अरुण श्रीवास्तव-
हम जैसे तमाम लोग ‘घुट्टी’ पीकर अखबार की नौकरी की कि, ‘पत्रकार लोकतंत्र का चौथा खंभा होता है’। उसके जिम्मे समाज निर्माण और उसको बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
चलिए मान भी लें कि पत्रकार हमारे लोकतंत्र का चौथा खंभा है तो यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि आजादी के 75 साल भी तथाकथित यह खंभा इतना घुना हुआ, इतना बेचारा, निरीह क्यों है? आजादी की लडाई में मीडिया की भूमिका बाकी तीनों खंभों से सबसे ज्यादा रही और दयनीय स्थिति भी रही क्यों?
ज्यादा पीछे न भी जाएं तो 80-90 के दशक से वर्तमान की तुलना कर लें। चूंकि तुलना का सर्वमान्य आधार माली हालत होती है इसलिए उस पर एक नज़र। आज़ भी कथित लोकतंत्र के चौथे खंभे को ढोने वाले न्यूनतम पगार से नीचे काम करने को मजबूर हैं।
बावजूद इसके कि ये कलम के कागज़ी शेर विशेष कानून “श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम 1955 से आच्छादित हैं और केंद्रीय कर्मचारियों की तरह इनके लिए भी वेतन आयोग है जो कि आज़ तक एक भी लागू नहीं हो पाया। नमूने के तौर पर पत्रकारों के लिए गठित वर्तमान वेज़ बोर्ड मजीठिया को ही लें। यह इकलौता वेज़ बोर्ड है जो तमाम कानूनी दांव-पेंच को पटखनी देकर अस्तित्व में आया वर्ना अब तक के सारे के सारे मसलन पालेकर, बछावत, मणिसाणा’ आदि लोकतंत्र के तीनों खंभों (जो कि अघोषित/अलिखित है) के पैरों तले दम तोड़ दिया।
मजीठिया वेज बोर्ड 11.11.11 से लागू है। पर एक भी ऐसा पत्रकार या पत्रकार घराना नहीं जिसने अपने कर्मचारियों को मौजूदा वेज़ बोर्ड की संस्तुतियों के अनुसार वेतनमान और अन्य परिलाभ दिये हों या कुकुरमुत्ते की तरह पनपे पत्रकार संगठनों ने दिलवाए हों। उल्टे सैकड़ों अखबार कर्मचारियों की नौकरी खा गया मजीठिया वेज बोर्ड।
अपवाद स्वरूप ही सही मुट्ठी भर पत्रकार अपने बूते इसे हासिल करने के लिए कानूनी लड़ रहे हैं। इस कानूनी लड़ाई में एक भी पत्रकार संगठन कंधे से कंधा मिलाकर साथ नहीं दे रहा है सिवाय भड़ास मीडिया के।
मजीठिया वेज बोर्ड की जानकारी, कानूनी सहायता और रिपोर्टिंग से लेकर तमाम जानकारियां भड़ास ने सार्वजनिक की जो कि इसके तहखाने में आज़ भी मौजूद होगी। तमाम पत्रकार साथी अपनी अपनी क्षमता के अनुसार निजी तौर पर कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं पर आज़ भी ज़्यादातर मामले विभिन्न प्रदेशों के श्रम विभागों व श्रम न्यायालयों की चौखट से बाहर नहीं आ पाए यानी शायद ही कोई वाद श्रम न्यायालयों से हाई कोर्ट पहुंचा हो।
बहरहाल, खुद को ‘तुर्रम खां’ समझने वाला ये कागज़ी शेर एक भी वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं करवा पाया। शायद इसका कारण उसमें और उसके संगठनों में एका की कमी हो। पत्रकार ही एकमात्र प्राणी है जो अपने हितों की रक्षा के लिए बनाए गए विशेष कानून के बावजूद अपना हित सुरक्षित नहीं रख पा रहा है।
अमूमन हर कर्मचारी समूह का अपना संगठन है जो अपने हितों के लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करता है, लाठी-डंडे खाता है और जेल भी जाता है। क्या किसी ने कभी पत्रकार या उसके संगठनों को सड़कों पर संघर्ष करते देखा या सुना है। 80 के दशक से तो हम जैसों ने भी देखा सुना नहीं। संविदा कर्मचारी तक खुद को नियमित करने के लिए आये दिन सड़कों पर उतरते हैं पर थोक में पत्रकार नियमित कर्मचारी से संविदा पर कर दिए गए और किसी ने चूं तक नहीं की। कोई भी विभाग अपने कर्मचारियों से एकदिन भी बेगार नहीं कराता पर पत्रकारिता में यह बदस्तूर जारी है। कहीं ट्रेनिंग के नाम पर तो कहीं किसी और नाम पर। इलेक्ट्रॉनिक दौर में किसी खबरिया चैनल में काम करने वाले को नाम वाली माइक पकड़ा दीजिए तो वह खुद को अवध का नवाब समझने लगता है।
कुल मिलाकर पत्रकार के आज के हालात को देखते हुए यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि, जिंदगी झंड बा फ़िर भी घमंड बा….



