Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

बिहार

यूट्यूबर मनीष कश्यप पर डॉक्टरों ने किया हमला!

विशाल तिवारी-

मनीष कश्यप इसलिए ही प्रसिद्ध हुए क्योंकि वे यूट्यूब पर जनहित के मुद्दे उठाते रहे हैं। कल पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में किसी मरीज के सहयोग में गए थे, डॉक्टरों की लापरवाही पर वीडियो बनाने लगे तो डॉक्टरों ने उन्हें बंधक बना लिया और उन पर हमले किए।

ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि पीएमसीएच के डॉक्टरों को ऐसा करने की आदत पड़ गई है, वे अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह हैं, मरीजों तथा उनके परिजनों के साथ पूर्व में भी सैकड़ों बार मारपीट की घटना हुई है और मारपीट करनेवाले डॉक्टरों का कुछ नहीं बिगड़ा है, ऐसा लगता है जैसे उन्हें मारपीट या बदतमीजी करने की कानूनी छूट प्राप्त है। इस मामले में दोषियों को चिह्नित कर उन पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

इस समाज को मनीष कश्यप जैसे लोग अपनी जिद से बहुत रचनात्मक सौगात देते हैं, प्रसिद्धि के बाद बदले में उन्हें भी उनकी मेहनत और लगन की वजह से यूट्यूब इत्यादि या समाज से भी return gift मिलने लगता है तो बहुत लोग ईर्ष्याग्रस्त हो जाते हैं। मैं देख रहा हूँ कि बहुत लोग कटाक्ष लिख रहे, वे सब मनीष कश्यप के जुनून, मेधा और जिद से अचंभित जलनखोर लोग हैं। उनकी शुरुआती भाषा मुझे भी बहुत पसंद नहीं थी, पर सिस्टम में अगर कोई अंधा बहरा बन जाए तो फिर उन्हें सभ्य भाषा सुनाई कहां देती है!


शशि शेखर-

एक पत्रकार पर हमला दुर्भाग्यपूर्ण है… मनीष कश्यप काफी ऊर्जावान है. उसने शुरुआत जमीनी पत्रकारिता और जनसरोकार से जुड़े मसलों को एक अनोखे (आवेगपूर्ण) तरीके से उठा कर नाम और दाम कमाया. नाम मिला तो आकांक्षाएं बढ़ी और उसने राजनीति भी ज्वाइन किया. सुना है, अब शायद उसने राजनीतिक दल से इस्तीफा भी दे दिया है.

मनीष के स्टाइल ऑफ़ जर्नलिज्म से किसी को आपत्ति हो सकती है. मैं भी पूर्णत: उसकी पत्रकारिता शैली से सहमत नहीं होता. लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं है कि आप जिस पत्रकार से सहमत न हो, उसके साथ मारपीट करें.

बिहार और (देश) की पत्रकारिता इस वक्त वेंटीलेटर पर है. सत्ता ने पत्रकारिता को चारणभाट बना लिया है. लोभ से, डरा कर, जैसे भी हो. बिहार में एक बड़ा हथियार है, सरकारी काम में बाधा डालना और इस बहाने पत्रकार को डराना.

पटना मेडिकल कॉलेज हास्पिटल में मनीष कश्यप के साथ हुई मारपीट की घटना बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण और निन्दनीय है. पत्रकारों के लिए यह वक्त पत्रकारिता की नैतिकता और एथिक्स पर ज्ञान देने का नहीं है. एक बिरादरी (पत्रकार) के होने के नाते हर पत्रकार को इस घटना की निंदा करनी चाहिए. क्योंकि आज अगर आप इस घटना की, या मनीष कश्यप के लिए आवाज नहीं उठाएंगे तो कल आपके लिए भी कोई आवाज नहीं उठाएगा.

बाकी, पत्रकारिता कैसी होनी चाहिए, पत्रकार को कैसा होना चाहिए, ये एक लंबा बहस का विषय है. इस पर आप शांतिकाल में तसल्ली से बहस करिए, मनीष की निंदा कीजिये, कोई दिक्कत नहीं है.

बिहार और देश का हर पत्रकार (कमोबेश) यह शिकायत करता है कि उसे सच लिखने नहीं दिया जाता, सवाल करने नहीं दिया जाता. यह बहुत हद तक सही भी है. अफसरशाही और सत्ताई साजिश ने पत्रकारिता को चौथे खंभे से उतार कर फर्श पर ला पटका है.

सत्ता में कोई रहे, उसे अपनी आलोचना सहन ही नहीं हो रही. तेजस्वी यादव हो सत्ता में तो भी मनीष कश्यप पर गंभीर धाराओं में केस लादा जाएगा, नीतीश जी-भाजपा की सरकार हो तब भी मनीष कश्यप सरकारी अस्पताल में सवाल करने पर पीटा जाएगा. फेक न्यूज आज सो काल्ड राष्ट्रीय मीडिया जितना चलाती है, क्यों नहीं राज्य सरकारें उन पर केस लादती है? क्योंकि उन्हें पता है कि राष्ट्रीय मीडिया संगठित है, ताकतवर है, वे एजेंडा चलाना शुरू कर देंगे.

इसलिए, आमतौर पर राष्ट्रीय मीडिया के एंकर्स और सुपर स्टार रिपोर्टर्स ऐसी घटनाओं से बचे रहते है. लेकिन, ग्राउंड जीरों से काम करने वाला पत्रकार देश भर में सत्ता की साजिशों का शिकार हो रहा है.

मनीष कश्यप के साथ एक ही समस्या है. वो सफलता को ठीक तरीके से डायजेस्ट नहीं कर पाए. कुछ हद तक मिसगाइडेड मिसाइल बन गए. हालांकि, यही उनकी यूएसपी भी है, जिसके कारण दर्शक उन्हें पसंद करते है. हालांकि, किसी मरीज की पैरवी करना, उसके लिए डॉक्टर से सवाल कर लेना कोई ऐसा अपराध नहीं है कि पत्रकार के साथ मारपीट की जाए. उसे बंधक बना लिया जाए. यह गंभीर आपराधिक कृत्य है और सरकार को तत्काल ऐसे डॉक्टर्स के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए.

आखिरकार, पीएमसीएच में पढ़ने वाले डॉक्टर्स का वेतन या खर्चा आम आदमी के टैक्स के पैसे से ही तो जाता है. इलाज के नाम पर यह संस्थान कितना “मशहूर” है, देश जानता है. ऐसे में अगर एक पत्रकार पैरवी करने पहुँच गया, तो कौन सी आफत आ गयी?

बहरहाल, हम सभी को इस घटना की निंदा करनी चाहिए. कार्रवाई की मांग करनी चाहिए, बिना यह सोचे कि कोई पत्रकार किस विचारधारा से जुड़ा है, क्योंकि पत्रकार आखिरकार पत्रकार होता है और कमोबेश वह आम आदमी की आवाज ही उठाता है.

वैसे, मनीष कश्यप को भी इस वक्त यह समझ लेना चाहिए कि पत्रकारिता और राजनीति नदी के दो किनारे हैं, कभी नहीं मिलते. कम से कम संकट की इस घड़ी में उनके राजनीतिक मित्रों की तरफ से किसी भी तरह के बयान के न आने के बाद, तो मुझे ऐसा ही लगता है.

मनीष को भी यह बात समझनी चाहिए. उन्हें यह भी समझना चाहिए कि उनकी पूरी पहचान ही पत्रकारिता की देन है, उस पहचान को बनाए रखे. ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वस्थ करें. वे फिर से काम पर लौटें. जनता की आवाज बने.

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन