछ और था। उनके लिए मैं मैदान का अजूबा इंसान था जिसने उस समय तक पहाड़ नहीं देखा था और मेरे लिए पहाड़ पर रहने वाले अजूबे जहां कुछ समतल नहीं था। आय्यारपाटा में सुनील के कई रिश्तेदार थे और मैं कइयों के घर गया था। 

सुनील शाह जब जनसत्ता छोड़कर गए तो बहुत बुरा लगा। पर पेशेगत स्थितियों के लिहाज से उनका निर्णय ठीक ही था। वे घर के पास रहना चाहते थे और अमर उजाला से भी उनका लगाव था। दोनों मेड फॉर ईच अदर थे। उनसे मिलने मैं बरेली गया था। तब वे नगर संस्करण के इंचार्ज थे और देर रात तक दफ्तर में उनसे गप्प लड़ाने का अलग ही आनंद था। उनसे दुनिया जहान की बातें होती थीं और जब फोन आज की तरह सस्ता और सुलभ नहीं था तब भी हम नियमित संपर्क में रहे।

सुनील शाह उस समय भी कैमरे और फोटोग्राफी के शौकीन रहे। उनका एक पुराना कैमरा काफी समय मेरे पास रहा और मेरी खींची ज्यादातर पुरानी तस्वीरें उसी कैमरे की हैं। हिन्दी पत्रकारिता में मैं खुद को मिसफिट पाता हूं और मुझे कुछ ही लोग अपने जैसे मिले और सुनील शाह निश्चित रूप से उनमें सबसे करीबी लगे। सुनील उम्र में मुझसे बड़े थे पर शादी बाद में हुई। कल ही पता चला कि वे मुझसे सात साल बड़े थे। शादी के बाद वे दिल्ली आए थे और हमलोग साथ ही कुतुब मीनार घूमने गए थे। सुनील अपने पीछे पत्नी और दो बेटे छोड़ गए हैं। बड़ा बेटा इंजीनियरिंग दूसरे वर्ष में है और छोटा अभी स्कूल में। कई पुरानी यादें हैं। आज सब याद आ रहा है। बहुत याद आएगी आपकी सुनील भाई। श्रद्धांजलि।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्य करने के बाद इन दिनों अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद के कार्य की कंपनी संचालित करते हैं. मीडिया से लेकर राजनीति और समाज के विभिन्न आयामों पर अपनी बेबाक लेखनी चलाने वाले संजय से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

मूल खबर:

अमर उजाला हल्द्वानी के संपादक सुनील शाह का दिल्ली में निधन

संबंधित खबर:

तुम्हें विदा करते हुए बहुत उदास हूँ सुनील…

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन