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सुख-दुख

मेरे जैसे अक्खड़ व्यक्ति को मीडिया में स्वाभिमान से नौकरी करने देने वाला कोई संपादक नजर आया तो वह आनंद जी ही थे!

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

जीवन संस्मरण की अपनी पिछली पोस्ट में नवभारत टाइम्स के यशस्वी और महान संपादकों में से एक Madhusudan Anand सर के बारे में जिक्र किया तो उसे पढ़कर Bhadas4media के संस्थापक Yashwant Singh ने बताया कि आनंद जी नहीं रहे. सुनकर आंखों से अनायास आंसू निकल आए.

आनंद जी… यही वह नाम था, जो दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर बने टाइम्स ऑफ इंडिया के आलीशान दफ्तर में सेकंड फ्लोर पर ही नहीं हर मंजिल पर सुनाई देता था. सिर्फ इसलिए नहीं कि वह नवभारत टाइम्स के संपादक और प्रख्यात साहित्यकार थे. बल्कि इसलिए भी क्योंकि आनंद जी और नवभारत टाइम्स वहां उस बिल्डिंग में पर्यायवाची हो चुके थे. .

जब मैंने आईआईएमसी पास करके साल 2002 की जनवरी में बतौर ट्रेनी ज्वाइन किया तो वहां राम कृपाल सिंह संपादक (समाचार) थे और आनंद जी संपादक ( विचार). चूंकि राम कृपाल जी ने मुझे लिखित परीक्षा पास करने के बाद हुए इंटरव्यू में सेलेक्ट किया था तो उनसे अक्सर बातचीत हो जाती थी.

दोनों संपादक एक ही कमरे में बैठते थे बस एक पार्टिशन था आधे हिस्से में. इसलिए राम कृपाल जी से मिलने जब भी उनके केबिन जाते थे तो आनन्द जी भी सामने ही नजर आते थे. जिधर मैं बैठता था, वह संपादकों के आने जाने के रास्ते पर था इसलिए ज्वाइन करने के बाद दिन से लेकर देर शाम तक आनंद जी आते जाते मुझे देखते , मुस्कराते और अभिवादन का जवाब देते.

मगर पहला वास्ता उनसे तब पड़ा, जब राम कृपाल जी आज तक जाने लगे. उनसे मिलने गया तो उन्होंने मुझे आनन्द जी के पास भेजा और आनंद जी से मेरी तारीफ करते हुए ध्यान रखने का अनुरोध किया. राम कृपाल जी के जाने के बाद आनंद जी सर्वे सर्वा हो गए थे.

उसके बाद कई बरस तक ऐसे कई मौके मिले जब आनंद जी ने मुझे बुलाकर किसी न किसी विषय पर कुछ देर तक चर्चा की. उनके नेतृत्व में हुई मीटिंग्स में भी शामिल होने के मौके मुझे अक्सर मिले.

उनके यश, संपादकीय कौशल, मेधा या मैनेजमेंट की तारीफ तो दुनिया करती ही है, वह कितने निष्पक्ष, निडर और बेहतरीन पत्रकार और इंसान थे, यह जिस दिन जाना , उसी दिन से उनका दिल से मुरीद हो गया था.

दरअसल, एक समय ऐसा आया, जब पूरा संपादकीय विभाग मेरे खिलाफ हो गया और एक भी वरिष्ठ या साथी नहीं बचा जो मेरे खिलाफ रात्रि संपादक पद पर विराजमान रहे एक सज्जन और उनके विराट गुट की शिकायत पर हो रही सुनवाई पर मेरा पक्ष ले. मामला इतना गंभीर था कि टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में मालिकों का प्रतिनिधि समझा जाने वाला ब्रांड मैनेजर मोहित हीरा को खुद और मुंबई से कोई एचआर या किसी डिपार्टमेंट के व्यक्ति आनंद जी के साथ मेरे खिलाफ हुई शिकायतों के आधार पर नौकरी से हटाने का फैसला लेने के लिए बैठना पड़ा.

मुझे एक कमरे में मेरा पक्ष जानने के लिए तब बुलाया गया, जब दर्जनों संपादकीय विभाग का बारी-बारी से पक्ष सुनने के बाद केवल एक चीफ सब एडिटर द्वारा मेरे पक्ष में बोलने और बाकी के मेरे खिलाफ एकजुट होकर निकाले जाने की सिफारिश हो चुकी थी. ब्रांड एंबेसडर ने मन बना लिया था और मुझे निकाला जाना केवल फॉर्मेलिटी रह गया था.

अंदर पहुंच कर सुनवाई के लिए रखे सेंटर स्टूल पर बैठा तो गुस्सा भरा हुआ था. ब्रांड मैनेजर ने पूछा कि आप अपना पक्ष बताइए. मैंने कहा कि न्याय बहुमत से करेंगे या सच झूठ पर? उन्होंने हंसते हुए व्यंग्य से कहा कि एक आप सच के मसीहा हैं और इतने लोग झूठे?

तब तक खामोश बैठे आनंद जी ने कहा कि अश्वनी आप घबराइए नहीं. मैं व्यक्तिगत रूप से आपके काम काज और स्वभाव को जानता हूं. आप इस ऑफिस के सबसे काबिल लोगों में हैं और मेरी नजर में अपने समकक्ष लोगों में बेस्ट हैं.

दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार मधुसूदन आनंद जी

लेकिन तब उम्र कम थी, इसलिए आनंद जी के ढांढस बंधाने के बावजूद अचानक गुस्सा आ गया. मैंने बहुत रूखे अंदाज में ब्रांड मैनेजर से कहा कि फिर आपसे बात करने से क्या फायदा, जो मन में आए कीजिए. मैं क्यों सफाई दूं? तब ब्रांड मैनेजर ने भी गुस्से में कहा कि रात्रि संपादक ने सही आरोप लगाया है कि आपका इंक्रीमेंट कम हुआ तो उसका लेटर देने पर आपने उनकी मेज पर मुक्का मारकर उनसे अपशब्द कहे.

इस झूठे आरोप पर मेरा गुस्सा और तेज हो गया और मैंने कहा कि अगर ऐसा है तो ऐसी की तैसी में गई नौकरी और गुस्से में तमतमाते हुए लात मारकर दरवाजा खोला और जितनी जोर से उस दरवाजे को दीवार में मार सकता था, मार कर चला आया.

नीचे टाइम्स हाउस के बाहर रात के अंधेरे में तन्हा खड़ा सोच रहा था कि नौकरी तो गई? अब क्या करूं. इसी तनाव में एक के बाद एक सिगरेट जलाई और दस बीस मिनट इधर उधर तेज कदमों से चलता रहा.

ब्रांड मैनेजर तब ऐसी तोप था टाइम्स ग्रुप में कि मैंने आनंद जी के शब्दों के बारे में कुछ सोचा ही नहीं. फिर मुझे लगा कि आनंद जी भला मेरे लिए क्यों पूरे ऑफिस के खिलाफ जाएंगे या ब्रांड मैनेजर से लड़ेंगे? मेरा उनसे न कोई पूर्व परिचय था और न ही चापलूसी का कोई नाता. वह संपादक थे और शीर्ष पर थे और मैं सबसे निचली पायदान का एक मामूली प्यादा. फिर मैंने फिजिकल अग्रेशन दिखाकर बाकी सभी की शिकायत को सच साबित कर दिया था. अब आनंद जी कहेंगे भी तो कौन मानेगा कि मैंने रात्रि संपादक की मेज पर मुक्का नहीं मारा था.

मगर आनंद जी का फोन आया मेरे मोबाइल पर तो मुझे लगा कि नौकरी से हटाए जाने की जानकारी दे रहे होंगे या यह कहेंगे कि आपकी हिम्मत कैसे हुई ऐसा व्यवहार करने की. अपने चिर परिचित सौम्य स्वर में उन्होंने कहा “अश्वनी आप कहां चले गए? ऑफिस में ही रहिए.”

मैंने कहा सर मेरा मन बहुत दुखी है. मैं ऑफिस नहीं आ सकता. इस पर उन्होंने कहा “आप नौकरी कीजिए. किसी को सफाई देने की जरूरत नहीं है. संपादक मैं हूं. मुझे पता है कि आप एक योग्य पत्रकार हैं और आपके खिलाफ साजिश की गई है. इसलिए आप नौकरी करते रहिए.”

मैं हतप्रभ रह गया. मुझे यकीन ही नहीं हुआ. उसके बाद थोड़ा सहज होने पर ऑफिस गया. फिर कुछ महीने नौकरी की और आनंद जी से पहले की तरह अभिवादन और गाहे बगाहे उनसे मिलकर हल्की फुल्की चर्चा करने का प्रयास भी करता रहा. मगर कभी उन्होंने जताया नहीं कि उन्होंने मेरे लिए कुछ किया है इसलिए मुझे उनकी चापलूसी करने की या एहसान मानने की जरूरत है.

मगर वह सिर्फ मेरी नौकरी बचाकर मुझे भूल नहीं गए थे बल्कि उन्हें अच्छी तरह से पता था कि अब ऑफिस में यदि उन्होंने मुझे प्रमोशन या अच्छा इंक्रीमेंट नहीं दिया तो यह मेरे साथ अन्याय होगा. वह कुछ और बड़ी मदद मेरे लिए कर रहे थे. इसका पता मुझे तब चला जब मैंने इरा झा मैडम के बुलाने पर हिंदुस्तान अखबार में एनसीआर एडिशन launching की उनकी टीम ज्वाइन करने के लिए हिन्दुस्तान अखबार की तत्कालीन ग्रुप एडिटर मृणाल पांडेय से हामी भर दी. हालांकि वहां मुझे प्रमोशन और दुगुनी सेलरी का ऑफर मिला था मगर टाइम्स छोड़ा मैंने उस गुटबाजी से दुखी होकर था, जिसने मुझे निकलवाने की कोशिश की थी.

आनंद जी को बताने में मुझे संकोच हो रहा था इसलिए मैंने एचआर में नवभारत टाइम्स देख रहीं मैडम को मिलकर सीधा उन्हें ही यह जानकारी दी. शिकायत को लेकर हुए हंगामे के बाद मुझे पूरा HR और मैनेजमेंट व्यक्तिगत रूप से जानने लगा था इसलिए वह मेरा इस्तीफा देखकर चौंक गई. फिर उन्होंने अपनी मेज से एक लेटर निकाला जिसमें मेरा प्रमोशन और जबरदस्त सेलरी हाईक का फैसला खुद आनंद जी ने लिखकर भेजा था.

मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी और इरा जी तथा मृणाल जी द्वारा हुए मेरे इंटरव्यू में मैंने उनसे वादा कर दिया था कि मैं किसी भी ऑफर को ठुकरा कर हिंदुस्तान ही आऊंगा. शायद इरा जी को पता रहा होगा कि मेरा प्रमोशन आउट ऑफ टर्न हो रहा है. क्योंकि वह खुद नवभारत टाइम्स में वरिष्ठ पद पर रही थीं बल्कि उनके मित्र भी वहां तमाम थे.

फिर मैं आनन्द जी के पास गया, बहुत बुझे मन से उन्हें अपना फैसला बताया. यह भी बताया कि एचआर ने मुझे आपका लेटर दिखाया है.

आनंद जी ने कहा कि मैं समझता हूं कि अब तुम्हें यहां काम करने का दिल नहीं करता होगा. मगर प्रमोशन और सेलरी हाईक के बाद शायद कुछ मन बदले. मैं नहीं माना तो उन्होंने मुझे छुट्टी देकर घर भेज दिया.

फिर एक महीने तक उन्होंने और एचआर ने मेरा इस्तीफा नहीं स्वीकार किया. मैं दोबारा गया और उनसे आशीर्वाद मांगा, क्षमा मांगी, कहा – सर अब जाने दीजिए. जहां रहूंगा आपके एहसान तले दबा रहूंगा. मुस्कराते हुए उन्होंने कहा कि जिस दिन मन करे वापस आने का, मेरे पास आना, यहां टाइम्स house में तुम्हारा स्वागत है.

फिर उनसे अक्सर मिलता रहा. दो तीन साल गुजर गए. टाइम्स ऑफ इंडिया ने economic Times hindi launch करने का फैसला लिया. वहां के संपादक टी के अरुण का फोन आया कि आनंद जी ने आपका नाम रिकमेंड किया है कि बिजनेस खबरों की समझ में युवा पत्रकारों में आपसे बेहतर कोई नहीं रहा. वे नवभारत टाइम्स से जुड़े लोगों में से किसी को चाहते थे और इसलिए उन्होंने आनंद जी से राय मांगी थी.

आनंद जी की राय कितनी अहमियत रखती थी कि टी के अरुण से मैं मिला और उन्होंने मिलते ही मुझे नौकरी पर रखने का फैसला सुना दिया.

हालांकि वहां से मैं बीएस चला गया और आनंद जी से फिर एक बार मिलकर माफी मांगी कि आपकी इच्छा के विपरीत फिर कोई फैसला ले रहा हूं. मगर वह दिल के कितने स्वच्छ थे कि न Times छोड़ने और न इस बार ईटी लॉन्च के दो दिन पहले टी के अरुण को मना करने जैसा अनप्रफेशनल काम करने के बावजूद उन्होंने बुरा माना या अपने ego पर लिया.

हालांकि अब मुझे लगता है कि मैंने आनंद जी का सान्निध्य छोड़कर जो गलती की, उसी एक गलती के चलते अंततः मैंने पत्रकारिता की नौकरी छोड़ी. क्योंकि मेरे जैसे अक्खड़ स्वभाव के व्यक्ति को भी अगर कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरी के मीडिया युग में भी स्वाभिमान से नौकरी करने देने वाला कोई संपादक मुझे नजर आया तो वह आनंद जी ही थे. बच्चन के शब्दों में थोड़ा फेरबदल करके कहें तो आनंद जी के जाने के बाद ” अब न रहे वे संपादक, अब न रहेगी वो पत्रकारिता”

आनंद जी को मेरी हृदय से श्रद्धांजलि. ईश्वर उन्हें अपने पास वह स्थान दे, जो अच्छे से अच्छे व्यक्ति को वह देता है. ओम शांति

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